Jiyalal Kamboj
Showing all 5 results
-
Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Shivalik Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Atharva Veda (Set of 4 Volumes)
-10%
Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Shivalik Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृतिAtharva Veda (Set of 4 Volumes)
पुस्तक परिचय
अथर्ववेद की व्याख्या लेखक द्वारा ऋग्वेदसंहिता की व्याख्या में अपनाई गई पद्धति के अनुसार ही की गई है। सर्वप्रथम मन्त्र और उसका पदपाठ दिया गया है। पदपाठ के पश्चात् मन्त्र में पदों के क्रम के अनुसार हिन्दीरूपान्तर और फिर संक्षिप्त व्याख्या दी गई है। जिस क्रम में मन्त्रों के पद हैं, उसी क्रम में उनका अनुवाद देने से पाठकों को शब्दों के अर्थों को समझने में सुविधा होगी। पदक्रम से किये गए अनुवाद ने छन्दोमुक्त कविता का सा रूप ग्रहण कर लिया है, जिससे पाठकों को ऋग्वेद के हिन्दी काव्यपाठ का आनन्द भी प्राप्त होगा। संक्षिप्त व्याख्या के पश्चात् टिप्पणियों में प्राचीन एवं अर्वाचीन भाष्यकारों, व्याख्याकारों और अनुवादकों के मत दिये गए हैं।
नामों और शब्दों की यौगिक व्याख्या पर विशेष ध्यान दिया गया है। भाषा और आलङ्कारिक प्रयोगों के रहस्य को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। देवतानामों और शब्दों की प्रतीकात्मक व्याख्या की ओर विशेष ध्यान दिया गया है। प्राचीन और अर्वाचीन भाषाविदों के सिद्धान्तों से व्याख्या में सहायता ली गई है। लुप्तकल (elliptical) मन्त्रों में लुप्त पदों और वाक्यांशों को खोजकर मन्त्रार्थ की प्राप्ति का प्रयास किया गया है। असङ्गत अर्थ वाले वाक्यों में काकु से अर्थ की सङ्गति लगाई गई है। मन्त्रों में सन्धि को अक्षुण्ण रखते हुए पदों को अलग-अलग करके रखा गया है। इससे अथर्ववेद के अध्येताओं और जिज्ञासुओं को जहाँ मन्त्रों के उच्चारण में सुविधा होगी, वहीं अर्थ को समझने में भी सहायता मिलेगी।
यह ग्रन्थ चार खण्डों में पूर्ण हो रहा है। पहले खण्ड में काण्ड १-५, दूसरे खण्ड में काण्ड ६-१०, तीसरे खण्ड में काण्ड ११-१८,१९ (सूक्त १-३३), और चौथे खण्ड में काण्ड १९ (सूक्त ३४-७२), और काण्ड २० होंगे।
लेखक परिचय
डा. जियालाल कम्बोज का जन्म १५ फरवरी १९३२ को ग्राम सान्तड़ी, ज़िला करनाल, हरियाणा, में हुआ।
शिक्षा: बी.ए. (आनर्स) १९५४ में डी.ए.वी. कॉलेज अम्बाला शहर (पंजाब विश्वविद्यालय) से, एम.ए (संस्कृत) दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली से १९६० में। दिल्ली विश्वविद्यालय से ही पोस्ट एम.ए. डिप्लोमा (भाषाविज्ञान) १९६३ में, एम.लिट्. (भाज्ञविज्ञान) १९६६ में, और पीएच.डी की उपाधि ‘Semantic Change in Sanskrit’ विषय पर शोधप्रबन्ध लिखकर १९७३ में।
अध्यापन कार्य दिल्ली शिक्षा निदेशालय में भाषा-अध्यापक और स्नातकोत्तर अध्यापक के रूप में १९६० से १९७४ तक। हिन्दुकालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, में प्रवक्ता और प्रवाचक के पदों पर १९७४ से १९९७ तक कार्य किया।
लेखन-कार्य : एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ‘प्राचीन कम्बोज जन और जनपद’ (इतिहासग्रन्थ) और ‘Semantic Change in San-skrit’ (शोधप्रबन्ध) विशेष उल्लेखनीय हैं। सेवानिवृत्त होने के पश्चात् ऋग्वेदसंहिता का आठ बड़े खण्डों में हिन्दीभाषान्तर, संक्षिप्त व्याख्या और प्राचीन एवं आधुनिक विद्वानों की टिप्पणियों के साथ प्रकाशन एक बृहत् कार्य है। हिन्दी, अंग्रेज़ी और संस्कृत में डेढ़ दर्जन से अधिक शोधनिबन्ध उच्च स्तर की शोधपत्रिकाओं और जर्नलों में प्रकाशित हो चुके हैं।
सम्मान : दिल्ली संस्कृत अकादमी के द्वारा फर्वरी २००२ में ‘संस्कृत साहित्य सेवा सम्मान’ से सम्मानित किया गया। महामहिम राष्ट्रपति द्वारा Certificate of Honour 2016 (संस्कृत), से सम्मानित किया गया।SKU: n/a -
CHAUKHAMBHA ORIENTALIA, Hindi Books, Jiyalal Kamboj, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Samaveda (Set of 2 Volumes)
-10%
CHAUKHAMBHA ORIENTALIA, Hindi Books, Jiyalal Kamboj, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृतिSamaveda (Set of 2 Volumes)
१. सामवेद का वेदों में स्थान
वेद चार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद को ज्ञानकाण्ड कहा जाता है, यजुर्वेद को कर्मकाण्ड, सामवेद को उपासनाकाण्ड और अथर्ववेद में ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों ही प्रकार के मन्त्र हैं। इन वेदों को विद्यात्रयी भी कहा जाता है, वह इसलिये क्योंकि वेद चार होते हुए भी इनमें विद्याएँ तीन ही हैं ज्ञान, कर्म और उपासना। ज्ञान और कर्म का अधिकतर सम्बन्ध सांसारिकता से है, जबकि उपासना का सीधा सम्बन्ध आत्मा और परमात्मा से है। उपासना के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। आत्मकल्याण की इस दृष्टि से सामवेद का महत्त्व वेदों में सर्वोपरि माना गया है। इसी माहात्म्य के कारण भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है वेदों में सामवेद हूँ मैं ‘वेदानां सामवेदो ऽस्मि।” सामवेद गेय है, मधुर है, वेदों का सार है। छान्दोग्योपनिषद् में कहा है वाणी का रस ऋक् है, ऋक् का रस साम है, और साम का रस उद्गीथ है। —SKU: n/a -
Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Vidyanidhi Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
The Rigveda (Set of 8 Volumes)
-10%
Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Vidyanidhi Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृतिThe Rigveda (Set of 8 Volumes)
प्राक्कथन
बहुत लम्बे समय तक वेद का अध्ययन-अध्यापन श्रुतिपरम्परा से ही होता रहा। गुरु मन्त्र का उच्चारण करता था और शिष्य उसी रूप में उसे ग्रहण करने का प्रयास करता था। यह श्रुतिपरम्परा वेद का अविभाज्य अङ्ग थी, इस सीमा तक कि वेद को श्रुति ही कहा जाने लगा। इस परम्परा का सारा बल शुद्ध उच्चारण पर था, एक स्वर या वर्ण की अशुद्धि भी सह्य नहीं थी दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तम् अर्थम् आह। स वाग्वज्जो यजमानं हिनस्ति। यदि अशुद्ध उच्चारण हो गया तो यजमान को हानि पहुँच सकती थी। अतः शुद्ध उच्चारण एक अनिवार्यता थी।
मन्त्रों का किसी न किसी यज्ञ-याग में विनियोग होना होता था। याज्ञिक प्रक्रिया मूलतः उन्हीं पर निर्भर थी। मन्त्रशक्ति पर सभी की अपूर्व आस्था थी। यदि मन्त्र ही अशुद्ध उच्चरित हुए तो वे अपना फल न दे सकेंगे और अनिष्ट फल की प्राप्ति भी सम्भव हो जाएगी। नैसर्गिक और काम्य कर्मों के सन्दर्भ में उनका अभीष्टफलप्रदायी होना यजमान और याजक दोनों को अभीष्ट था।
यज्ञप्रक्रिया से अन्यत्र कभी अशुद्ध उच्चारण हो भी जाए पर यज्ञप्रक्रिया में वह क्षम्य नहीं था। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने इस तथ्य को एक पुरानी घटना के उल्लेख के द्वारा रेखाङ्कित किया है। दो ऋषि थे। वे यद्वानः और तद्वानः शब्दों का उच्चारण यर्वाण और तर्वाण करते थे। इस उच्चारण के कारण उनका नाम ही यर्वाण तर्वाण पड़ गया। वे विद्वान् भी थे, दूर और निकट की सब चीजों के जानकार थे, विदितवेदितव्य थे और तत्त्वज्ञानी थे, फिर भी उच्चारण में त्रुटि उनसे हो गई। यह त्रुटि बोलचाल में भले ही उनसे हुई हो, पर यज्ञकर्म में कभी नहीं होती थी। ते तत्रभवन्तो यद्वानस् तद्वान इति प्रयोक्तव्ये यर्वाणस् तर्वाण इति प्रयुञ्जते, याज्ञे पुनः कर्मणि नापभाषन्ते। (पस्पशाहिक)।
उच्चारणशुद्धि के इस बल का यह प्रभाव हुआ कि सारा ध्यान शुद्ध उच्चारण पर ही केन्द्रित हो गया। बस उच्चारण भर करते जाना यही मन्त्रों का लक्ष्य बन गया। उच्चारणशुद्धि के लिये अनेक उपायों का आविर्भाव हुआ। अष्ट विकृतियां उसी की परिणति हैं। इसका यह प्रभाव तो अवश्य हुआ कि वेद अपने मूल उच्चारण में सहस्राब्दियों तक बने रह गए और आज भी उसी रूप में चले आ रहे हैं। सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान् मैक्समूलर का कथन सर्वथा सत्य है कि यदि किसी कारणवश वेदों की प्रकाशित सभी प्रतियां नष्ट हो जाएं तो भी ब्राह्मणों के मुख से आज भी अपने मूल अविकल रूप में उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।
उच्चारणशुद्धि पर बल का एक प्रभाव यह भी पड़ा कि अर्थ की ओर ध्यान कम हुआ। जब तक यह भाषा व्यवहार में आती थी लोगों को इसके अर्थ समझ आते रहे होंगे, पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, लौकिक संस्कृत का उदय होता गया और वैदिक और लौकिक संस्कृत का अन्तर बढ़ता गया, मन्त्र लोगों के लिये दुरूह से दुरूहतर होते गए। एक समय ऐसा भी आया जब कहा जाने लगा कि मन्त्रों के अर्थ ही नहीं हैं। महर्षि यास्क ने महर्षि कौत्स के सन्दर्भ से मन्त्रों की अनर्थकता और सार्थकता पर एक पूरा शास्त्रार्थ ही प्रस्तुत कर दिया है। उन्हों ने सशक्त तकों के आधार पर कौत्स के इस मत का कि मन्त्र अर्थविहीन हैं (अनर्थका हि मन्त्राः) का खण्डन किया है और जिस निरुक्तशास्त्र का वे प्रणयन करने जा रहे हैं, उसकी उपयोगिता को सिद्ध किया है। निरुक्त की उपयोगिता मन्त्रों का अर्थ समझने के लिये है। यदि मन्त्रों का कोई अर्थ ही नहीं है,
तो उनका शास्त्र किस का बोध कराएगा।SKU: n/a -
Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Vidyanidhi Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Yajurveda (Set of 2 Volumes)
-10%
Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Vidyanidhi Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृतिYajurveda (Set of 2 Volumes)
यजुर्वेद-भूमिका
१. यजुर्वेद का वेदों में स्थान और महत्त्व
वेद चार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद में मुख्य रूप से देवताओं की स्तुतियाँ हैं। भारतीय परम्परा में इसे ज्ञानकाण्ड कहा गया है। यजुर्वेद में यज्ञों के अनुष्ठान के लिये मन्त्र हैं। इसे कर्मकाण्ड कहा गया है। सामवेद देवताओं के स्तुतिगान के लिये मन्त्रों का संग्रह है। इसे उपासनाकाण्ड के नाम से पुकारा गया है। अथर्ववेद में विषयों की विविधता है। इसमें ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों ही प्रकार के मन्त्र उपलब्ध हैं।
-वैसे तो सभी वेदों में यज्ञ के महत्त्व को स्वीकार किया गया है और सबमें ही यज्ञसम्बन्धी मन्त्र उपलब्ध हैं, परन्तु यजुर्वेद विशेष रूप से यज्ञों से सम्बन्धित वेद है। इसमें विविध प्रकार के यज्ञों के अनुष्ठानों में विनियुक्त होने वाले मन्त्रों का संग्रह है। इस प्रकार यजुर्वेद अन्य वेदों से नितान्त भिन्न प्रकृति वाला वेद है। यजुर्वेद यज्ञप्रधान है। यास्काचार्य ने यजुर्वेद का निर्वचन करते हुए कहा है यजुर् यजतेः। अर्थात् यजुः शब्द की निष्पत्ति यज धातु से हुई है और इस प्रकार यजु मन्त्रों का यजनक्रिया से विशेष सम्बन्ध है। एक अन्य परिभाषा के अनुसार अनियताक्षरावसानो यजुः कहा गया है। अर्थात् यजुः वह है जिसमें अक्षरों की संख्या निश्चित नहीं है। जहाँ ऋक् अथवा ऋचा में गायत्री, अनुष्टुप् आदि छन्दों की संख्या निश्चित होती है, वहाँ यजुः में अक्षरों की संख्या निश्चित नहीं होती। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऋक् या ऋचा पद्म है और यजुः गद्या है। कहा भी गया है गद्यात्मको यजुः। –
२. बबुर्वेद की शाखाएँ
बनुर्वेद मुख्य रूप से दो प्रकार का है कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद। कृष्णयजुर्वेद वह है, किसमें ब्राह्मण अंश भी मिला हुआ है। ब्राह्मण अंश के मिश्रण के कारण उसे शुक्ल अर्थात् शुद्ध, पवित्र नहीं माना गया और उसे कृष्णयजुर्वेद की संज्ञा दी गई। इसके विपरीत वह यजुर्वेद जिसमें ब्राह्मण अंश जुड़ा हुआ नहीं है, उसे शुक्ल अर्थात् शुद्ध, पवित्र, मिश्रणमुक्त यजुर्वेद कहा गया है। यजुर्वेद के इस दो प्रकार के विभाजन के विषय में महीधर ने अपने भाष्य के आरम्भ में एक बहुत रोचक कथा का वर्णन किया है व्यास ने मनुष्यों की बौद्धिक क्षमता के निरन्तर ह्रास को दृष्टि में रखते हुए वेद का ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व इन चार भागों में विभाजन किया और इन्हें क्रमशः अपने चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु को पढ़ाया। इन शिष्यों ने इन्हें अपने शिष्यों को पढ़ा दिया। एक बार वैशम्पायन अपने शिष्य याज्ञवल्क्य पर किसी कारण से क्रुद्ध हो गए और उसने जो कुछ पढ़ा था उसे वापस देने को कहा। याज्ञवल्क्य ने अपनी योगशक्ति के द्वारा पठित यजुर्वेद को वमन कर दिया। गुरु की आज्ञा से अन्य शिष्यों ने तीतर पक्षी का रूप धारणSKU: n/a

