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Hindi Books, Vani Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Roos,Russia Aur Rasputin : Czarshahi Ka Itihas
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Hindi Books, Vani Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Roos,Russia Aur Rasputin : Czarshahi Ka Itihas
“पृथ्वी के सबसे बड़े भू-भाग की मिल्कियत रूस को कैसे मिली? क्या यह सदियों से एक महाशक्ति थी? क्या यूनानी और रोमन साम्राज्यों के समय रूस का कोई वजूद था ? यह इतिहास-यात्रा हमें साम्यवादी रूस के लाल आवरण के पीछे ले जाती है। वहाँ झाँकने पर वोल्गा नदी में कहीं दूर से आते जहाज़ी मिलेंगे। बलालइका वाद्य बजाते शिकारी मिलेंगे। वे व्यापारी मिलेंगे जो रेशम मार्ग से गुज़रते किसी सराय में सुस्ता रहे होंगे । वे मंगोल मिलेंगे जो पूरब से पश्चिम तक परचम लहरा रहे होंगे। वे स्लाव जो अपनी नस्ल, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति की कुण्डली मिला रहे होंगे। वे ऑर्थोडॉक्स ईसाई जो अपना नया गढ़ तलाश रहे होंगे। वे ज़ार जिन्होंने नेपोलियन से युद्ध किया। वह तॉलस्तॉय की नताशा का रूमानी नृत्य । वह जारशाही जिसका अन्त विश्व की एक निर्णायक घटना बनी। आख़िर कौन थे रूस ? कैसे बना रशिया ? और कौन था रासपूतिन? ★★★ साइबेरिया से बाल्टिक सागर तक फैले दुनिया के सबसे बड़े देश का इतिहास । एक ऐसा इतिहास जिसके बिना आज की जियोपॉलिटिक्स समझनी असम्भव है। यह इतिहास वाइकिंग युग से होते हुए चंगेज़ ख़ान और जारशाही के ऐसे दौर से गुज़रता है, जिसमें जिजीविषा है, धर्मयुद्ध है, रक्तपात है, षड्यन्त्र है, रोमांस है, क्रान्ति है । यह एक देश ही नहीं, दुनिया के निर्माण की कथा है। एक ऐसे विचार जन्म की नींव है, जिसने आधुनिक विश्व की तासीर तय की । सामन्तवादी से साम्यवादी रूस के सफ़र का रहस्यमय और रोमांचक इतिहास एक नयी क़लम से नये अन्दाज़ में लिखा गया है | ‘कुली लाइन्स’ के लेखक प्रवीण कुमार झा की इस नयी पुस्तक की गति आज की तेज़ भागती दुनिया के मद्देनज़र है । ”
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Hindi Books, Vani Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Coolie Lines
कुली लाइन्स
हिन्द महासागर के रियूनियन द्वीप की ओर 1826 ई. में मज़दूरों से भरा जहाज़ बढ़ रहा था। यह शुरुआत थी भारत की जड़ों से लाखों भारतीयों को अलग करने की। क्या एक विशाल साम्राज्य के लालच और हिन्दुस्तानी बिदेसियों के संघर्ष की यह गाथा भुला दी जायेगी? एक सामन्तवादी भारत से अनजान द्वीपों पर गये ये अँगूठा छाप लोग आख़िर किस तरह जी पायेंगे? उनकी पीढ़ियों से हिन्दुस्तानियत ख़त्म तो नहीं हो जायेगी? लेखक पुराने आर्काइवों, भिन्न भाषाओं में लिखे रिपोर्ताज़ों और गिरमिट वंशजों से यह तफ्तीश करने निकलते हैं। उन्हें षड्यन्त्र और यातनाओं के मध्य खड़ा होता एक ऐसा भारत नज़र आने लगता है, जिसमें मुख्य भूमि की वर्तमान समस्याओं के कई सूत्र हैं। मॉरीशस से कनाडा तक की फ़ाइलों में ऐसे कई राज़ दबे हैं, जो ब्रिटिश सरकार पर ग़ैर-अदालती सवाल उठाते हैं। और इस ज़िम्मेदारी का अहसास भी कि दक्षिण अमरीका के एक गाँव में भी वही भोजन पकता है, जो बस्ती के एक गाँव में। ‘ग्रेट इंडियन डायस्पोरा’ आख़िर एक परिवार है, यह स्मरण रहे। इस किताब की यही कोशिश है।
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Hindi Books, Vani Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Score Kya Hua?
क्रिकेट को भारत में कभी एक जुनून, तो कभी जीवनशैली का अंग, कभी धर्म कहा गया। वहीं क्रिकेट पर यह आरोप भी लगते रहे कि यह तमाशा है, पैसों का व्यापार है, और इस ‘विदेशी’ खेल ने कई भारतीय खेलों को दबा दिया । यह पुस्तक क्रिकेट के आरम्भ से तीन सदियों की कहानी कहती है, जिसने भारत की संस्कृति में इसे पिरोया । क्या यह खेल भारत के लिए स्वाभाविक था? अगर नहीं तो इसने कैसे जन, मन, धन में पैठ बनायी ? कैसे तेज़ गेंदबाज़ों की फ़ौज बनी, कैसे विदेशी खिलाड़ी भारतीय क्लबों से आकर्षित हुए, और कैसे क्रिकेट की सत्ता का केन्द्र भारत बन गया? क्या अन्य खेल इस यात्रा से लाभान्वित हुए या हो सकते हैं? कब हम गिरे, कब सँभले, कब जीतते हुए हार गये, हारते हुए जीत गये? खम्भात तट पर कुछ ग्रामीणों के कौतूहल से लेकर वानखेड़े स्टेडियम की विजयी गूँज की कहानी । बहरहाल, स्कोर क्या हुआ ?
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)
Akash Pushp
“अयोध्या को सिद्धों की पावन भूमि माना गया है, जहाँ वैष्णव, शैव और शाक्त परंपराओं के अनेक सिद्धों ने विभिन्न कालखंडों में निवास कर मानव मूल्यों को जीवंत बनाए रखा। यह पुस्तक उन्हीं आध्यात्मिक और मानवीय गुणों को समझने का प्रयास है, जो व्यक्ति को संस्कार और साधना के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। पुस्तक में बताया गया है कि ये गुण प्रत्येक मानव के भीतर निहित होते हैं, परंतु प्रारब्ध एवं परिस्थितियों के कारण प्रकट नहीं हो पाते।
अयोध्या से उत्पन्न ऐसे शाश्वत मूल्यों को इसमें विस्तार से प्रस्तुत किया गया है, जिनका आधार आध्यात्मिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है। गुरु तत्त्व, तपस्या, ज्ञान, श्रद्धा, मंत्र शक्ति और आसक्ति के बीच विरक्ति जैसे विषयों पर गहन चिंतन किया गया है, जिनका परिणाम कुंडलिनी जागरण के रूप में व्यक्ति में प्रस्फुटित होता है। रामराज्य की आदर्श शासन व्यवस्था तो इसका एक अंश मात्र है। यह पुस्तक इसी साधना के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है और जीवन के मूल उद्देश्यों को समझने में सहायक है। यह कृति अयोध्या के विराट् स्वरूप को समझने का एक प्रयास है, जो अभी पूर्ण नहीं है, बल्कि निरंतर साधना और शोध की प्रक्रिया का हिस्सा है।”
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)
Operation Sindoor : 100 Sarvashreshtha Kavitayen
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)Operation Sindoor : 100 Sarvashreshtha Kavitayen
“ऑपरेशन सिंदूर : 100 सर्वश्रेष्ठ कविताएँ’ शौर्य, संवेदना और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त काव्य-संकलन है। पहलगाम की पीड़ा से उपजी राष्ट्र-भावना और भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस को समर्पित यह कृति केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का स्वर है। यह संकलन उन भावनाओं का जीवंत दस्तावेज है, जो अन्याय के विरुद्ध उठीं, साहस में बदलीं और विजय के स्वर में गूंज उठीं।
एच.बी. पोएट्री द्वारा आयोजित ‘ऑपरेशन सिंदूर काव्य प्रतियोगिता’ में देशभर से 361 रचनाकारों ने भाग लिया। विषय की तीव्रता और भावनात्मक प्रभाव ऐसा रहा कि प्रतियोगिता के बाद भी निरंतर रचनाएँ प्राप्त होती रहीं, जिन्हें मंचों और डिजिटल माध्यमों के जरिए व्यापक रूप से प्रसारित किया गया। इसी व्यापक सहभागिता में से चयनित 100 उत्कृष्ट कविताएँ इस पुस्तक में संकलित हैं, जो भारत की विविधता और एकता – दोनों को सशक्त स्वर देती हैं।
इस संग्रह की प्रमुख विशेषता सिंदूर का बहुआयामी प्रतीक है। यहाँ सिंदूर केवल नारी-श्रृंगार नहीं, बल्कि सम्मान, स्वाभिमान और राष्ट्र-रक्षा का पर्याय बनकर उभरता है। कविताओं में कहीं वीररस का गर्जन है, कहीं करुणा की वेदना, तो कहीं न्याय के लिए प्रज्वलित रौद्र स्वर मुखरित होता है।
यह पुस्तक भारतीय सैन्य बलों के साहस, नारी शक्ति के सम्मान और राष्ट्रीय संकल्प की प्रभावशाली अभिव्यक्ति है। यह हर उस पाठक के लिए एक प्रेरक कृति है, जो राष्ट्र-गौरव को शब्दों में अनुभव करना चाहता है और देशभक्ति की अनुभूति को अपने भीतर सहेजना चाहता है।”
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)
Operation Sindoor Shauryagatha
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)Operation Sindoor Shauryagatha
“भारत की जिस समृद्ध वाचिक परंपरा ने सदियों से राष्ट्र की चेतना को शब्दों के माध्यम से जाग्रत् और प्रेरित किया है, यह काव्य-संग्रह उसी परंपरा का एक जीवंत दस्तावेज है। भूषण, चंदरबरदाई और दिनकर जैसे महान् कवियों से लेकर समकालीन रचनाकारों तक इस परंपरा ने युद्धकाल और विपरीत परिस्थितियों में सेना के साहस, बलिदान और राष्ट्र-नेतृत्व के संकल्प को स्वर दिया है। प्रस्तुत पुस्तक ऑपरेशन सिंदूर के ऐतिहासिक संदर्भ में रचित कविताओं का संकलन है, जिसमें देश-विदेश के हिंदीभाषी कवियों की भावनाएँ एक सूत्र में पिरोई गई हैं।
इस संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें चार-पाँच पीढ़ियों के कवियों की सहभागिता है, जो इसे एक व्यापक और कालातीत दृष्टि प्रदान करती है।
22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में पाक आतंकियों द्वारा अनेक निर्दोष भारतीयों की निर्मम और नृशंस हत्या की अमानवीय घटना के पश्चात् भारतीय सेना द्वारा प्रदर्शित अदम्य साहस और देश के सक्षम नेतृत्व में दिए गए सशक्त संदेश को इन कविताओं में सजीव रूप से अभिव्यक्त किया गया है। यह पुस्तक न केवल भारतीय सेना का शौर्यगान है, बल्कि देश के वर्तमान नेतृत्वकर्ता प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी की दृढ़ता, क्षमता, राष्ट्रभक्ति, संयम और संकल्प का काव्यमय अभिलेख भी है, जो पाठकों के मन में गर्व और प्रेरणा का संचार करता है।”
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English Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
The History and Chronology of Ancient India
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English Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)The History and Chronology of Ancient India
It is not common knowledge, even within India, let alone the world, that the current widely presented history and chronology of ancient India is not the one recorded by Indians, but rather a distorted version created during the colonial rule of India. This book explains the reasons and the glaring errors in the prevalent Indian chronology and history.
The author approaches these errors with evidence based on years of extensive research supported by hundreds of references that are cited in the book. He discusses numerous specific examples of distortions of the chronology to provide a correct, continuous, and connected chronology and history of India from 3100+ BC to AD 1192.
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)
Laut Aao Maa
नाज़रीन अंसारी राफी एक लेखिका, कवयित्री एवं उपन्यासकार हैं। अपनी सातवीं पुस्तक काव्य-संग्रह ‘लौट आओ माँ’ में उन्होंने माँ के लिए बहुत सारी कविताएँ लिखी हैं। उनकी माँ, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, अब कवयित्री के पास कुछ है तो बस उनकी यादें हैं। उनके मन में माँ के जाने के दर्द का जो गुबार, जो दुःख भरा है, वह इन कविताओं के द्वारा सबसे बाँटा है। आशा है, माँ और बेटी के प्रेम व विरह से भरा यह काव्य-संग्रह पाठकों को अवश्य पसंद आएगा।
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Hindi Books, Rajasthani Granthagar, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Rajasthan Mein Striyon Ke Sangharsh : Parde Se Parcham Tak
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Hindi Books, Rajasthani Granthagar, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Rajasthan Mein Striyon Ke Sangharsh : Parde Se Parcham Tak
राजस्थान में स्त्रियों के संघर्ष : पर्दे से परचम तक
राजस्थान (पूर्ववर्ती राजपूताना) क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए महिलाओं के वीरतापूर्ण संघर्ष इस अध्ययन का मुख्य केंद्र हैं। इन असाधारण महिलाओं के आत्मकथात्मक विवरण उनके सुरक्षित और सीमित जीवन से निकलकर आत्मविश्वासी और दृढ़ व्यक्तित्व के रूप में उनके रुपांतरण की यात्राओं को उजागर करते हैं। Rajasthan Striyon Ke Sangharshहुए यह पुस्तक यह भी दर्शाती है कि उन्होंने पारम्परिक और लैंगिक सीमाओं को चुनौती देते कठिन बाधाओं को पार किया और आध्यात्मिकता, राजनीति तथा शिक्षा जैसे अब तक ‘पुरुष प्रधान क्षेत्रों’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि इन सक्रियकर्मियों के अनुभवों में सूक्ष्म और महत्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं, फिर भी संघर्ष उनके जीवन का सार रहा है।
अपने अमूल्य योगदान के बावजूद, ये साहसी और उत्साही महिलाएँ दुर्भाग्यवश इतिहास और सार्वजनिक स्मृति दोनों में उपेक्षित रहीं हैं।
अत्यंत प्रसन्नता के साथ इन प्रेरणादायक और उल्लासपूर्ण कथाओं को पुस्तक में प्रस्तुत किया हैं, जो वीरांगनाओं की पर्दे से परचम तक की विलक्षण यात्रा को दर्शाती हैं। उनकी कथाएँ लम्बे समय से उजागर होने की प्रतीक्षा कर रही थीं- यह पुस्तक उन विलक्षण जीवन-यात्राओं का उत्सव है।
Rajasthan Mein Striyon Ke Sangharsh : Parde Se Parcham Tak | Womens Struggle in Rajasthan Crossing Barriers Claiming Spaces
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Hindi Books, Rajasthani Granthagar, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Bhartiya Riyasaton Ki Angrejo Se Sandhiyan
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Hindi Books, Rajasthani Granthagar, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Bhartiya Riyasaton Ki Angrejo Se Sandhiyan
भारतीय रियासतों की अंग्रेजों से संधियाँ (राजपूताना खंड)
Compiled by C. U. AITCEIISON, B.C.S.
राजनीति में सन्धि को समझौते के अर्थ में लिया जाता है। सन्धि निजी और प्रशासनिक दोनों स्तर पर होती हैं। आज-कल देशों और उनकी सरकारों के बीच पारपत्र, पूंजी निवेश, व्यापार, पर्यटन आदि के लिए समझौते होते हैं। पुराने समय में सन्धियाँ परस्पर सहयोग, स्नेह सम्बन्ध और अन्य व्यवहार के लिए होती थी। Bhartiya Riyasaton Angrejo Sandhiyanप्राचीन भारतीय सन्धियों का स्वरूप क्या रहा? अभिलेखों में सान्धिविग्रहिक जैसा आधिकारिक पद होता था और वह युद्धादि के विषयों पर विचार करता हुआ अपने राष्ट्र के हित को देखता था। ये पदाधिकारी किस प्रकार की सन्धियाँ करते थे, ऐसा लिखित साक्ष्य नहीं मिलता किन्तु यह निश्चित है कि सोलह प्रकार की सन्धियों में से किसी न किसी प्रकार की सन्धि अवश्य होती थी। उत्तर मध्यकाल में युद्धपंच जैसा एक पद सामने आता है। महाराणा जयसिंह गुणवर्णन नामक ग्रन्थ में युद्धपंच की भूमिका को समझा जा सकता है। वह युद्ध का संचालन ही नहीं करता बल्कि रणांगण में व्यूह और रणनीति का नियोजक भी होता था। हल्दीघाटी में बदायूंनी और सिरोही के युद्ध में एक पंचोली इसी भूमिका में थे।
भारतीय रियासतों की अंग्रेजों से संधियाँ (राजपूताना खंड) – Bhartiya Riyasaton Angrejo Sandhiyan
बहुत सी सन्धियाँ लेन-देन, मर्यादाओं के निर्धारण सहित विश्वास के आधार पर होती थी और वे लिखित हों, यह बहुत आवश्यक नहीं माना जाता होगा। लेखन की विविध विधाओं की सूचनाओं और प्रारूपों के संग्रह लेखपद्धति में जितने प्रकार के पत्रों के प्रारूप मिलते हैं, उनमें किसी समझौता -पत्र का उदाहरण नहीं है जबकि सन्धिविग्रह के प्रति लिखे जाने वाले पत्र के प्रारूप मिलते हैं। ये पत्र राजकीय या प्रशासनिपेक्षाओं के सूचक होते हैं। सान्धिविग्रहिक को राजाज्ञा लिखित में प्रेषित की जाती थी और वह तदनुसार ही अपेक्षित कार्य करने का प्रयास करता था। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि ऐसे पत्र समय-समय पर व्यवहार में रहे होंगे। अन्य विविध पत्रों के प्रारूप हमें ‘राजतरंगिणी’, दलपतिराय के ‘प्रशस्तिरत्नकोश’ और विद्यापति की ‘लिखनावली’ आदि में मिलते हैं।‘प्रशस्तिप्रकाशिका’ का भी अपना महत्व है।SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)
Gandhari Ki Atmakatha
‘ गांधारी, अपने पुत्रों को समझाओ । द्वारकाधीश की माँग बहुत कम है । अब पाँच गाँव से और कम क्या हो सकता है?”
” अब वे मेरे समझाने की सीमा में नहीं रहे । जब पानी सिर से ऊपर बहने लगा तब आप उसे बाँधने के लिए कहते हैं! आपसे अनेक अवसरों पर ओंर अनेक बार मैंने कहा है कि यह दुर्योधन बिना लगाम का घोड़ा हो गया है, उसपर नियंत्रण करिए; पर उस समय आपने बिलकुल ध्यान ही नहीं दिया । आज वह बात इस हद तक बढ़ गई कि यह घोड़ा जिस रथ में जुता है उसीको उलट देना चाहता है, तब आप मुझसे कहते हैं कि घोड़े की लगाम कसो!
” आपके पुत्रों ने पांडवों पर क्या-क्या विपत्ति नहीं ढाई! हर बार उन्हें समाप्त करने का प्रयत्न करते रहे । मैं हर बार तिलमिलाती रही और हर बार आपका मौन उन्हें प्रोत्साहन देता रहा । किसलिए? इस सिंहासन के लिए, जो न किसीका हुआ है और न किसीका होगा? इस धरती के लिए, जो आज तक न किसीके साथ गई है और न जाएगी? इस राजसी वैभव के लिए, जिसने हमें अहंकार के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिया है ?’. .इसे आप अच्छी तरह जान लीजिए कि यदि कोई वस्तु हमारे साथ अंत तक रहेगी और इस संसार को छोड़ देने के बाद भी हमारे साथ जाएगी तो वह होगा हमारा धर्म, हमारा कर्म ।..
” आपने उसीकी उपेक्षा की । मोह-माया, ममता, पुत्र-प्रेम और लोभ से ही घिरे रहे । इसी लोभ ने आपके पुत्रों को पांडवों के प्रति ईर्ष्यालु बनाया । अब जो कुछ हो रहा है, वह उसी ईर्ष्या का शिशु है । अब आप ही उसे अपने गोद में खिलाइए । मैं उसका जिम्मा नहीं लेती । मैंने कई बार कहा है कि हमारे दुर्भाग्य ने हमें संतति के रूप में नागपुत्र दिए हैं । वे जब भी उगलेंगे, विष ही उगलेंगे । इसलिए नागधर्म के अनुसार समय रहते हुए उनका त्याग कर दीजिए । ”SKU: n/a -
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Neela Chand
नीला चाँद, नीला चाँद, नीला चाँद-ये ही हैं इधर बीच के सुप्रसिद्ध तीन उपन्यास। ऐसा ही कहा था उषा किरण खान ने। ‘नीला चाँद’ कालजयी कथाकार शिवप्रसाद सिंह का यशस्वी उपन्यास है-जिसे तीन प्रख्यात पुरस्कार-सम्मान मिले-1991 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1992 में शारदा सम्मान और 1993 में व्यास सम्मान। ‘नीला चाँद’ के लिए ‘व्यास सम्मान’ की प्रशस्ति में ठीक ही कहा गया है कि शिवप्रसाद सिंह का अनुकरण नहीं किया जा सकता। वे एक साथ बेबाक ढंग से सुरूप और सौन्दर्य को, वीभत्स और विरूप को, भयानक और चमत्कारिक को साकार और जीवन्त करने की कला में दक्ष हैं। वे इतिहास के स्रोतों से लेकर पुरातात्विक उत्खनन से सीधा सम्पर्क रखते हैं। शिलालेखों को जाँच कर अपनी सामग्री ग्रहण करते हैं। ‘नीला चाँद’ मध्ययुगीन काशी का विस्तृत फलक है। प्रस्तत है ‘नीला चाँद’ उपन्यास का नया संस्करण। पर क्या ‘नीला चाँद’ की सम्यक समीक्षा हो गयी? साहित्य अकादेमी से ज़्यादा पहुँचे न्यायाधीशगण शारदा सम्मान में और उससे भी एक कदम आगे पहुँचे व्यास सम्मान को देते समय, किन्तु नयी सहस्राब्दी की दहलीज़ पर पाँव रखने वालों को क्या ‘नीला चाँद’ का अन्तिम सन्देश पहुँचा दिया गया? रोटी का गोल टुकड़ा चाहिए-अवश्यमेव जीने के लिए, पर क्या पेट भरने पर ऐसा जीना मानव की अभीप्सा को पूरी तरह बाँध सकेगा? सर्वदा के लिए नहीं? रोटी के अलावा मानव का मन कुछ माँगेगा। कौन देगा वह सन्देश? कौन दिखायेगा अमावस्या की रात में उपेक्षित पड़े नीला चाँद को जो हर मनुष्य को सहज प्राप्त है ? सिर्फ़ ‘नीला चाँद’ जो न तो धर्मोपदेश है, न ही अख़बार का एक पन्ना। आइये फिर खोजें और क्या है इसमें…
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Nakkash
देश की राजधानी दिल्ली में अरावली की पहाड़ियों के बीच एक अकादमिक द्वीप, यानी जेएनयू । यहाँ का विद्यार्थी अभिमन्यु साहित्य के साथ समाज और राजनीति का अनुसन्धान कर रहा है। क्रान्ति के गीत गाती एक प्यारी-सी लड़की के साथ इक्कीसवीं सदी में आते-आते ही थक गये पूँजीवाद पर जोशीला विमर्श करता है। ग़ालिब, भगत सिंह, अम्बेडकर की बहसों के बीच से क़िस्मत की तेज़ लहरें उसे जेएनयू के द्वीप से उठाकर संघर्ष की मुख्यधारा की ज़मीन पर पटक जाती हैं। जेएनयू की अकादमिक विरासत और दिल्ली पुलिस का बिल्ला दोनों कन्धे पर एक साथ नहीं रह सकते थे। जेएनयू से जुदा होने के बाद फिर एक बार उसकी ज़िन्दगी में जेएनयू आता है। किसान आन्दोलन, दिल्ली की राजनीति के बीच पैदा होती है एक ऐसी अकादमिक अपराध कथा जो अभिमन्यु की तासीर की तस्दीक़ करती है।
अच्छा पढ़ने का सुख, जीवन के कई सुखों में से एक था। इसी सुख से एक ललक पैदा हुई लिखने की। इसी ललक ने पैदा किया अभिमन्यु को। इसके बाद चिन्ता हुई कि भविष्य क्या होगा इस किरदार का? क्या इसे पढ़ना पाठकों के लिए सुखकर होगा? पाठक पचहत्तर पेज पढ़ने के बाद क्या एक बार आख़िरी पृष्ठ-संख्या देखकर सोचेगा कि इसे पूरा पढ़ ही लूँ, तब अपनी कॉफ़ी बनाने जाऊँ? क्या अदरकवाली चाय की गन्ध के साथ दिमाग़ पर अभिमन्यु की गन्ध भी तारी होगी? किताब बन्द करने के बाद भी क्या पाठकों के दिलो-दिमाग़ पर उसका क़िस्सा खुला रहेगा? क्या पाठक शाब्दिक अभिमन्यु के हिसाब से कोई रंग-रूप भी देने लगेंगे? दो उपन्यास के बाद इन सबका जवाब ‘हाँ’ में मिल रहा है। अन्दाज़ा नहीं था कि अभिमन्यु को पाठकों का इतना बड़ा परिवार और प्यार मिलेगा। इस प्यार के सदक़े अब अभिमन्यु मेरा नहीं आपका किरदार है।
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Hindi Books, Rajkamal Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)
Upanyas Ki Sanrachana
उपन्यास एक अमूर्त रचना-वस्तु है। ‘वस्तु’ है तो उसका ‘रूप’ भी होगा ही। ‘रूप’ का एक पक्ष वह है, जिसे उपन्यासकार निर्मित करता है। उसका दूसरा पक्ष वह है जिसे पाठक अपनी चेतना में निर्मित करता है। पर उपन्यास का ‘रूप’ चाहे जितना भी अमूर्त और ‘पाठ-सापेक्ष’ हो, वह होता जरूर है। उसकी संरचना को समझना आलोचक के लिए चुनौती है, पर वह सर्वथा पकड़ के बाहर है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अँगरेजी और यूरोप की अन्य भाषाओं में इसके प्रयास हुए हैं और इस विषय पर अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। पर उन आलोचकों ने स्वभावतः अपनी भाषाओं के उपन्यासों को ही अपने विवेचन का आधार बनाया है। यहाँ तक कि भारतीय साहित्य में उपलब्ध कथा-रूपों की ओर भी उनकी दृष्टि नहीं गई है। हिन्दी आलोचना भी उपन्यास की ओर विगत कुछ दशकों से ही उन्मुख हुई है। पर आलोचकों की दृष्टि जितनी उसके कथ्य पर रही है, उतनी उसकी संरचना पर नहीं। उपन्यास किस प्रकार ‘बनता’ है, पाठक की चेतना में वह कैसे ‘रूप’ ग्रहण करता है, इस किताब में इसी की तलाश लेखक का उद्देश्य है।
आरम्भिक दो परिच्छेदों में औपन्यासिक संरचना का सैद्धान्तिक विवेचन करने के बाद परवर्ती आठ परिच्छेदों में लगभग दो दर्जन हिन्दी उपन्यासों की संरचना का सविस्तार विवेचन किया गया है। विवेच्य रचनाओं के चयन में ध्यान इस बात का रखा गया है कि वे किसी संरचनाविशेष का प्रतिनिधित्व करती हों।
हिन्दी में उपन्यास की संरचना के विवेचन का यह पहला गम्भीर प्रयास है। पर यह कितना सफल है, इसका निर्णय तो पाठक ही करेंगे।SKU: n/a -
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Raazmahal
सब कुछ हो जायेगा। आप बस हाँ बोलो। अगले दस दिन तो आप वहाँ छुपोगी जहाँ कोई सोच भी न पायेगा। सारे देश में आपकी तलाश होगी पर वहाँ नहीं, जहाँ मैं आपको ले जाऊँगा।’ सनम ने कहा।
मधु ने प्रश्नसूचक निगाहों से सनम को देखा। वो तीसरी सिगरेट सुलगा चुकी थी।
‘कहाँ?’ फिर उसने जुबान से भी पूछा।
‘राजमहल।’ सनम ने कहा।
‘क्या? राजमहल ?’
‘जी, राजमहल। कौन सोचेगा कि आप वहाँ हो सकती हैं। मुझे दस दिन राजमहल में रहना है। आप मेरे साथ चलो।’ उसने कहा।
‘अच्छा। मेरे वहाँ जाते ही सब जादू के ज़ोर से अन्धे हो जायेंगे। कोई मुझे पहचानेगा ही नहीं। फिर क्या समस्या है। ऐसा हो जाये तो हम सदा ही वहाँ क्यों न रहें?’ मधु ने विनोदपूर्ण स्वर में कहा।
सनम ने आहत भाव से उसे देखा।
‘रानी साहिबा । मैं वहाँ आपको ऐसे बना कर ले जाऊँगा कि आईना भी आपको पहचान न पायेगा। आप बस हाँ कहो।’ सनम ने कहा ।
मन में डर घर कर जाये तो शरीर का सुरक्षा चक्र ख़ुद ही सक्रिय हो जाता है। मधु के साथ भी यही हो चुका था।****
क़ुदरत की गोद में बसी इस घाटी की इस ख़ुशनुमा आलीशान शाम के सीने में भी जैसे किसी ने चाकू घोंप दिया था। माहौल ग़मजदा हो गया था। तमन्ना तय न कर पा रही थी कि वो मुझे आगे बोलने को कहे या न कहे। आगे के अंजाम से बेफ़िक्र विभा गुप्ता के चेहरे पर परम सन्तोष के भाव थे। मधुमालिनी सनम के साथ चिपक कर खड़ी हैरत से सब सुन रही थी। प्रलाक्षा को अहसास हो गया था कि मैं कुछ ऐसा कहने जा रहा था जो प्रतिकार की आइन्दा ज़िन्दगी पर विपरीत असर डाल सकता था, वो प्रार्थना के भाव से मुझे देख रही थी।
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Ambedkar : Ek Jeevan
बाबासाहेब भीमराव रामजी अम्बेडकर, एम.ए., एम.एससी., पीएच.डी., डी.एस.सी., डी.लिट्., बार-ऐट-लॉ, आज सबसे ज्यादा सम्मानित भारतीयों में शामिल हैं। भारत भर में लगी उनकी प्रतिमाओं की संख्या महात्मा गांधी के बाद दूसरे स्थान पर है। आधुनिक काल के ‘सबसे महान ‘भारतीय’ के चुनाव के लिए किये गये एक हालिया पोल जिसमें दो करोड़ से भी ज़्यादा वोट डाले गये थे, उन्होंने गांधी को भी पीछे छोड़ दिया। सभी बड़े राजनीतिक दल उन्हें अपना बताने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते हैं। दलितों के लिए वो एक सम्मानित शख़्सियत हैं, जिन्होंने अस्पृश्यता को गैर-कानूनी बनाने और समुदाय को प्रतिष्ठा दिलाने में मुख्य भूमिका निभायी। उन्हें संविधान का जनक कहा जाता है। और यही वो प्रधान कारण है कि भारत में उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी मूल्यों ( हालाँकि ये सब वर्तमान में संकट में हैं) के साथ लोकतन्त्र बना हुआ है और जिसके तहत व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा और वंचितों के उत्थान का प्रयास किया जाता है। शशि थरूर लिखते हैं: ‘डॉ. अम्बेडकर की महानता उनकी किसी एक उपलब्धि की वजह से नहीं है, बल्कि उनकी सभी उपलब्धियाँ असाधारण थीं।
इस नयी जीवनी में थरूर बेहद सरलता, अन्तर्दृष्टि और प्रशंसा के भाव के साथ अम्बेडकर की कहानी बताते हैं। वे महान अम्बेडकर के जीवनवृत्त की 14 अप्रैल 1891 को बम्बई प्रेसीडेंसी में महारों के परिवार में जन्म से लेकर 6 दिसम्बर 1956 को दिल्ली में उनके निधन तक पड़ताल करते हैं। वो उन तमाम अपमान और बाधाओं के बारे में बताते हैं जिससे अम्बेडकर को उबरना पड़ा, एक ऐसे समाज में जिसमें वो पैदा हुए थे और जहाँ उनका समुदाय कलंकित माना जाता था। अपने एकचित्त दृढ़ संकल्प से अम्बेडकर ने उन सभी अवरोधों को पार किया जो उनके रास्ते में आये। इस पुस्तक से हमें उन तमाम लड़ाइयों को समझने की अन्तर्दृष्टि मिलती है जिन्हें अस्पृश्यता को गैर-कानूनी बनाने के लिए अम्बेडकर को लड़नी पड़ीं। इससे हमें उस दौर की गांधी और नेहरू जैसी बड़ी राजनीतिक और बौद्धिक शख़्सियतों से अम्बेडकर के मतभेदों को समझने का मौका मिलता है। साथ ही भारत को एक विज़नरी संविधान देने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का पता चलता है जिसमें व्यक्ति के अहस्तान्तरणीय अधिकारों और सामाजिक न्याय के आधुनिक विचारों को प्रतिष्ठापित किया गया है। थरूर लिखते हैं कि ‘ऐसा करते हुए अम्बेडकर ने ऐसे उन लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया जो अभी पैदा भी नहीं हुए और अपनी बौद्धिकता और क़लम की ताक़त से एक प्राचीन सभ्यता को आधुनिक युग में ले आये।
गम्भीर शोध, अनुसन्धान और अन्तर्दृष्टि से लवरेज ये पुस्तक अम्बेडकर : एक जीवन पाठकों को महानतम भारतीयों में से एक अम्बेडकर को देखने और उनके मूल्यांकन की एक नयी समझ पैदा करती है।
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Hindi Books, Vani Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Main Hindu Kyon Hoon
“इक्कीसवीं सदी में, हिन्दूवाद में एक सार्वभौमिक धर्म के बहुत से गुण दिखाई देते हैं। एक ऐसा धर्म, जो एक निजी और व्यक्तिवादी धर्म है; जो व्यक्ति को समूह से ऊपर रखता है, उसे समूह के अंग के रूप में नहीं देखता। एक ऐसा धर्म, जो अपने अनुयायियों को जीवन का सच्चा अर्थ स्वयं खोजने की पूरी स्वतन्त्रता देता है और इसका सम्मान करता है। एक ऐसा धर्म, जो धर्म के पालन के किसी भी तौर-तरीके के चुनाव की ही नहीं, बल्कि निराकार ईश्वर की किसी भी छवि के चुनाव की भी पूरी छूट देता है। एक ऐसा धर्म, जो प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं सोच-विचार करने, चिन्तन-मनन और आत्म-अध्ययन की स्वतन्त्रता देता है।”
“हिन्दूवाद एक अन्तर-निर्देशित या अन्तर- उन्मुख धर्म है जो आत्म-बोध पर और आत्मा और ब्रह्म (परमात्मा) के मिलन या एकात्मता पर जोर देता है। दूसरी तरफ़, हिन्दुत्व एक बाह्य उन्मुख धारणा है, जो एक राजनीतिक उद्देश्य के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान पर केन्द्रित है। इसलिए ‘हिन्दुत्व’ हिन्दूवाद के केन्द्रीय सिद्धान्तों और मान्यताओं से पूरी तरह कटी हुई धारणा है। फिर भी यह हिन्दूवाद की पीठ पर सवार होकर और इसका प्रतिनिधित्व करने का दावा करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है। यह हिन्दू धर्म को ईश्वर के साथ जुड़ने के माध्यम की बजाय एक सांसारिक-राजनीतिक पहचान के बिल्ले के रूप में देखती है। इसका स्वामी विवेकानन्द या आदि शंकराचार्य के हिन्दूवाद से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है।”
‘हिन्दुत्व अभियान’ आत्मविश्वास का प्रतीक न होकर असुरक्षा की भावना का सूचक है। यह अतीत में बार-बार मुसलमानों के हाथों हिन्दू राजाओं की पराजय और अपमान की कथाओं और विजेताओं द्वारा मन्दिरों के विनाश और ख़ज़ानों की लूट की घटनाओं की याद दिलाते रहने पर ही टिका हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दुत्व वृत्तान्त हिन्दुओं को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करता है, न कि एक महान सभ्यता और धर्म के गर्वीले प्रतिनिधियों के रूप में। यह विफलता और पराजय की भावना का वृत्तान्त है, न कि एक महान और विश्व के सबसे उदात्त धर्म का आत्मविश्वास भरा वृत्तान्त। यह अतीत की विफलताओं की स्मृतियों में क़ैद वृत्तान्त है, इसलिए इसे एक विकासशील वर्तमान और सुनहरा भविष्य दिखाई ही नहीं देता । ”
“एक हिन्दू के रूप में मैं ऐसे धर्म से सम्बन्ध रखता हूँ जो मेरे पूर्वजों के प्राचीन ज्ञान से ओत-प्रोत है। मैं अपनी जन्मभूमि में अपने धर्म के इतिहास पर गर्व करता हूँ। मैं आदि शंकराचार्य की यात्राओं पर गर्व करता हूँ, जिन्होंने देश के दक्षिणी छोर से उत्तर में कश्मीर तक और पश्चिम में गुजरात से पूर्व में ओडिशा तक यात्राएँ करते हुए हर जगह विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया, धार्मिक प्रवचन दिये और अपने मठ स्थापित किये। मेरी इस भावना को हार्वर्ड की विद्वान डायना ईक के भारत के ‘पवित्र भूगोल’ की इन पंक्तियों से और बल मिलता है- ‘तीर्थयात्राओं के अनेकानेक भागों से आपस में गुँथे लोग’ । महान दार्शनिक और भारत के राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने हिन्दुओं को परिभाषित करते हुए लिखा था – ‘एक साझे इतिहास, साझे साहित्य और साझी सभ्यता वाली विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई’ । हिन्दूवाद के साथ अपना जुड़ाव व्यक्त करते हुए मैं सचेत रूप से इस भूगोल और इतिहास, साहित्य और सभ्यता का वारिस होने का दावा करता हूँ; (करोड़ों अन्य वारिसों के साथ) उस आराध्य परम्परा का उत्तराधिकारी होने का दावा, जो युगों-युगों से यूँ ही चली आ रही है।”SKU: n/a -
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Mantra-Viplav
“प्रस्तुत पुस्तक का नाम जिस लेख के शीर्षक पर रखा गया है, उसमें एक वक्तव्य आता है- ‘विष की एक बूँद जिसे दी जाए, उससे केवल वही एक व्यक्ति मरता है। विषैला तीर जिस व्यक्ति पर आघात करे, उससे भी केवल वही एक व्यक्ति मारा जाता है, पर अगर विचार ही भ्रष्ट हो जाए और उसकी समझ में राजा और प्रजा में संभ्रम निर्माण हो तो हे धृतराष्ट्र, उस समय मंत्र-विप्लव की स्थिति पैदा होती है, जिसमें राजा, प्रजा और राष्ट्र-तीनों का नाश हो जाता है।’ यह विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा था। इस पुस्तक के लेखों में उसी मंत्र-विप्लव की स्थिति का प्रतिकार है। उस स्थिति को रोकने टालने का जतन है। मंत्र यानी विचार। विचार ही तो प्रदूषित हो गए हैं हमारे समय में। अगर विचार शुद्ध हो जाएँ, तो सारे झगड़े खत्म हो जाएँ, महासंग्राम की स्थिति पैदा ही न होने पाए।
तरुण विजय की चिंता के केंद्र में वह सबकुछ है, जो मनुष्य-विरोधी है, मानव समाज, इस जीव-जगत् के लिए अहितकर है। इस पुस्तक के लेखों में राजनीतिक अनीतियों पर प्रहार है, तो मनुष्य के लिए खतरा पैदा कर रही उन तमाम मानवीय गतिविधियों, भ्रष्ट आचरण, अधर्म, यानी मात्र व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए चली जा रही चालों-कुचालों पर भी कठोर वैचारिक वार है। इन लेखों की प्रकृति ललित निबंधों की है, इनमें भाषा का माधुर्य मन को मोहता है।”
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Rahon Ke Anveshi
राहों के अन्वेषी’ पुस्तक में प्रयोगवाद के प्रणेता अज्ञेय एवं उनके समकालीन, प्रतिभाशाली प्रयोगवादी कवि धर्मवीर भारती के काव्य में बिंब के सौंदर्य की विवेचना की गई है। यह विवेचनात्मक समीक्षा काव्य-प्रेमियों और कवियों, जो आज भी अपने काव्य में बिंब का प्रयोग करने का प्रयास करते हैं, के लिए एक सार्थक पाठ्य-सामग्री साबित हो सकती है, क्योंकि इसमें इन दोनों बड़े कवियों के लगभग सभी प्रकार के सुंदर बिंब उदाहरणस्वरूप, व्याख्या सहित दिए गए हैं, जो अच्छा काव्य पढ़ने वाले और सार्थक कविता लिखने वाले, दोनों के लिए लाभकारी और प्रेरणादायक हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह सकारात्मक समीक्षा इन दोनों कवियों पर शोध करने वाले, विशेषकर बिंब पर कार्य करने वाले, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए भी अत्यंत लाभदायक साबित हो सकती है, क्योंकि पुस्तक में बिंब के परिचय सहित विशिष्ट बिंबों के सैकड़ों उदाहरण हैं।
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Apna Morcha
काशीनाथ सिंह का नाम सामने आते ही उस तैराक का चित्र आँखों के सामने तैर जाता है, जो एक चढ़ी हुई नदी में, धारा के विरुद्ध हाथ-पाँव मारता चला आता हो। ‘अपना मोर्चा’ स्वयं में इसकी सर्वश्रेष्ठ गवाही है। यह मोर्चा प्रतिरोध की उस मानसिकता का बहुमूल्य दस्तावेज़ है जिसे इस देश के युवा वर्ग ने पहली बार अर्जित किया था। एक चेतन अँगड़ाई इतिहास की करवट बनी थी—जब विश्वविद्यालय से टूटा हुआ भाषा का सवाल, पूरे सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे का सवाल बन गया था और आन्दोलनों की लहरें जनमानस को भिगोने लगी थीं।
हम क्यों पढ़ते हैं? ये विश्वविद्यालय क्यों? भाषा केवल एक लिपि ही क्यों, जीवन की भाषा क्यों नहीं? छात्रों, अध्यापकों, मज़दूरों और किसानों के अपने-अपने सवाल अलग-अलग क्यों हैं? व्यवस्था उन्हें किस तरह भटकाकर तोड़ती है? एक छोटी-सी कृति में इन सारे सवालों को उछाला है काशीनाथ सिंह ने। इनके जवाबों के लिए लोग ख़ुद अपनी आत्मा टटोलें, यह सार्थक आग्रह भी इस कृति का है।
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Sansad Me Gaon Gareeb Kisan Ki Baat
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श्री हुक्मदेव नारायण यादव एक संघर्षशील, संवेदनशील राजनेता, विचार-प्रवण एवं गंभीर सांसद हैं। बिहार में विधानसभा और भारतीय संसद्, दोनों ही में उन्होंने अपने व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ी है।
‘संसद् में गाँव, गरीब, किसान की बात’ पुस्तक उनके विविध विषयों पर दिए गए उद्बोधनों का संकलन है। संसद् के साथ-साथ संसदीय समितियों में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण विचार रखे हैं। संसद् के शून्यकाल में भी उन्होंने लोक-महत्त्व के विविध विषयों पर बोलते हुए सरकार एवं देश के समक्ष रचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया तथा राष्ट्रहित एवं जनहित की दृष्टि से कठोर आलोचना भी की।
हुक्मदेव बाबू के वक्तव्यों में जहाँ डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों की गहरी छाप है, वहीं एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय और महात्मा गांधी के सिद्धांतों के सामाजिक-आर्थिक पक्ष का भी प्रतिबिंबन होता है। जहाँ वे पिछड़े और दलितों के उत्थान एवं अधिकारों के लिए बड़े आग्रह के साथ बोलते हैं तो वहीं वे दीनदयालजी के समरस समाज के निर्माण का भी पुरजोर समर्थन करते हैं। एक ओर जब वे बाढ़ और सुखाड़ की त्रासदी से पीडि़त जनसमूह के लिए दर्द भरी आवाज उठाते हैं तो दूसरी ओर वे हिमालय की रक्षा के संकल्प का भी भरपूर समर्थन करते हैं। उनके संसदीय वक्तव्यों का पाठन अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।SKU: n/a -
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Kasmai Devay
‘‘…हमारे कवियों की कविता से प्रकृति के विविध अवयव धीरे-धीरे गायब हो गए हैं। ऐसे समय में मिश्रजी की कविताएँ सुखद अनुभूति प्रदान करती हैं। उनके पास भाषा, शिल्प और शब्दों का अद्भुत भंडार है।’’
‘‘श्री मिश्र प्रकृति से गहराई से जुड़े हैं, वे काव्य सृजन के लिए बार-बार प्रकृति के पास जाते हैं। प्रकृति उनके साथ पूरा सहयोग भी करती है। वे लोप होती हुई संवेदनाओं के कवि हैं।’’
—प्रो. कुँवर पाल सिंहSKU: n/a -
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Mahabharat : Ek Navin Rupantaran
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Hindi Books, Rajkamal Prakashan, उपन्यास, सही आख्यान (True narrative)Mahabharat : Ek Navin Rupantaran
‘महाभारत’ विश्व-इतिहास का प्राचीनतम महाकाव्य है। होमर की ‘इलियड’ और ‘ओडीसी’ से कहीं ज़्यादा प्रवीणता के साथ परिकल्पित और शिप्लित यह रचनात्मक कल्पना की अद्भुत कृति है। ऋषि वेदव्यास द्वारा ईसा के प्रायः 2000 वर्ष पूर्व रचित इस महाकाव्य में लगभग समस्त मानवीय मनोभावों—प्रेम और घृणा, क्षमा और प्रतिशोध, सत्य और असत्य, ब्रह्मचर्य और सम्भोग, निष्ठा और विश्वासघात, उदारता और लिप्सा—की सूक्ष्म प्रस्तुति मिलती है।
यों तो ‘महाभारत’ भारतीय मानस में रचा-बसा ग्रन्थ है, पर इसने सम्पूर्ण विश्व के पाठकों को आकर्षित किया है। शायद इसीलिए इस महाकाव्य का रूपान्तर विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में हुआ है। परन्तु विस्मय होता है यह देखकर कि ज़्यादातर रूपान्तरों में इसकी क्षमता का प्रतिपादन एक काव्यात्मक सौन्दर्य और सुगन्ध से समृद्ध कथा के रूप में नहीं हो पाया है। सम्भवतः इसलिए कि लेखकों ने मूलतः इसके कहानी पक्ष को ही प्रधानता दी।…किन्तु इस पुस्तक के लेखक शिव के. कुमार ने इसी कारण इस महाकाव्य में कुछ रंग और सुगन्ध भरने का प्रयास किया है।
यह वस्तुतः ‘महाभारत’ का एक नवीन रूपान्तर है। ‘महाभारत’ एक अद्वितीय रचना है। यह काल और स्थान की सीमाओं से परे है। इसलिए हर युग में इसके साथ संवाद सम्भव है। वर्तमान युग में भी सामाजिक न्याय, राजनीतिक स्वार्थजनित राष्ट्र विभाजन, नारी सशक्तिकरण और राजनेताओं के आचरण के सन्दर्भों में इसका आर्थिक औचित्य है। अंग्रेज़ी से हिन्दी में इस कृति का अनुवाद करते हुए प्रभा के. सिंह ने हिन्दी भाषा की प्रकृति का विशेष ध्यान रखा है। समग्रतः एक अनूठी रचना।
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Revolution Highway
‘रिवोल्यूशन हाइवे’ बेचैन दशक के नाम से विख्यात, पिछली सदी के सातवें दशक की स्मृतियों के गम्भीर, विचारोत्तेजक और संवेदनशील मन्थन का आख्यान है। नक्सलबाड़ी का किसान-विद्रोह, उस विद्रोह में बुद्धिजीवियों, छात्रों की भागीदारी, बांग्लादेश का जन्म, वियतनाम युद्ध और विश्वव्यापी छात्र-असन्तोष इस आख्यान की पृष्ठभूमि में हैं।
नक्सलवादी आन्दोलन के उस दौर में लेखक की व्यक्तिगत संलग्नता जहाँ इस उपन्यास को सर्जनात्मक संस्मरण की विश्वसनीयता देती है, वहीं समूचे घटनाक्रम पर नैतिक पुनर्विचार का साहस ‘रिवोल्यूशन हाइवे’ को एक वैचारिक चुनौती के धरातल पर भी ले जाता है। यह कथा हिंसा-अहिंसा, इतिहास-राजनीति, सही-ग़लत, वर्तमान-भविष्य के यक्ष-प्रश्नों से जूझती बेचैन आत्माओं की कथा है।
‘रिवोल्यूशन हाइवे’ भीतर-बाहर के द्वन्द्वों में व्याप्त जीवनानुभव और मोहभंग पर विचार-पुनर्विचार के ज़रिए अर्जित होनेवाले विवेक की कथा है। प्रतिशोध से पगलाया, विवेक-मणि से वंचित अमरता का अभिशाप ढो रहा अश्वत्थामा इस आख्यान की मूल वेदना का रूपक है। उपन्यास एक तरह से अश्वत्थामा की आत्मा की शान्ति का अनुष्ठान भी है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
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