एक पुस्तक थी, ‘सार्थवाह’! Leave a comment

संदीप देव। सार्थवाह अर्थात् यात्रा करने वाले पंथों का समूह। यह व्यापारी वर्ग के लिए प्रयुक्त होता था, जो भारत से निकल कर पूरी दुनिया में व्यापार करते थे।

प्राचीन काल में भारत की समृद्धि की एक बड़ी वजह व्यापार था। उन व्यापारियों का नेता सार्थवाह कहलाता था। उसकी जिम्मेदारी मार्ग में व्यापारियों को लूट आदि से बचाकर व्यापार का सुरक्षित माहौल प्रदान करना होता था। ‘काशी का इतिहास’ पुस्तक के रचयिता डॉ मोतीचंद्र जी ने लिखा था।

बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद ने 1966 में इस पुस्तक को प्रकाशित किया था। वैदिक काल से भारत के उन प्राचीन व्यापार मार्ग या कहें भारत की पथ-पद्धति पर यह शायद पहली पुस्तक थी। हिंदी भाषा की इस पुस्तक ने अंग्रेजी भाषा के कई पुस्तकों का लिए सामग्री उपलब्ध कराई।

वैसे लोकमान्य तिलक आदि की तरह यह पुस्तक भी आर्य बाहर से आए की बात कहती है, परंतु इस एक बात की उपेक्षा करते हुए इस पुस्तक को पढ़ें तो दुर्लभ जानकारियों से भरी है यह पुस्तक। मेरे पास इस पुस्तक की एक कॉपी थी, इसलिए मैं इस पर नहीं लिख पा रहा था कि कहीं कोई मांग न ले फिर कहां से लाकर दूंगा?

लेकिन बिहार राष्ट्रभाषा की इस पुस्तक को अभी एक नये प्रकाशन ने राईट खरीद कर छापा है और यह देखकर मुझे प्रसन्नता हुई कि इस प्रकाशन ने और भी दुर्लभ पुस्तकों का राईट लेकर प्रकाशित किया है। इनमें संपत्ति शास्त्र, इंडियन टैंपल, भारतीय अघोरी, भारत का बृहत इतिहास, सरस्वती-सिंधु सभ्यता सहित अनेक दुर्लभ पुस्तकें हैं।

मैंने सारी पुस्तकें Kapot Prakashan & e-commerce पर उपलब्ध करा दिया है। आप निम्न लिंक पर जाकर उन दुर्लभ पुस्तकों को देख और क्रय कर सकते हैं। धन्यवाद।

Sarthavaha

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *