मनुस्मृति कहती है:-
योऽनधीत्व द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति साऽन्वय:।।168।।/2
अर्थात्:- जो द्विजाति वेदाध्ययन किए बिना दूसरे काम में परिश्रम करता है, वह जीता हुआ ही पुत्र-पौत्रादि वंशजों के साथ शीघ्र ही शूद्रतुल्यता में प्राप्त होता है।

मैं मनुस्मृति पर शो तो कर ही रहा हूं, लेकिन मैं चाहता हूं कि सनातनी हिन्दू चाहे वह किसी भी जाति का हो, स्वयं मनुस्मृति पढ़े और पूरा पढ़ें फिर टिप्पणी करे।
चौखंबा और प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित मनुस्मृति बेहद सरल अर्थ के साथ उपलब्ध है। किसी की टीका पढ़ने की जगह केवल श्लोक और उसका हिंदी अनुवाद पढ़िए। जब स्वयं में अर्थ स्पष्ट हो जाए तब किसी की टीका पढ़िए। सीधे टीका पढ़ने से आप टीकाकार के व्यक्तिनिष्ठ विचारों के प्रभाव में आ जाते हैं।
दोनों प्रकाशन के अर्थ में मामूली भेद है। चौखंबा वाली मनुस्मृति कुल्लूक भट्ट की व्याख्या पर आधारित और शिवराज आचार्य कौण्डिन्नायन द्वारा संपादित व अनुवादित है। वहीं प्रभात प्रकाशन वाली मनुस्मृति डॉ. रामचन्द्र वर्मा शास्त्री द्वारा अनुवादित है।
चौखंबा वाली में कहीं-कहीं कूट शब्दावली है, जो प्रभात प्रकाशन वाली मनुस्मृति पढ़ कर पूरी तरह से समझ में आता है। मैंने दोनों से मनुस्मृति के दो अध्याय को पढ़ा। उसी आधार पर कह रहा हूं। सभी 12 अध्याय मैं इस महीने पढ़कर पूरा कर लूंगा।
तीर लगने के बाद वाली ने भगवान श्रीराम के समक्ष बड़ी-बड़ी धर्म की बातें की थी, जो आज भी लोगों को तार्किक लगती है, परंतु महर्षि वाल्मीकि जी ने उसे ‘धर्माभास’ लिखा है। अर्थात् वह धर्म नहीं है, केवल धर्म का आभास कराती है!
वही हाल आज मनुस्मृति को न पढ़, उस पर बोलने वाले लोगों खासकर ब्राह्मण युवकों का होता जा रहा है। ब्राह्मण युवक शायद आंबेडकरवादी नव बौद्धों के प्रोपोगंडा के कारण अपराध भाव में जी रहे हैं, इसीलिए उनकी ही तरह बिना पढ़े और उनकी ही भाषा में मनुस्मृति पर टिप्पणी कर रहे हैं!
धर्म शास्त्र ब्राह्मणों के लिए पठन-पाठन, यज्ञ-याज्ञ और दान लेना-देना- यह छह कर्म बताते हैं, लेकिन आज किसी पार्टी, संस्था, नेता और अपने स्वघोषित गुरु विशेष की चापलूसी में ब्राह्मण युवक शास्त्र निर्धारित इन कर्मों को छोड़ कर चापलूसी को अंगीकार करते जा रहे हैं और फिर कहेंगे कि ब्राह्मणों का सम्मान नहीं होता!
अरे! जो तुम्हारा सम्मान नहीं करते, तुम रात-दिन उनका झंडा उठाए घूम रहे हो तो प्रकृति तुम्हें कहां से सम्मान दिलवाएगी? सम्मान अर्जित करना पड़ता है और वह धर्मशास्त्र निर्धारित अपने कर्म से मिलता है, न कि कलियुगी संस्थाओं और नेताओं का अनुगमन कर पाखंड वृत्ति अपनाने से!
असल में इस महाकुंभ में एक संस्था और पार्टी विशेष के हित में ‘हिंदू संहिता’ लाने का प्रयास चल रहा है, यही कारण है कि प्रथम मानव संहिता मनुस्मृति पर अचानक से हमले तेज हो रहे हैं, खासकर पार्टीबाज आंबेडकरवादियों, पाखंडी ब्राह्मणों और तथाकथित धर्मगुरुओं के द्वारा।
अतः मनुस्मृति स्वयं पढ़िए, क्योंकि योग वशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ कहते हैं, “ज्ञान ही मुक्ति का एक मात्र आधार है।” जय श्रीकृष्ण। 🙏 धन्यवाद।
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