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KESARIMILK, Swadeshi Products
Gir Cow Dung Cake (4 Piece)
100% Pure & Best, Organic and Eco friendly
Cow dung cakes have been used in traditional Indian households for yagnas, ceremonies, rituals. Pure Desi cow dung cake
It is used to purify air as it is said to release oxygen when burnt with Ghee
Brings positive energy by shedding negative energy in the house and eliminating germs with disease
Material: Cow Dung, Color: Brown, Package ContentsSKU: n/a -
Chaukhamba Prakashan, Hindi Books, Suggested Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Caraka Samhita Set Of 2
-10%
Chaukhamba Prakashan, Hindi Books, Suggested Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Caraka Samhita Set Of 2
योऽपूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै ।
भूमिका
अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते ।
ऐतिह्यज्ञानदिग्धाङ्गी भूमिकेयं विलिख्यते ।।
आयुर्वेद अथर्ववेद का उपांग है, इस तथ्य को समस्त सुधी समाज समान रूप से स्वीकार करता है। केवल ‘चरणव्यूह’ में इसको ऋग्वेद का उपांग कहा गया है। अतः इसका प्रभाव लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार का स्वीकृत है। इसके आदिम उपदेष्टा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा थे । प्रारम्भ में यह ज्ञान देवलोक तक ही सीमित था। कालान्तर में प्राणिमात्र के हित की दृष्टि से इन्द्रादि देवों ने इस ज्ञान को प्राप्त कर उसका प्रसार मृत्युलोक में किया। इस सम्बन्ध की कथा चरक में वर्णित है’। यह आयुर्वेद त्रिस्कन्धात्मक था ।
प्रस्तुत त्रिस्कन्धात्मक आयुर्वेद कालान्तर में मेधाशक्ति की कमी के कारण मनुष्यमात्र के लिये दुरूह हो गया था। फलतः ब्रह्मा ने उक्त लक्षश्लोकात्मक आयुर्वेदशास्त्र को आठ अंगों में विभाजित कर दिया। इन अंगों अथवा तन्त्रों के नाम हैं- १. शल्य, २. शालाक्य, ३. काय-चिकित्सा, ४. भूतविद्या, ५. कौमारभृत्य, ६. अगदतन्त्र, ७. रसायन, ८. वाजीकरण । आयुर्वेदीय विभिन्न संहिताओं में ये नाम कुछ परिवर्तन के साथ उपलब्ध होते हैं।
चरकसंहिता के आरम्भ में दिये गये आयुर्वेदावतरण के अनुसार ब्रह्मा से प्रजापति ने, प्रजापति से अश्विनीकुमारों ने, अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने और इन्द्र से भरद्वाज ने आयुर्वेद की सम्पत्ति को अर्जित किया और इनसे अन्य ऋषियों को उक्त ज्ञानसम्पत्ति प्राप्त हुई ।
चरक सूत्रस्थान अ० १।८-१३ में जिन महर्षियों की चर्चा है उनके अतिरिक्त भी अनेक महर्षि उस विचारगोष्ठी में सम्मिलित थे। उनमें एक ‘पुनर्वसु आत्रेय’ भी थे, जिन्होंने अपने निम्नोक्त छः शिष्यों को यह ज्ञानराशि प्रदान की। उनके क्रमशः ये नाम हैं- १. अग्निवेश २. भेल, ३. जतूकर्ण, ४. पराशर, ५. हारीत तथा ६. क्षारपाणि ।
१. च० सू० अ० १ श्लोक ८-१३।
२. सुश्रुतसंहिता – सूत्रस्थान १।६।
३. चरकसंहिता-सूत्रस्थान ३०।२८ । सुश्रुतसंहिता – सूत्रस्थान १।७। काश्यपसंहिता १.० ४२ निर्णय सागर प्रेस ।
४. ब्रह्मणा हि यथाप्रोक्तमायुर्वेदं प्रजाप्रतिः ।
जग्राह निखिलेनादावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥
अश्विभ्यां भगवान्छक्रः प्रतिपेदे ६ केवलम् ।
ऋषिश्रोक्तो भरद्वा जस्तस्माच्छक्रमुपागमत् ॥ च० सू० १।४-५ ।
ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम् ॥ च० सू० १।२७ ।
५. अथ मैत्रीपरः पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः ।
शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया ॥
अग्निवेशश्च भेल (ड) श्व जतूकर्णः पराशरः ।
हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥ च० सू० १।३०-३१ ।SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
Assi Ke Raisahab
“रामबहादुर राय, पिता श्री शिवदत्त राय, माँ श्रीमती फूलवती देवी, जन्म 4 फरवरी, 1946 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित रेवतीपुर गाँव (ननिहाल) में हुआ; मूलत : सोनाड़ी गाँव, गाजीपुर के निवासी । दस्तावेजों में जन्मतिथि 1 जुलाई, 1946 दर्ज है। प्रारंभिक शिक्षा मालदा (बंगाल) और गाजीपुर में। पिता किसान थे। किशोरावस्था में कम्युनिस्ट नेता सरजू पांडे से प्रभावित; सन् 1965 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र रहते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े।
सन् 1971 में जयप्रकाश नारायण और 1972 में गोविंदाचार्य के संपर्क में आए। नवंबर 1973 में बिहार आंदोलन के सूत्रधार बने। जेपी आंदोलन के दौरान मीसा में 9 अप्रैल, 1974 को पहली गिरफ्तारी। आपातकाल के दौरान डी.आई.आर. में बनारस में गिरफ्तार हुए। अक्तूबर 1979 में जेपी के निधन के बाद पत्रकारिता में जाने का फैसला। शुरुआत हिंदुस्थान समाचार से। अप्रैल 1983 में प्रभाष जोशी के नेतृत्ववाली जनसत्ता लॉञ्चिंग टीम के हिस्सा बने, इसके बाद 1986 में नवभारत टाइम्स में राजेंद्र माथुर के साथ। 1991 में उनके निधन के बाद जनसत्ता वापसी, वहाँ वर्ष 2004 तक सेवारत रहे। 2006 में ‘प्रथम प्रवक्ता’ पत्रिका से जुड़े; लेकिन 2010 में वहाँ से मुक्त हो गए। 15 अगस्त, 2013 को ‘यथावत’ पत्रिका की शुरुआत। 2016 से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष हैं।
प्रकाशित पुस्तकें : ‘मंजिल से ज्यादा सफर’ (पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की जीवनी); ‘रहबरी के सवाल’ (पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जीवनी); ‘शाश्वत विद्रोही राजनेता: आचार्य जे.बी. कृपलानी’ (आचार्य जे.बी. कृपलानी की जीवनी); ‘भारतीय संविधान की अनकही कहानी’ (हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में); ‘भानुप्रताप शुक्ल : व्यक्तित्व एवं विचार’ ।”
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Chaukhamba Prakashan, Hindi Books, Suggested Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Shiv Maha Puran(set of 5 vols)
-15%
Chaukhamba Prakashan, Hindi Books, Suggested Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Shiv Maha Puran(set of 5 vols)
शिव पुराण सभी पुराणों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुराणों में से एक है। भगवान शिव के विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिर्लिंगों, भक्तों और भक्ति का विशद् वर्णन किया गया है। इसमें शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। । शिव पुराण में शिव को पंचदेवों में प्रधान अनादि सिद्ध परमेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। शिव-महिमा, लीला-कथाओं के अतिरिक्त इसमें पूजा-पद्धति, अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद कथाओं का सुन्दर संयोजन है। इसमें भगवान शिव के भव्यतम व्यक्तित्व का गुणगान किया गया है। शिव- जो स्वयंभू हैं, शाश्वत हैं, सर्वोच्च सत्ता है, विश्व चेतना हैं और ब्रह्माण्डीय अस्तित्व के आधार हैं।
‘शिव पुराण’ का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्रायः सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु ‘शिव पुराण’ में शिव के जीवन चरित्] पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है।
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Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Muhammad Se Asahmati: Kya Aur Kyon
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Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृतिMuhammad Se Asahmati: Kya Aur Kyon
सितंबर 2025 में भारत में ‘आई लव मुहम्मद’ और ‘आई लव मोदी’ की तुलना करते हुए वरिष्ठ नेता असदुद्दीन ओवैसी ने अनेक वक्तव्य दिए थे। कुछ समय बाद, मौलाना महमूद मदनी ने जिहाद को ‘बदनाम’ करने का आरोप लगाकर बड़ी तीखी बातें कही थी।
उन सब बातों – मुहम्मद, जिहाद, जुल्म, और लव जिहाद से संबंधित वक्तव्यों की एक आलोचना इस पुस्तक में रखी गई है। मुस्लिम नेता आधी-अधूरी बातें कहते हैं। उस से लोग गुमराह होते हैं। अतः पूरी बातें सामने आनी चाहिए। उन के बारे में इस्लाम के मूल स्त्रोत ही प्रमाणिक रूप से बताते हैं। जिसे इस पुस्तक में संक्षेप में रखा गया है- जिन्हें पाठक खुद आसानी से परख सकते हैं।
date location
अनुक्रम : पृष्ठभूमि; 1. ओवैसी की मोदी-मुहम्मद तुलना; 2. पहले मुहम्मद को
जानना जरूरी; 3. मुहम्मद प्रोफेट थे या योद्धा ?; 4. मौलाना का जुल्म-ओ-जिहाद; 5. लव जिहाद की पहचान-ओ-पैमाना; परिशिष्ट 1: डॉ. अंबेदकर की नजर में मुस्लिम राजनीति; परिशिष्ट 2: धर्म के कारण / तसलीमा नसरीन; ग्रंथ सूची।SKU: n/a -
Hindi Books, Vani Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Asmita Ka Sangharsh Rashtravaad Deshprem Aur Bharatiya Hone Ka Arth
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Hindi Books, Vani Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Asmita Ka Sangharsh Rashtravaad Deshprem Aur Bharatiya Hone Ka Arth
छह भागों में लिखी गयी यह पुस्तक राष्ट्रवाद, देशप्रेम, उदारवाद, लोकतन्त्र और मानवतावाद जैसे ऐतिहासिक और समकालीन विषयों के विस्तृत विश्लेषण के साथ आरम्भ होती है। इनमें से अधिकांश विचारों की उत्पत्ति अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी की अवधि में पश्चिम में हुई थी लेकिन बहुत जल्दी ही इन विचारों का विस्तार दुनिया के कोने-कोने में हो गया। इसी परिप्रेक्ष्य में गाँधी, नेहरू, टैगोर, अम्बेडकर, पटेल, आज़ाद आदि जैसे भारत के अग्रणी नेताओं के सजग वैचारिक मूल्यों का अन्वेषण करते हुए लेखक ने उपर्युक्त विचारों की व्याख्या करने का सफल प्रयास किया है। किन्तु दुर्भाग्यवश आज इन महान विचारों की मुठभेड़ हिन्दुत्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले सिद्धान्तकारों और सत्ता के शीर्ष पर आसीन, और ‘हम बनाम वे’ की बाँटने वाली राजनीति में आस्था रखने वाले उनके संकीर्णतावादी, विभाजनकारी और साम्प्रदायिक अनुगामियों के साथ हो रही है। आज का संघर्ष भारत के इन दो परस्पर विरोधी विचारों के बीच का द्वन्द्व है जिसे जातीय-धार्मिक राष्ट्रवाद बनाम नागरिक राष्ट्रवाद के द्वन्द्व के नाम से व्याख्यायित करना अधिक उपयुक्त होगा। आज भारत की आत्मा की लड़ाई पहले की बनिस्बत अधिक कठिन और दुर्जेय हो गयी है, और स्वतन्त्रता के बाद के वर्षों में भारत ने बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और समावेशी राष्ट्रीयता के जो विलक्षण विचार अर्जित किये थे, उन्हें स्थायी रूप से क्षति पहुँचाने के संकट निरन्तर मँडरा रहे हैं। आज संविधान पर आधिपत्य जमाया जा चुका है, स्वायत्तशासी संस्थाओं की स्वतन्त्रता को सायास समाप्त किया जा रहा है, मिथकीय इतिहास का निर्माण और प्रचार जारी है, विश्वविद्यालयों को शिकार बनाया जा रहा है, और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अल्पसंख्यकों के विरुद्ध प्रताड़ना और हिंसा की घटनाएँ लगातार घट रही हैं। समय व्यतीत होने के साथ-साथ उन विचारों पर लगातार हमले हो रहे हैं, जिन विचारों के कारण दुनिया भर में भारत की प्रशंसा की जाती थी। स्वेच्छाचारी नेतागण और उनके कट्टरवादी समर्थक देश को संकीर्णता और असहिष्णुता के घटाटोप की ओर ले जा रहे हैं। यदि वे अपनी मंशा में सफल हो जाते हैं तो इस स्थिति में लाखों लोग अपनी पहचान से वंचित कर दिये जायेंगे और महाद्वीप की मिट्टी में भारतीयता के छद्म सिद्धान्तों के बीज फूटने लगेंगे। इसके बाद भी युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है। तर्कसम्मत और प्रांजल भाषा में लिखी गयी यह पुस्तक हमें यह संकेत करती है कि अस्मिता के इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए क्या-क्या उपाय किये जा सकते हैं ताकि उन सभी चीज़ों को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके जो भारत के सन्दर्भ में अतुल्य और अमूल्य हैं। पुस्तक की लेखन-शैली जितनी विद्वत्तापूर्ण है, उतनी ही गम्भीरता और प्रतिबद्धता के साथ इसके केन्द्रीय-विषय पर विमर्श भी किया गया है। ‘अस्मिता का संघर्ष’ निश्चित रूप से एक ऐसी पुस्तक है जो भारतीयता के अर्थ को स्थापित करती है, साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि इक्कीसवीं शताब्दी में एक देशप्रेमी और राष्ट्रवादी भारतीय होने के क्या मायने हैं।
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Hindi Books, Vani Prakashan, उपन्यास
Madhur-Swapna
राहुल सांकृत्यायन (Rahul Sankrityayan)
“राहुल सांकृत्यायन – जन्म : 9 अप्रैल, 1893 मूर्धन्य और अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान राहुल सांकृत्यायन साधु थे, बौद्ध भिक्षु थे, यायावर थे, इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता थे; नाटककार और कथाकार थे और थे जुझारू स्वतन्त्रता सेनानी, किसान-नेता, जन-जन के प्रिय नेता। उनके अनन्य मित्र भदन्त आनन्द कौसल्यायन के शब्दों में- उन्होंने जब जो कुछ सोचा, जब जो कुछ माना, वही लिखा, निर्भय होकर लिखा। चिन्तन के स्तर पर राहुल जी कभी भी न किसी साम्प्रदायिक विचार – सरणी से बँधे रहे और न संगठित सरणी से । वह ‘साधु न चले जमात’ जाति के साधु पुरुष थे। राहुल जी ने धर्म, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, समाज, राजनीति, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषाशास्त्र, संस्कृत ग्रन्थों की टीकाएँ, अनुवाद और इसके साथ-साथ रचनात्मक लेखन करके हिन्दी को इतना कुछ दिया कि हम सदियों तक उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने जीवनियाँ और संस्मरण भी लिखे और अपनी आत्मकथा भी। अनेक दुर्लभ पाण्डुलिपियों की खोज और संग्रहण के लिए व्यापक भ्रमण भी किया। निधन : अप्रैल, 1963SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास
Bharatiya Vaishvik Parishad Vaishvik Samiksha ( Set Of 2 )
-20%
Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहासBharatiya Vaishvik Parishad Vaishvik Samiksha ( Set Of 2 )
वर्ष 2024 वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों, संघर्षों और नई साझेदारियों का वर्ष रहा। रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराइल-हमास संघर्ष और लाल सागर में हूती हमलों ने वैश्विक सुरक्षा, व्यापार और अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं के सामने भी अनेक चुनौतियाँ रहीं। इसी दौरान BRICS+, SCO और अन्य बहुपक्षीय समूहों के बढ़ते प्रभाव ने विश्व व्यवस्था के अधिक बहुध्रुवीय होने के संकेत दिए।
भारत ने 2024 में वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाई। भारत ने ग्लोबल साउथ के हितों को प्रमुखता देते हुए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समावेशी और सुधारित बहुपक्षवाद की आवश्यकता पर जोर दिया। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड के माध्यम से भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ समुद्री सुरक्षा एवं सहयोग को मजबूत किया।
दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, यूरोप, अफ्रीका और मध्य एशिया में राजनीतिक परिवर्तन, संघर्ष और आर्थिक चुनौतियाँ प्रमुख विषय रहे। चाबहार बंदरगाह समझौते सहित भारत की क्षेत्रीय संपर्क पहलों ने उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाया। कुल मिलाकर, 2024 ने बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की सक्रिय, संतुलित और रणनीतिक कूटनीति को रेखांकित किया।
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English Books, Vitasta Publishing, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
The Silk Route of Dharma: India and China’s Enduring Buddhist Dialogue
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English Books, Vitasta Publishing, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृतिThe Silk Route of Dharma: India and China’s Enduring Buddhist Dialogue
About the Author
“Dr Shashibala is a renowned Indologist, cultural diplomacy expert, and Dean of the Centre for Indology at Bharatiya Vidya Bhavan. A recipient of Mongolia’s highest civilian honour, the Order of the Polar Star, she specialises in India’s cultural relations with the world, Buddhism across political boundaries, Sanskrit studies, and the history of art. She serves as President of the International Council of Cultural Studies and Executive Member of the International Academy of Indian Culture. An accomplished author and editor, she has published 26 books, co-edited the nine-volume English–Sanskrit Dictionary with Prof. Lokesh Chandra, and authored over 110 research papers.”SKU: n/a -
Hindi Books, Rajpal and Sons, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Bharat ka Mahamanthan: Rashtra Shasan aur Ganarajya
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Hindi Books, Rajpal and Sons, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Bharat ka Mahamanthan: Rashtra Shasan aur Ganarajya
भारत एक पुनर्विचार
संवाद, सहयोग और सहभागिता के आधार पर तैयार श्रृंखला
यह एक प्रयास है जो :
+ देश की वर्तमान समस्याओं और चुनौतियों के सकारात्मक समाधान को खोजता है।
+ हमारे बुनियादी संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है।
+ एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों के विकास के साझा लक्ष्य को क्रियान्वित करता है।
चौदह पुस्तकों की श्रृंखला समृद्ध भारत फाउंडेशन द्वारा चार वरिष्ठ संपादकों -आकाश सिंह राठौर, मृदुला मुखर्जी, सैयदा हमीद और पुष्पराज देशपांडे की देख-रेख में तैयार की गई है। भारत के 150 प्रमुख विचारकों के योगदान से संपन्न यह श्रृंखला वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिमानों का पुनर्विचार करती है, ताकि भारत के संवैधानिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके। प्रत्येक पुस्तक देश के किसी एक ज्वलंत मुद्दे पर केंद्रित है, और उसे उस विषय के विशेषज्ञों द्वारा लिखा गया है।
भारत का महामंधन : राष्ट्र, शासन और गणराज्य भारत के प्रमुख राजनेताओं और नीति-निर्माताओं के गहन और सार्थक लेखों का संग्रह है। ये सभी लेख भारतीय राज्य की जटिलताओं की पड़ताल करते हैं। इन लेखों के माध्यम से भारतीय राज्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में अपने विशिष्ट दृष्टिकोण से लेखक ऐसे नए और साहसिक समाधान भी सुझाते हैं, जो भारत की प्रगति में बाधा बनने वाली बुनियादी कमियों को दूर कर सकते है।SKU: n/a -
Hindi Books, Rajpal and Sons, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Prem Manjusha
प्रेमचंद द्वारा लिखी सैंकड़ों कहानियों में से चुनी 16 श्रेष्ठ कहानियों का संकलन है प्रेम मंजूषा।
इस संकलन को प्रेमचंद के पुत्र और साहित्यकार अमृतराय ने तैयार किया था
और तब से यह संकलन प्रेमचंद के पाठकों की पहली पसन्द बना रहा है।
विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए यह कहानी संकलन विशेष रूप से उपयोगी है।
इस कहानी संकलन की भूमिका उन विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर लिखी गयी है
जिन्हें परीक्षाओं की दृष्टि से प्रेमचंद की कहानियों का अध्ययन करना है।SKU: n/a -
Hindi Books, Rajpal and Sons, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Dhooni Tapey Teer
1919 – जलियांवाला बाग, अमृतसर के नरसंहार में 300 लोग मारे गये !
1913 – राजस्थान के बांसवाड़ा ज़िले के मानगढ़ पहाड़ पर हुए नरसंहार में 1500 आदिवासी मारे गये !
जलियांवाला बाग से 6 वर्ष पहले हुआ राजस्थान का यह नरसंहार !
जलियांवाला बाग से कई गुणा भीषण !!
1913 में अंग्रेज़ों का राज था। राजस्थान-गुजरात की सीमा पर बांसवाड़ा आदिवासियों का गढ़ था। अंग्रेज़ शासक आदिवासियों का शोषण करते और उनसे नाजायज़ कर वसूलते। अंग्रेज़ों के अन्याय के खिलाफ वहाँ के समाज सुधारक गोविन्द गुरु ने आदिवासियों को संगठित करने के लिए 1883 में संप सभा की स्थापना की। 17 नवम्बर 1913 को बड़ी संख्या में मानगढ़ की पहाड़ी पर संप सभा के आदिवासी शांतिपूर्वक इकट्ठा हुए। शांतिपूर्ण सभा में बैठे इन निहत्थे आदिवासियों पर अंग्रेज़ों और स्थानीय राजाओं की सेनाओं ने अचानक अंधाधुंध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं… और मानगढ़ की पहाड़ी आदिवासियों के खून से लाल हो गई।
आदिवासी भीषण नरसंहार के 89 वर्ष बाद 2002 में इस शहादत के स्थान पर पहाड़ी के ऊपर एक शहीद स्मारक बनाया गया है। स्थानीय पत्थर से बना यह भव्य, ऊँचा स्मारक आदिवासियों के शौर्य, स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक है।
2008 में हरिराम मीणा ने गहन शोध के बाद इस खूनी आदिवासी नरसंहार पर “धूणी तपे तीर” उपन्यास लिखा, जो अब 2026 में नयी साज-सज्जा के साथ पुनःप्रकाशित है। हरिराम मीणा एक प्रतिष्ठित लेखक और बुद्धिजीवी हैं जिनका आदिवासी समाज के प्रति गहरा सरोकार है।
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Hindi Books, Rajpal and Sons, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Premchand ke Shreshtha Nibandh
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Hindi Books, Rajpal and Sons, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Premchand ke Shreshtha Nibandh
हिन्दी साहित्य के सुपरिचित अध्येता, आलोचक और संपादक डॉ. पल्लव ने प्रेमचंद के निबंधों का यह संकलन तैयार किया है और एक लम्बी भूमिका भी लिखी है। उनकी अनेक मौलिक व संपादित किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें प्रेमचंद की व्यंग्य कथाएँ, प्रेमचंद की स्वतंत्रता संग्राम कवाएँ, प्रेमचंद की दलित कथाएँ, प्रेमचंद की स्त्री कथाएँ तथा एक दो तीन उल्लेखनीय हैं। साहित्य संस्कृति के संचयन बनास जन का संपादन कर रहे डॉ. पल्लव को 2008 का भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का ‘युवा पुरस्कार’, 2012 का ‘आचार्य निरंजननाथ प्रथम कृति सम्मान’ तथा 2018 का ‘राजस्थान पत्रिका सृजन पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। 2010 से डॉ. पल्लव दिल्ली के प्रतिष्ठित हिन्दू कॉलेज में कार्यरत हैं।
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Hindi Books, Literature & Fiction, Navchetan Book, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें
Manikarnika: The Burning Ghat – Ek Yatra Adhyatmikta Ki Aur
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Hindi Books, Literature & Fiction, Navchetan Book, अध्यात्म की अन्य पुस्तकेंManikarnika: The Burning Ghat – Ek Yatra Adhyatmikta Ki Aur
“मणिकर्णिका: द बर्निंग घाट” एक गहरी और प्रेरणादायक आध्यात्मिक यात्रा है, जो आत्म-खोज, आंतरिक शांति और जीवन के सच्चे अर्थ की शाश्वत खोज पर आधारित है। दुनिया के सबसे पुराने और सबसे पूजनीय श्मशान घाटों में से एक, पवित्र मणिकर्णिका घाट की पृष्ठभूमि पर आधारित यह पुस्तक पाठकों को जीवन, मृत्यु, आस्था और आत्मा की अमर यात्रा पर विचार करने के लिए आमंत्रित करती है। विचारोत्तेजक कहानियों और गहरे अनुभवों के माध्यम से, लेखक पाठकों को भौतिक दुनिया से परे देखने और आध्यात्मिकता की परिवर्तनकारी शक्ति को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। चाहे आप व्यक्तिगत विकास, आध्यात्मिक ज्ञान, या अस्तित्व की गहरी समझ की तलाश में हों, यह पुस्तक ऐसे सार्थक सबक देती है जो अंतिम पन्ना पढ़ने के बाद भी आपके दिलो-दिमाग में बने रहते हैं।
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Prabhat Prakashan, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र, सही आख्यान (True narrative)
Hindi Patrakarita Ki Shabda Sampada (PB)
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Prabhat Prakashan, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र, सही आख्यान (True narrative)Hindi Patrakarita Ki Shabda Sampada (PB)
हिंदी बहुत समृद्ध भाषा है। इसका शब्द भंडार विशाल है। इन दिनों हिंदी पत्रकारिता भाषायी संकट का सामना कर रही है। सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दबावों में वह ऐसा भाषा-रूप अपना रही है, जो हिंदी समाज की भाषिक और सांस्कृतिक अस्मिता के लिए चुनौती है। हिंदी समाचार-पत्रों और अन्य जनसंचार माध्यमों में अंग्रेजी शब्दों का अवांछनीय प्रयोग बढ़ रहा है।
प्रस्तुत शब्दकोश में शब्दार्थ उसके व्याकरणिक रूप के अनुसार दिए गए हैं। जहाँ कहीं शब्द या मुहावरे का रूप क्षेत्रीय या बहुप्रचलित से कुछ हटकर है, वहाँ उसका प्रचलित रूप भी साथ में दिया गया है। जहाँ कहीं कोई शब्द प्रचलित अर्थ से भिन्न अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, वहाँ उसका मुख्य अर्थ पहले दिया गया है। जहाँ किसी शब्द के एक से अधिक अर्थ हों, वहाँ अर्थ के समक्ष तदनुकूल उद्धरण दिए गए हैं। शब्द का अर्थ देते समय उसकी उत्पत्ति को ध्यान में रखा गया है। कोश में जिन पत्र-पत्रिकाओं से उद्धरण लिये गए हैं, उनका उल्लेख संकेताक्षरों में किया गया है तथा उनका खुलासा पृथक् से ‘संकेत’ के रूप में शब्दकोश में किया गया है।आशा है, ‘हिंदी पत्रकारिता की शब्द-संपदा’ ग्रंथ का हिंदी जगत् में स्वागत होगा। संपादकों की मेज पर एक उपादेय सहायक के रूप में वह अपना स्थान बनाएगा। पत्रकारों, विद्यार्थियों, अध्यापकों तथा साहित्यसेवियों द्वारा इसे अपनाया जाएगा।
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Prabhat Prakashan, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र, सही आख्यान (True narrative)
Hindi Patrakarita Ka Itihas
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Prabhat Prakashan, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र, सही आख्यान (True narrative)Hindi Patrakarita Ka Itihas
भारतवर्ष में पत्रकारिता के प्रवेश के साथ ही हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत हुई। भारत में छापेखाने पहले ही आ चुके थे। बंबई में सन् 1674 में एक प्रेस की स्थापना हुई और मद्रास में सन् 1772 में एक प्रेस स्थापित हो चुका था। उस समय भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों के सामने अनेक समस्याएँ थीं, जबकि वे नया ज्ञान अपने पाठकों को देना चाहते थे।
उस काल में ज्ञान के साथ-साथ समाज-सुधार की भावना भी उन लोगों में थी। सामाजिक सुधारों को लेकर नए और पुराने विचारवालों में अंतर भी होते थे, जिसके कारण नए-नए पत्र निकाले गए। हिंदी के प्रारंभिक संपादकों के सामने एक समस्या यह भी थी कि भाषा शुद्ध हो और सबको सुलभ हो।
भारतीय भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं का उत्तरोतर विकास होता गया; परंतु कुछ पत्रों को ब्रिटिश सरकार की ज्यादतियों और दमन के आगे घुटने टेकने पड़े और वे बंद हो गए। हिंदी पत्रकारिता उन संपादकों एवं साहित्यिकों की ऋणी है, जिन्होंने इसे आगे बढ़ाने और उसमें निखार लाने में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।
प्रस्तुत पुस्तक में उन्हें संक्षेप में याद कर लिया गया है तथा किन परिस्थितियों में उन्होंने पत्रकारिता की सेवा की, भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में पत्रकारिता की कुल मिलाकर क्या भूमिका रही, उसकी शक्ति तथा उसकी कमजोरी क्या रही—इसका विवेचन किया गया है।
आशा है, इससे हिंदी-प्रेमियों और हिंदी के सुधी पत्रकारों का भरपूर ज्ञानवर्द्धन होगा और हिंदी पत्रकारिता के इतिहास से भलीभाँति परिचय होगा।SKU: n/a -
Garuda Prakashan, Hindi Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Brhadaaranyakopanishad Saar
-:किताब के बारे में:-
वैदिक साहित्य के निचोड़ उपनिषदों में बृहदारण्यकोपनिषद् सार एक मुख्य उपनिषद् है। सभी उपनिषदों में आकार की दृष्टि से बृहत् होने और अरण्य अर्थात वन में अध्ययन किए जाने के कारण इसे बृहदारण्यकोपनिषद् कहा गया है। इस उपनिषद् में सृष्टिरूप यड़ा को अश्वमेघ के विराट अश्व के रूप में निरुपित किया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, प्राण की महिमा, ब्रह्म की सर्वरूपता आदि इस उपनिषद् की विषय वस्तु है। बहुचर्चित मन्त्र ‘असतो मा सद्रमय, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय,’ और ‘मृत्योर्मामृतं गमय’ इसी उपनिषद् की देन हैं।
ऋषि याज्ञवल्क्य और मैत्रेयि के प्रसिद्द संवाद के द्वारा ब्रह्म और आत्मा का अभेद और इसके साथ ही इस उपनिषद् में मधुविद्या और उसकी परम्परा का भी प्रतिपादन किया गया है। मधु-अर्थात कार्य; जिस प्रकार अनेक मधुकरों द्वारा एक मधु का छत्ता तैयार किया हुआ होता है वैसे ही पञ्चमहाभूत, सूर्य, चन्द्र आदि भूतों के और भूत उनके कार्य हैं।
इसी उपनिषद् में विदेहराज जनक की सभा में उपस्थित अन्य विद्वानों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तरों के माध्यम से ऋषि याज्ञवल्क्य द्वारा ब्रह्मज्ञान का प्रतिपादन किया गया है। देवताओं की संख्या की प्रचलित मान्यता 33 करोड़ के स्थान पर इस उपनिषदों देवताओं की संख्या मुख्यतः तैतीस बताई गई है। इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य सामान्य जनों को सीधी-सरल-सरस भाषा में इस उपनिषद् में निहित अमूल्य ज्ञान से परिचित कराना मात्र है। पाठ्य को सुरुचिपूर्ण और उसकी निरंतरता और तारतम्यता बनाए रखने के लिए मूल मन्त्रों का शब्दतः अनुवाद न कर उनके भाव को ग्रहण करने का प्रयास किया गया है।
सेवानिवृत IRS अधिकारी, राजेन्द्र कुमार गुप्ता, परमसंत ठाकुर श्रीरामसिंहजी और उनकी आध्यात्मिक परम्परा के अनुयायी हैं। श्रीमद्भगवद्गीता, बाइबल, कुरआन, रामायण, श्रीकृष्णचरितामृत आदि की सरल काव्यात्मक पदों में प्रस्तुति और सूफिज्म पर पुस्तकें प्रकाशित करा वे लोगों की धर्म व आध्यात्मिकता के विभिन्न पक्षों में रुचि जाग्रत करने के कार्य में निरन्तर प्रयासरत हैं।
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Ishaadi Upnishad Saar
-:किताब के बारे में:-
वैदिक साहित्य का सार, सनातन चिंतन के मूलाधार और भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के उत्कृष्ट स्रोत उपनिषदों में से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नौ उपनिषद् यथा ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय और श्वेताश्वतर उपनिषद् इस पुस्तक के विषय वस्तु हैं। इन उपनिषदों में ब्रह्म तत्त्व की विषद विवेचना की गई है। ईशावास्योपनिषद् परमेश्वर को सर्वनिर्माता और सारे ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में प्रतिपादित करता है और मनुष्य को सात्विक जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है। कठोपनिषद् में यम और नचिकेता के प्रसिद्द संवाद द्वारा आत्म-विषयक ज्ञान का प्रतिपादन किया गया है। इसी प्रकार माण्डुक्योपनिषद् में आत्मा या चेतना की चार अवस्थाओं-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीयका वर्णन मिलता है। इस उपनिषद् में ॐ की मात्राओं की विलक्षण व्याख्या करके जीव और विश्व की ब्रह्म से उत्पत्ति और लय एवं तीनों का तादात्म्य अथवा अभेद प्रतिपादित हुआ है।
उपनिषदों की मूल भाषा संस्कृत होने और उपलब्ध अनुवाद भी प्रायः सरल भाषा में न होने से, इस आध्यात्मिक ज्ञान के भण्डार तक जन सामान्य की पहुँच सीमित ही रही है। इस पुस्तक में इन नौ उपनिषदों के अध्यात्मिक पक्ष का सारतत्त्व मूल संस्कृत मन्त्रों के साथ सरल जन जन की भाषा में काव्यात्मक पदों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य सामान्य जनों को इन उपनिषदों में निहित अमूल्य ज्ञान से परिचित कराना मात्र है। पाठ्य को सुरुचिपूर्ण और उसकी निरंतरता और तारतम्यता बनाए रखने के लिए मूल मन्त्रों का शब्दतः अनुवाद न कर इस पुस्तक में मन्त्रों के सारको ग्रहण करने का प्रयास किया गया है।
सेवानिवृत IFRS अधिकारी, राजेन्द्र कुमार गुप्ता, परमसंत ठाकुर श्रीरामसिंहजी और उनकी आध्यात्मिक परम्परा के अनुयायी हैं। श्रीमद्भगवद्रीता बाइबल, कुरआन, रामायण, श्रीकृष्णचरितामृत आदि की सरल काव्यात्मक पदों में प्रस्तुति और सूफिज्म पर पुस्तकें प्रकाशित करा वे लोगों की धर्म व आध्यात्मिकता के विभित्र पक्षों में रुचि जाग्रत करने के कार्य में निरन्तर प्रयासरत हैं।
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Upnishad Saar
-:किताब के बारे में:-
उपनिषद् वैदिक साहित्य का निचोड़, भारतीय आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन के मूलाधार और उत्कृष्ट स्रोत हैं। उपनिषद् शब्द का साधारण अर्थ है- समीप उपवेशन या समीप बैठना, अर्थात ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के समक्ष उपस्थित होना। इनमें वेदों का सार तत्त्व अर्थात ब्रह्मविद्या का सार समाहित है। यों तो उपनिषदों की संख्या 108 है, लेकिन इनमें ग्यारह उपनिषद् यथा ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्योपनिषद् और बृहदारण्यकोपनिषद् मुख्य हैं, जिनमें ब्रह्म तत्त्व का विषद विवेचन किया गया है। इन उपनिषदों का मुख्यः उद्देश्य ब्रह्म की पूर्णता, कैवल्यता और उसकी सर्वव्यापकता प्रतिपादित करना है।
उपनिषदों की मूल भाषा संस्कृत होने और उपलब्ध अनुवाद भी प्रायः सरल भाषा में न होने से, इस आध्यात्मिक ज्ञान के भण्डार तक जन सामान्य की पहुँच सीमित ही रही है। इस पुस्तक में इन ग्यारह उपनिषदों के अध्यात्मिक पक्ष का सारतत्त्व मूल संस्कृत मन्त्रों के साथ सरल जन जन की भाषा में काव्यात्मक पदों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य सामान्य जनों को इन उपनिषदों में निहित अमूल्य ज्ञान से परिचित कराना मात्र है। पाठ्य को सुरुचिपूर्ण और उसकी निरंतरता और तारतम्यता बनाए रखने के लिए मूल मन्त्रों का शब्दतः अनुवाद न कर इस पुस्तक में इन मन्त्रों में निहित भाव को ग्रहण करने का प्रयास किया गया है।
‘सत्यमेव जयते’ अर्थात सत्य ही विजयी होता है, असत्य नहीं, ‘अतिथि देवो भवः’ “तत्त्वमसि’ अर्थात ‘सोई तू है’ (Thou Art That), ‘असतो मा सद्रमय, ” तमसो मा ज्योतिर्गमय, और’ मृत्योर्मामृतं गमय’ जैसे प्रसिद्द शाश्वत वाक्य इन्हीं उपनिषदों की देन हैं।
सेवानिवृत IRS अधिकारी, राजेन्द्र कुमार गुप्ता, परमसंत ठाकुर श्रीरामसिंहजी और उनकी आध्यात्मिक परम्परा के अनुयायी हैं। श्रीमद्भगवद्गीता, बाइबल, कुरआन, रामायण, श्रीकृष्णचरितामृत आदि की सरल काव्यात्मक पदों में प्रस्तुति और सूफिज्म पर पुस्तकें प्रकाशित करा वे लोगों की धर्म व आध्यात्मिकता के विभित्र पक्षों में रुचि जाग्रत करने के कार्य में निरन्तर प्रयासरत हैं।
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Garuda Prakashan, Hindi Books, इतिहास, रामायण/रामकथा, सही आख्यान (True narrative)
Valmiki Ramayan – Jan Jan Ki Bhasha Mein
-10%
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-:किताब के बारे में:-
मानव चरित्र के सर्वोत्तम उत्कर्ष को दर्शाता महर्षि वाल्मीकि प्रणीत यह आदि काव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणम् एक अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का चरित्र एक मानव के रूप में वर्णित किया गया है जो यह संदेश देता है कि मानव के लिए ऐसा आदर्श और अनुकरणीय जीवन जीना दुखकर भले ही हो परन्तु असम्भव नहीं है। महर्षि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे। देवर्षि नारद से पूछने पर कि इस समय संसार में सबसे गुणवान कौन है, देवर्षि नारद उन्हें श्रीराम के विषय में बताते हैं जो यह सिद्ध करता है कि वे श्रीराम के समकालीन थे। महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम और उनके भाइयों के जन्म नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति का वर्णन किया है। इन ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति की ज्योतिषीय गणना कर रामायण काल के समय का भी आकलन किया जा सकता है, जो सम्भवतः अब से करीब सात हजार वर्ष से अधिक पूर्व का है।
यह पुस्तक महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण को साधारण जन जन की भाषा में काव्यरूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है। इस प्रस्तुति में वाल्मीकीय रामायण के उन विवरणों को छोड़ दिया गया है जो मूल कथा के प्रवाह के लिए अत्यन्त आवश्यक नहीं थे। वाल्मीकीय रामायण में छः काण्ड हैं यथा बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड और युद्धकाण्ड और प्रत्येक काण्ड अनेक सर्गों में विभाजित है। इस अनुवाद में विषय और कविता का प्रवाह बनाए रखने के लिए अधिकतर कई सर्गों को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। महर्षि विश्वामित्र और ऋषि अगस्त्य द्वारा श्रीराम को दिए गए दिव्य अस्त्र जिनसे उन्हें अजेय बनाने में सहायता की, उनका नाम भी इस पुस्तक में दिया गया है। श्रीराम-रावण के युद्ध का विशद वर्णन और रामराज्य की कुछ विशेषताएँ भी इस पुस्तक में दी गयी हैं।
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Chandyogupnishad Saar
:किताब के बारे में:
वैदिक साहित्य के निचोड़ उपनिषदों में छान्दोग्योपनिषद् एक मुख्य उपनिषद् है। इस उपनिषद् में तत्त्वज्ञान और उसके लिए उपयोगी कर्म और उपासनाओं का विशद और विस्तृत वर्णन किया गया है। इस उपनिषद् में सर्वप्रथम ॐ अक्षर की उपासना, उसके बाद स्तोभ अक्षरों की उपासना उनका महान् फल और तदुपरान्त अखण्डसाम की उपासना का वर्णन है। इस अतिश्रेष्ठ उपासना द्वारा उपासक का बहुत प्रकार से कल्याण होता है। जीव के विभिन्त्र विकारों को मिटाने के विषय में यह उपनिषद् कहता है कि निष्काम कर्म द्वारा अन्तःकरण के मलिन संस्कारजन्य दोषों की निवृत्ति, उपासना द्वारा चित्त की चंचलतारूपी दोष की निवृत्ति और ज्ञान द्वारा स्वरूपविस्मृति अर्थात अज्ञानरुपी आवरण की निवृत्ति होती है।
सगुणब्रह्मकी उपासना और उसका फल ब्रह्मलोक की प्राप्ति, प्राण की उपासना, पञ्चाग्निविद्या, वैश्वानरविद्या, भूमाविद्या, और दृहराविद्या की ज्येष्ठता, श्रेष्ठता का भी इस उपनिषद् में निरुपण किया गया है। इसमें कई आख्यायिकाएँ और संवाद का वर्णन है, जिन पर मनन द्वारा यह जीवात्मा ही ब्रह्म है, ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है।
उपनिषदों की मूल भाषा संस्कृत होने से और उपलब्ध अनुवाद भी प्राय सरल भाषा में न होने से, इस आध्यात्मिक ज्ञान के भण्डार तक जन सामान्य की पहुँच सीमित ही रही है। इस पुस्तक में छान्दोग्योपनिषद् के सार तत्त्व को मूल संस्कृत मन्त्रों के साथ सरल जन जन की भाषा में काव्यात्मक पदों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इस प्रस्तुति का मुख्य उद्देश्य सामान्य जनों को सीधी-सरल-सरस भाषा में इन उपनिषदों में निहित अमूल्य ज्ञान से परिचित कराना मात्र है।
सेवानिवृत । RS अधिकारी, राजेन्द्र कुमार गुप्ता, परमसंत ठाकुर श्रीरामसिंहजी और उनकी आध्यात्मिक परम्परा के अनुयायी हैं। श्रीमद्भगवद्रीता, बाइबल, कुरआन, रामायण, श्रीकृष्णचरितामृत आदि की सरल काव्यात्मक पदों में प्रस्तुति और सूफिज्म पर पुस्तकें प्रकाशित करा वे लोगों की धर्म व आध्यात्मिकता के विभित्र पक्षों में रुचि जाग्रत करने के कार्य में निरन्तर प्रयासरत हैं।
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Prabhat Prakashan
Patrakarita Ka Prashnakaal
“वर्तमान पत्रकारिता प्रश्नों के घेरे में है। वर्तमान पत्रकारिता में आई गिरावट की कई वजहों में से एक बड़ी पत्रकारीय मूल्यों का क्षरण भी है। क्रांति और सजगता के प्रतीक भारत में इसे शिद्दत से महसूस किया जा रहा है। कई-कई सवालों के घेरे में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यानी पत्रकारिता पर ये भी आरोप लग रहे हैं कि लोकतंत्र की अन्य संस्थाओं की तरह यह भी अपनी मर्यादा भुला बैठी है। पत्रकारिता को लोकतंत्र के अन्य तीन स्तंभों-कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका का पहरुआ माना जाता है और यह दायित्व भारतीय संदर्भ में हिंदी पत्रकारिता का कुछ ज्यादा ही है, क्योंकि भारत की बड़ी जनसंख्या इसे बोलती-समझती है।
प्रस्तुत पुस्तक ‘पत्रकारिता का प्रश्नकाल’ में ऐसे ही कुछ सवालों से टकराने का प्रयास किया गया है, जिनमें पत्रकारिता और उसके माध्यमों की आत्मा समाहित है। आठ अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में पत्रकारिता के सवाल, पत्रकारिता की विश्वसनीयता, पत्रकारिता का वर्तमान, पत्रकारीय स्वतंत्रता की महत्ता, मीडिया घरानों की दशा-दिशा, बिहार की पत्रकारिता : क्रांति से भ्रांति तक एवं मीडिया के कॉरपोरेट गठजोड़ के जरिए आज की पत्रकारिता की पड़ताल की एक कोशिश है।
मीडिया के अध्येताओं, पत्रकारिता के छात्रों, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारिता में सक्रिय लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी पुस्तक ।”
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Rajneetik Islam: Ek Manaviya Aalochana
-15%
Garuda Prakashan, Hindi Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Rajneetik Islam: Ek Manaviya Aalochana
-:किताब के बारे में:-
यह पुस्तक राजनीतिक इस्लाम का एक परिचय देती है। यह विषय भारत और विश्व के लिए भी जितना ही गंभीर है, उतना ही उपेक्षित भी। ऐसी स्थिति में यह पुस्तक एक बड़ी कमी पूरी करने की दिशा में योगदान है। इस में इस्लामी मतवाद का मूलतः राजनीतिक स्वरूप, इस की त्रुटिपूर्ण बातें, अनेक अंतर्विरोधः अपने ही दावों पर दुर्बलता; अल्लाह की परिकल्पना की विसंगतियाँ, कुरान के पाठ में ऐतिहासिक रूप से हुए परिवर्तनः तथा प्रोफेट मुहम्मद के राजनैतिक एवं सैद्धांतिक विचारों की कमियों पर प्रकाश डाला गया है। यह प्रस्तुति इसलिए भी विशिष्ट है, क्योंकि इस में सभी बातों की समीक्षा सहज मानवीय दृष्टि से की गई है। इस में रखे गये सभी तथ्य मूल इस्लामी स्त्रोतों… सीरा, कुरान, और हदीस… से लिए गये हैं। उन सभी का परीक्षण, एवं संदर्भ भी पाठक स्वयं परख सकते हैं।
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