Hindi Books
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास
Vyatha Kahe Panchali (Hindi)
“पाँच पिया स्वीकारे क्यूँ थे।
खुद ही भाग बिगाड़े क्यूँ थे।काश विशेधी हो जाती मैं।
थोड़ा क्रोधी हो जाती मैं।काश न मेरे हिस्से होते।
शुरू नहीं फिर किस्से होते।काश वर्ण को वर लेती मैं।
वाणी वश में कर लेती मैं।कर्ण अगर ना होता शायद।
तो संग्राम न होता शायद।दुःशासन मतिमंद न होता।
रिश्तों में फिर द्वंद न होता।जो दुर्योधन क्रुद्ध न होता।
तो शायद ये युद्ध न होत।यूँ ना काश विभाजन होता।
अर्जुन ही बस साजन होता।खुले अगर ये बाल न होते।
श्वेत् पृष्ठ फिर लाल न होतेयदि मेरा अपमान न होता।
गिद्धों का जलपान न होता।मौन अगर गुरुदेव न होते।
रण आँगन में प्राण न खोते।काश सत्य का साथ निभाते।
और बड़े भी कुछ कह पाते।सत्य यही जो समर न होता।
कुरुक्षेत्र फिर अमर न होता।नारी का अपमान न होता।
कुरुक्षेत्र शमशान न होता।SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Who Dares Wins
Description
“भारतीय थलसेना के शीर्ष अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल वाई.के. जोशी को उत्तरी कमान के सेना कमांडर के रूप में वर्ष 2020 में चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बलपूर्वक यथास्थिति परिवर्तन के प्रयास के प्रति भारतीय प्रतिक्रिया के नेतृत्व का श्रेय जाता है। वह एकमात्र युद्ध-सम्मानित सेना कमांडर हैं, जिन्हें भारत के दोनों शत्रुओं, चीन और पाकिस्तान पर सफलता पाने का श्रेय प्राप्त है। वह भारतीय सेना की 13वीं बटालियन, जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में कमीशन हुए। बटालियन को ‘ब्रेवेस्ट ऑफ द ब्रेव’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें युद्धक्षेत्र में ही लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में पदोन्नत कर बटालियन की कमान सौंपी गई। उनकी कमान में बटालियन ने द्रास और मुश्कोह घाटी उप-क्षेत्रों में दो रणनीतिक रूप से अति-महत्त्वपूर्ण पर्वत-शिखरों पर कब्जा किया।
युद्ध में असाधारण प्रदर्शन के लिए 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स को कुल सैंतीस वीरता पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें दो ‘परमवीर चक्र’, आठ ‘वीर चक्र’ और चौदह ‘सेना पदक’ प्रमुख हैं। बटालियन को ‘चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ’ प्रशस्ति-पत्र से भी सम्मानित किया गया तथा ‘ब्रेवेस्ट ऑफ द ब्रेव’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
लेफ्टिनेंट जनरल वाई. के. जोशी की असाधारण नेतृत्व क्षमता, पराक्रम और साहस की स्पष्ट, विचारोत्तेजक और भावनात्मक संस्मरणात्मक पुस्तक।”
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Garuda Prakashan, Hindi Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Wo Hindi Medium Wala: Mool Bhartiyon Ka Vidroh Aur Ubharta Raashtravaad
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Garuda Prakashan, Hindi Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Wo Hindi Medium Wala: Mool Bhartiyon Ka Vidroh Aur Ubharta Raashtravaad
मूल बात पहले। ये पुस्तक इस धारणा को तोड़ती है कि भारत स्वतन्त्र है, और दिखाती है कि हमलोगों ने विदेशी सांस्कृतिक दासता को अपने मानस में आत्मसात् कर लिया है और अब तो उसकी अनुभूति भी हमें नहीं होती।
अमिताभ सत्यम् इस मानसिकता और मूल भारतीय संस्कृति के प्रति हेय दृष्टि रखने वाले व्यवहार का विस्तृत विश्लेषण करते हैं। उनकी बात करते हैं जो भारतीय भाषा बोलते हैं, भारतीय भोजन करते हैं, भारतीय परम्पराओं का पालन करते हैं, और इस कारण “वो हिन्दी मीडियम वाला” जैसे अपमानजनक सम्बोधन को सहते हैं।
अँगरेज़ी को उच्च स्तरीय नौकरियों की आवश्यकता के रूप में स्थापित करके हम सौ करोड़ भारतीयों की प्रतिभा को नकार देते हैं। अँगरेज़ी नहीं बोलने के कारण करोड़ों प्रतिभावान लोग ड्राइवर, सिक्युरिटी गार्ड और नौकर बन कर रह जाते हैं।
मूल भारतीय आज अँगरेज़ी-मीडियमों द्वारा थोपी गई श्रेष्ठता के विरुद्ध विद्रोह कर रहे हैं। ये पुस्तक इन्ही भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करती है।
पुस्तक पैने व्यंगात्मक परिहास और व्यक्तिगत अनुभवों से परिपूर्ण है। ये मात्र गुदगुदाती ही नहीं, हमारी इस मानसिकता पर गहन विचार करने को प्रेरित भी करती है।
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Hindi Books, Parimal Publications, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Word Index to 196 Upanishads
Hindi Books, Parimal Publications, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृतिWord Index to 196 Upanishads
प्राचीन विद्याओं के गवेषण, संरक्षण, उन्नयन और प्रोत्साहन देने का जहाँ तक प्रश्न है, गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय का इस क्षेत्र में महनीय योगदान देता रहा है। इस विश्वविद्यालय ने अपने सुदीर्घ इतिहास में देश को अनेक सुयोग्य विद्वान् प्रदान किये, जिनके द्वारा किये गये कार्य से विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि दोनों बढ़ी हैं।
किसी भी विश्वद्यालय की पहिचान उसके द्वारा किया गया शोधकार्य होता है, इस दृष्टि से हमारा विश्वविद्यालय निरन्तर अनुसन्धान के क्षेत्र में अपना अवदान दे रहा है। प्राच्य विद्याओं के क्षेत्र में गम्भीर अनुसन्धान को बढ़ावा देने के लिये विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से स्वीकृति लेकर वैदिक साहित्य के क्षेत्र में शोधकार्य करने के लिये श्रद्धानन्द वैदिक शोधसंस्थान नाम से एक शोधसंस्थान स्थापित किया। प्रसन्नता की बात है कि समय के साथ यह विभाग देश-विदेश में अपनी पहिचान बना रहा है।
जब मैंने जुलाई २०१३ में इस विश्वविद्यालय के कुलपति पद का कार्यभार ग्रहण किया, उस समय विभागों की समीक्षा करते हुए श्रद्धानन्द वैदिक शोधसंस्थान के कार्यों से भी अवगत होने का मुझे अवसर मिला। यह जानकर अच्छा लगा कि यह विभाग शोध के क्षेत्र में गम्भीरता पूर्वक कार्य कर रहा है। मैंने विभाग के अध्यक्ष प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री को उपनिषदों के पदानुक्रमकोष के प्रणयन का दायित्व सौंपा, यह एक विस्तृत एवं जटिल कार्य था, मेरे अनुसार इस कार्य को सम्पन्न होने में कई वर्षों का समय लगना चाहिये था, परन्तु प्रो. शास्त्री ने डेढ़ वर्ष के अल्प समय में इस कार्य को पूर्ण कर दिया है। यह कार्य औपनिषदिक-पदानुक्रम-कोषः नाम से प्रकाशित होने जा रहा है। अतः इस कार्य के लिये मैं श्रद्धानन्द वैदिक शोधसंस्थान तथा प्रो. ज्ञान प्रकाश शास्त्री को साधुवाद देता हूँ।
इससे पूर्व भी प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से प्राप्त बृहद् शोधपरियोजना के माध्यम से ऋम्भाष्य-पदार्थ-कोष का कार्य पूर्ण किया और वह आठ भागों में प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त विभाग से महर्षि दयानन्द के समस्त साहित्य को आधार बनाकर दयानन्द-सन्दर्भ-कोष नाम से कार्य किया और वह तीन भागों में प्रकाशित हो चुका है। उक्त के अतिरिक्त भी अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य विभाग के प्राध्यापकों के द्वारा किये गये हैं और किये जा रहे हैं। अब तक विभाग से ५० से अधिक पुस्तकों का लेखन/सम्पादन होकर प्रकाशन हो चुका है।
मैंने विभाग को महाभारत-पदानुक्रम-कोषः नाम से एक और महत्त्वाकांक्षी योजना पर कार्य करने के लिये प्रेरित किया है तथा इस हेतु विभाग को समुचित बजट भी उपलब्ध कराया गया है। मुझे विश्वास दिलाया गया है कि उक्त कार्य भी २०१६ में पूर्ण हो जायेगा। इसी प्रकार विश्वविद्यालय की अपेक्षाओं के अनुरूप यह विभाग कार्य करता रहेगा, ऐसा मुझे विश्वास है।SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, इतिहास
Ya Devi Sarvabhuteshu (PB)
दुर्गा सप्तशती तंत्र का मेरुदंड है। इस पुस्तक के सभी मंत्र अमोघ हैं। सुरथ एवं समाधि की कहानी से शुरू हो रही सप्तशती वस्तुतः तेरहवें अध्याय के अंतमें यह बताती है कि दुर्गा का पूजन, उनके माहात्म्य का जप पुण्यदायी है-इहलोक, परलोक सुधारने वाला है। दुर्गा के माहात्म्य को श्रद्धापूर्वक सुनने का परिणाम था कि राजा सुरथ सूर्य के अंश से सावर्णि नामक मनु के रूप में उत्पन्न हुए।
तेरह अध्यायों में शक्ति के भिन्न- भिन्न स्वरूपों का ध्यान किया गया है। ऋग्वेद में अपना परिचय देते हुए शक्ति कहती हैं- अहम् ब्रह्म स्वरूपिणी । शक्ति ब्रह्म से भिन्न नहीं हैं, और उनको समझना उतना ही दुष्कर हैं, जितना ब्रह्म को, पर दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। निःसंदेह शक्ति ही स्वयं में संतुष्ट और कामनाओं से परे ब्रह्म को क्रियाशील करती हैं, अन्यथा शिव निश्चल रहते हैं-
जहाँ भी रचना हो रही है. या विलय हो रहा है, वहाँ शक्ति अवश्य क्रियारत है। निखिल मंत्र विज्ञान में शक्ति के दिग्दर्शन की ओर प्रत्येक साधक को ले जाना हमारा ध्येय है और पुनीत कर्तव्य भी। दुर्गा सप्तशती में निहित आध्यात्मिक रहस्य को यह पुस्तक पाठकों के सम्मुख ‘या देवी सर्वभूतेषु’ के माध्यम से प्रस्तुत करने का विनीत प्रयास है, इस आशा के साथ कि इसे पढ़ने के बाद आप सभी साधकों और पाठकों के मन में शक्ति से संबंधित छाया भ्रमजाल छिन्न-भिन्न हो जाएगा।
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Hindi Books, Hindu Rights Forum, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Yahudi Eesaiyat Va Islaam
प्रत्येक मनुष्य में भगवान होने की सम्भावना मौजूद होती है, पर उसकी सम्भावना को सुअवसर नहीं मिल पाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि प्रभुत्वशाली लोगों में प्रभुत्त की चाह अपने आस-पास के लोगों के दिव्योत्थान में बाधा पहुँचाती है। वास्तव में प्रभुत्वशाली व्यक्ति स्वयं को ही भगवान की तरह पूज्य बनाना……….
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Govindram Hasanand Prakashan, Hindi Books, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Yajurveda
यजुर्वेद का मुख्य विषय मानवोचित कर्म को बताना है तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि इस वेद में कर्म के अत्यरिक्त कोई अन्य विषय व्याख्यात नहीं हुआ है। यजुर्वेद में इनसे पृथक् ईश्वर, जीव, प्रकृति, सृष्टि-रचना, जीवन-मृत्यु आदि दार्शनिक विषयों पर गहन चिंतन प्राप्त होता है। दार्शनिक तत्व के साथ-साथ समाज शास्त्र जिसमें मनुष्यों के सर्वहितकारी नियम, वर्ण और आश्रम व्यवस्था, नारी सम्मान आदि का मूल, बीज रुप में उल्लेखित है। राष्ट्र भावना का और राष्ट्र में मनुष्यों के योगदान पर यजुर्वेद प्रकाश डालता है और राष्ट्र को सबल बनाने का उपाय बताता है। यजुर्वेद पर्यावरण के महत्व और उसकी सुरक्षा पर भी उपदेश करता है। यजुर्वेद का मन्त्र “द्यौः शान्तिः.-यजु.36-17” अनेक स्थानों पर दृष्टिगोचर होता है जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड सभी के लिए शान्तिदायक हो ऐसी प्रार्थना की गयी है। यहां शान्तिदायक ब्रह्माण्ड तभी होगा जब इनका संतुलन बना रहे और ये प्रदूषणादि दोषों से पृथक रहें। इस प्रकार यजुर्वेद पर्यावरण के महत्व पर उपदेश करता है। इस वेद में अनेक विषयों का उपदेश है, जैसे औषधिशास्त्र का “सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु”- ऋ.6.22 आदि। गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त पर, जैसे – आकृष्णेन रजसा वर्तमानो..-ऋ.33.43 आदि।
कृषि विद्या पर भी कृषन्तु भूमिं शुनं – यजु.12.69 आदि अनेक मन्त्र हैं। पशुपालन और गौरक्षा का “यजमानस्य पशुन् पाहि”-यजु.1.1 आदि मन्त्रों द्वारा उपदेश हैं। गणित विद्या पर “एका च मे तिस्त्रश्च मे तिस्त्रश्च.”- यजु.18.24 आदि मन्त्रों द्वारा उपदेश है। यजुर्वेद के 18वें अध्याय में अनेक खनिजों के नामों को बताया गया है।
प्रस्तुत भाष्य महर्षि दयानन्द सरस्वती रचित है। इस भाष्य में ऊपर वर्णित सभी विषयों के अतिरिक्त अन्य विषयों का भी समावेश है। यह भाष्य नैरुक्त प्रक्रिया से सम्पन्न विज्ञान और दर्शनों की कसौटियों पर खरा उतरता है। जहां अन्य भाष्य केवलमात्र कर्मकांड युक्त है, वहीं ये भाष्य लौकिक, अलौकिक आदि ज्ञान-विज्ञान से युक्त है। इस भाष्य में व्यवहारिक ज्ञान की प्रचुरता है। भाष्यकार ने भाष्य में अर्थ प्रमाण की दृष्टि से निरूक्त, अष्टाध्यायी, तैत्तरीय संहिता, शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण दिया है, जिससे भाष्य की शैली की प्रमाणिकता सिद्ध होती है। सभी मन्त्रों का उत्तम और जीवन में उपयोगी विषयों के अनुरूप यह भाष्य है। इस भाष्य के अध्ययन करने पर आप स्वयं कह उठेंगे कि “सर्वज्ञानमयो हि सः।
भाष्यकार : महर्षि दयानन्द सरस्वती
सम्पूर्ण यजुर्वेद भाष्य प्रथम बार कंप्यूटर द्वारा मुद्रित, शुद्धतम् सामग्री, नयनाभिराम डिजिटल छपाई, आकर्षक आवरण, उत्तम कागज, सुंदर टाइप, शब्दार्थ व मन्त्रानुक्रमणिका सहित एक खण्ड में प्रस्तुत |
यजुर्वेद का विषय केवल कर्मकाण्ड ही नहीं है, बल्कि इसमें वर्णित है अध्यात्म एवं दर्शन ,सृष्टि-रचना तथा मोक्ष, नैतिक तथा आचारमूलक शिक्षाएं , मनोविज्ञान बुद्धिवाद, समाज दर्शन , राष्ट्र भावना, पर्यावरण का संरक्षण। काव्य तत्व के अतिरिक्त यजुर्वेद में विद्यमान है, विश्व मानव की एकता जैसे उपयोगी विषय ।
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Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Vidyanidhi Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Yajurveda (Set of 2 Volumes)
-10%
Hindi Books, Jiyalal Kamboj, Vidyanidhi Prakashan, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृतिYajurveda (Set of 2 Volumes)
यजुर्वेद-भूमिका
१. यजुर्वेद का वेदों में स्थान और महत्त्व
वेद चार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद में मुख्य रूप से देवताओं की स्तुतियाँ हैं। भारतीय परम्परा में इसे ज्ञानकाण्ड कहा गया है। यजुर्वेद में यज्ञों के अनुष्ठान के लिये मन्त्र हैं। इसे कर्मकाण्ड कहा गया है। सामवेद देवताओं के स्तुतिगान के लिये मन्त्रों का संग्रह है। इसे उपासनाकाण्ड के नाम से पुकारा गया है। अथर्ववेद में विषयों की विविधता है। इसमें ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों ही प्रकार के मन्त्र उपलब्ध हैं।
-वैसे तो सभी वेदों में यज्ञ के महत्त्व को स्वीकार किया गया है और सबमें ही यज्ञसम्बन्धी मन्त्र उपलब्ध हैं, परन्तु यजुर्वेद विशेष रूप से यज्ञों से सम्बन्धित वेद है। इसमें विविध प्रकार के यज्ञों के अनुष्ठानों में विनियुक्त होने वाले मन्त्रों का संग्रह है। इस प्रकार यजुर्वेद अन्य वेदों से नितान्त भिन्न प्रकृति वाला वेद है। यजुर्वेद यज्ञप्रधान है। यास्काचार्य ने यजुर्वेद का निर्वचन करते हुए कहा है यजुर् यजतेः। अर्थात् यजुः शब्द की निष्पत्ति यज धातु से हुई है और इस प्रकार यजु मन्त्रों का यजनक्रिया से विशेष सम्बन्ध है। एक अन्य परिभाषा के अनुसार अनियताक्षरावसानो यजुः कहा गया है। अर्थात् यजुः वह है जिसमें अक्षरों की संख्या निश्चित नहीं है। जहाँ ऋक् अथवा ऋचा में गायत्री, अनुष्टुप् आदि छन्दों की संख्या निश्चित होती है, वहाँ यजुः में अक्षरों की संख्या निश्चित नहीं होती। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऋक् या ऋचा पद्म है और यजुः गद्या है। कहा भी गया है गद्यात्मको यजुः। –
२. बबुर्वेद की शाखाएँ
बनुर्वेद मुख्य रूप से दो प्रकार का है कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद। कृष्णयजुर्वेद वह है, किसमें ब्राह्मण अंश भी मिला हुआ है। ब्राह्मण अंश के मिश्रण के कारण उसे शुक्ल अर्थात् शुद्ध, पवित्र नहीं माना गया और उसे कृष्णयजुर्वेद की संज्ञा दी गई। इसके विपरीत वह यजुर्वेद जिसमें ब्राह्मण अंश जुड़ा हुआ नहीं है, उसे शुक्ल अर्थात् शुद्ध, पवित्र, मिश्रणमुक्त यजुर्वेद कहा गया है। यजुर्वेद के इस दो प्रकार के विभाजन के विषय में महीधर ने अपने भाष्य के आरम्भ में एक बहुत रोचक कथा का वर्णन किया है व्यास ने मनुष्यों की बौद्धिक क्षमता के निरन्तर ह्रास को दृष्टि में रखते हुए वेद का ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व इन चार भागों में विभाजन किया और इन्हें क्रमशः अपने चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु को पढ़ाया। इन शिष्यों ने इन्हें अपने शिष्यों को पढ़ा दिया। एक बार वैशम्पायन अपने शिष्य याज्ञवल्क्य पर किसी कारण से क्रुद्ध हो गए और उसने जो कुछ पढ़ा था उसे वापस देने को कहा। याज्ञवल्क्य ने अपनी योगशक्ति के द्वारा पठित यजुर्वेद को वमन कर दिया। गुरु की आज्ञा से अन्य शिष्यों ने तीतर पक्षी का रूप धारणSKU: n/a -
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, Religious & Spiritual Literature
Yoddha Sannyasi : Vivekanand
”उठिए, जागिए, मेरे देशबंधुओ! आइए, मेरे पास आइए। सुनिए, आपको एक ज्वलंत संदेश देना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं कोई अवतार हूँ। ना-ना, मैं अवतार तो नहीं ही हूँ। कोई दार्शनिक अथवा संत भी नहीं हूँ। मैं हूँ, एक अति निर्धन व्यक्ति, इसीलिए सारे सर्वहारा मेरे दोस्त हैं। मित्रो! मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे ठीक से समझ लीजिए। समझिए, आत्मसात् कीजिए और उसे जनमानस तक पहुँचाइए। घर-घर पहुँचाइए मेरे विचार। मेरे विचार-वृक्ष के बीजों को दुनिया भर में बोइए। तर्क की खुरदुरी झाड़ू से अंधविश्वास के जालों को साफ करने का अर्थ है शिक्षा। संस्कृति और परंपरा, दोनों एकदम भिन्न हैं, इसे स्पष्ट करने का नाम है शिक्षा।’ ’
स्वामी विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व के विषय में उपर्युक्त कथन के बाद यहाँ कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। हमारे आज के जो सरोकार हैं, जैसे शिक्षा की समस्या, भारतीय संस्कृति का सही रूप, व्यापक समाज-सुधार, महिलाओं का उत्थान, दलित और पिछड़ों की उन्नति, विकास के लिए विज्ञान की आवश्यकता, सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता, युवकों के दायित्व, आत्मनिर्भरता, भारत का भविष्य आदि-आदि। भारत को अपने पूर्व गौरव को पुन: प्राप्त करने के लिए, समस्याओं के निदान के लिए स्वामीजी के विचारों का अवगाहन करना होगा।
मूल स्रोतों और शोध पर आधारित यह पुस्तक ‘योद्धा संन्यासी’ हर आम और खास पाठक के लिए पठनीय एवं संग्रहणीय है।SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, Yoga and Pranayam
Yogasan Aur Pranayam- Swami Akshya Atmanand (HB)
-15%
Hindi Books, Prabhat Prakashan, Yoga and PranayamYogasan Aur Pranayam- Swami Akshya Atmanand (HB)
इस पुस्तक को सभी प्रकार के लोग पढ़ेंगे । योगासन से सम्बन्धित यह पुस्तक न तो पहली है और न अद्भुत; परन्तु यह पुस्तक परम्पराओं से हटकर अवश्य है । पाठकों को यह इसलिए भी रुचिकर लगेगी, क्योंकि वे इस पुस्तक के माध्यम से बिना किसी गुरु के ही ‘ योगासन ‘ और ‘ प्राणायाम ‘ सीख सकेंगे । अन्य उपलब्ध पुस्तकों से कुछ अधिक जानकारी, अधिक सहजता और अधिक सावधानियां इस पुस्तक में दी जा रही है । सरलतम और अत्यावश्यक योगासन ही इसमें दिये जा रहे हैं ।
अधिक विस्तृत जानकारियां सभी स्तर के पाठकों को ध्यान में रखकर ही दी जा रही हैं, जिससे आपको कम-से-कम परेशानी हो और आप अधिक-से- अधिक लाभ प्राप्त कर सकें; चिकित्सक और रोगी इन जानकारियों का लाभ ले सकें ।
– इसी पुस्तक से
अति सरल भाषा, विशिष्ट शैली, गम्भीरतम वैज्ञानिक विश्लेषण और सुबोध व्याख्या स्वामी अक्षय आत्मानन्दजी की पुस्तकों की ऐसी विशेषता है कि पाठक उनकी योग सम्बन्धी पुस्तकों की बार-बार मांग करते हैं । आप भी एक बार यदि किसी एक ग्रन्थ को पढ़ लेंगे तो सदैव स्वामी जी का साहित्य ही मांगेंगे । हमें विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप भी योग विद्या में स्वयं काा प्रवीण कर सकेंगे।SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Yuddha Aur Shanti Mein Mera Jeevan
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Yuddha Aur Shanti Mein Mera Jeevan
“जिन यहूदियों ने भारत को अपना ठिकाना बनाया था, वे यहाँ किसी प्रतिकूल भेदभाव के बिना खूब फले-फूले । इनमे से बगदादी गडरिआ समुदाय की संख्या बहुत कम थी, लेकिन उसने भारत के महानतम समकालीन सिपाहियों में से एक लेफ्टिनेंट जनरल जैकब को पैदा किया | यह पुस्तक उन्हीं की रोमांचकारी कथा है ।
जैकब का जन्म एक यहूदी कारोबारी परिवार में हुआ था। जब द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो 1941 में जैकब अपने परिवार को सूचना दिए बिना नाजियों से लड़ने के लिए सेना में भरती हो गए। उन्हें भारतीय तोपखाने में कमीशन दिया गया था और उन्होंने मध्य-पूर्व, बर्मा एवं सुमात्रा में अनेक कारवाइयों में भाग लिया था।
जैकब अत्यंत कुशाग्र बुद्धि थे। उन्होंने इन्फैंट्री एवं आर्टिलरी ब्रिगेडों की कमान सँभाली थी। वे तोपखाना विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे और अंत में पूर्वी सेना के कमांडर-इन-चीफ भी रहे। यह एक ऐसे युवा यहूदी अधिकारी की दिलचस्प कहानी है, जिसने कोई समझौता किए बिना अपने सिद्धांतों एवं मान्यताओं के आधार पर चुनौतियों को स्वीकार किया। उन्होंने कुछ ऐसे बहादुर एवं विश्वसनीय लोगों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया, जो उस समय भारतीय राजनीतिक एवं सैन्य अखाड़े के पहलवान माने जाते थे। उन्होंने ढाका के पतन की सफल रणनीति काररवाइयों का पर्यवेक्षण स्वयं किया और शत्रु को बिना शर्त सार्वजनिक आत्मसमर्पण करने के लिए विवश कर दिया, जो जनरल नियाजी एवं उनके 93,000 सैनिकों द्वारा किया गया इतिहास का एकमात्र बिना शर्त सार्वजनिक आत्मसमर्पण था।
अत्यंत सुबोधगम्य शैली में लिखी इस आत्मकथा में एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में जीवन सजीव हो उठा है। यह मात्र एक महान् सैनिक की जीवनगाथा ही नहीं है, अपितु इसमें कुछ उन अत्यंत प्रभावशाली एवं देदीप्यमान व्यक्तित्वों की झलकियाँ भी हैं, जिन्होंने उन अशांत युगों का इतिहास लिखा था।”
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Bhuvan Vani Trust, Hindi Books, इतिहास
Zend Avesta
भुवन वाणी के देवनागरी अक्षयवट की देशी-विदेशी प्रकाण्ड शाखाओं में, संस्कृत, अरबी, फ़ारसी, उर्दू, हिन्दी, कश्मीरी, गुरमुखी, राजस्थानी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, कोंकणी, मलयाळम, तमिळ, कन्नड, तेलुगु, ओडिसी, बंगला, असमिया, नेपाली, अंग्रेजी, हिब्रू, ग्रीक आदि के अनुपम संग्रहणीय, प्रातः पठनीय लगभग १२० वाङ्मय ग्रन्थ-प्रसून और किसलय खिल चुके हैं, अथवा खिल रहे हैं।
भूमण्डल पर देश-काल-पात्र के प्रभाव से मानव जाति, विभिन्न
लिपियाँ और भाषाएँ अपनाती रही है। उन सभी भाषाओं में अनेक दिव्य वाणियाँ अवतरित हैं, जो विश्वबन्धुत्व और परमात्मपरायणता का पथ प्रदर्शन करती हैं, किन्तु उन लिपियों और भाषाओं से अपरिचित होने के कारण हम इस तथ्य को नहीं देख पाते। अपनी निजी लिपि और अपनी भाषा में ही सारा ज्ञान और सारी यथार्थता समाविष्ट मानकर, दूसरे भाषा-भाषियों को उस ज्ञान से रहित समझते हुए हम भेद-विभेद के भ्रमजाल में भ्रमित होते हैं।
भूमण्डल की बात तो दूर, हमारे अपने देश ‘भारत’ में ही अनेक भाषाएँ और लिपियाँ प्रचलित हैं। एक ब्राह्मी लिपि के मूल से उत्पन्न होने के बावजूद उन सब से परिचित न होने के कारण हम अपने को परस्पर विघटित समझने लगते हैं। सारी लिपियाँ और भाषाएँ सीखना समझना सम्भव भी नहीं है।
सुतरां, यथासाध्य विश्व और अनिवार्यतः स्वराष्ट्र की सभी भाषाओं के दिव्य वाङ्मय को राष्ट्रभाषा हिन्दी और सम्पर्क लिपि नागरी में सानुवाद लिप्यन्तरित करके, क्षेत्रीय स्तर से बढ़ा कर उसे सारे राष्ट्र को सुलभ कराने, समस्त सदाचार-साहित्य निधि को सारे देश की सम्पत्ति बनाने का संकल्प ईश्वरीय प्रेरणा से मेरे पिता पद्मश्री पण्डित नन्दकुमार अवस्थी जी ने सन् १९४९ ई० में अपनाया। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने वर्ष १९६९ ई० में ‘भुवन वाणी ट्रस्ट’ की स्थापना की, जिसके प्रकाशनों की देश-विदेश में भरपूर सराहना की गई है। प्रस्तुत पवित्र पारसी-धर्मग्रन्थ ‘जेन्द-अवेस्ता’ भी भाषाई सेतु बन्ध की इसी पुष्कल श्रृंखला की एक कड़ी है।
अवेस्ता –
आर्यग्रन्थ दो ही हैं। ‘वेद’ या ‘अवेस्ता’ दोनों ही अटल आज तक स्वाभिमान से मानव धर्म की पताका फहराये हैं। वैदिक और अवेस्ती ये ही धर्म को अनेक रूपी न मानकर एकरूप ‘राइट्यसनेस’ मानते हैं। दोनों ही अपने निवास स्थान के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनके धर्म का कोई भी पृथक् नाम नहीं।SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Zindagi Ka Ganit
“वैशवीकरण एवं बाजारवाद ने हमारी आस्था को सिरे से समाप्त करने का काम किया है । बस हमारे भीतर छोड़ा है तो वस्तुवाद का जहर, जिसके कारण हम मनुष्य से मशीनों में परिवर्तित होते जा रहे हैं । जीवंतता का आभास धीरे-धीरे लुप्त होता चला जा रहा है, जो कि एक अत्यधिक विचारणीय प्रश्न है।
हमें विकास की धारा से अछूता नहीं रहना चाहिए, परंतु विकास की कीमत हम अपने यथार्थ, अपने अस्तित्व के मूल्य से नहीं चुका सकते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘जीवन का गणित ‘ में इस विकासवादी समाज में बढ़ती जा रही विसंगतियों और धीरे-धीरे हमारी संस्कृति पर गहराते संकट को दिखलाने का प्रयास किया गया है ।
पाठकों के मन में प्रशन आएगा कि इस पुस्तक का नाम ‘ जीवन का गणित ‘ क्यों रखा है ? वैसे तो इस पुस्तक का एक लेख ‘ जीवन के गणित ‘ नाम से प्रकाशित हुआ है, परंतु इस पुस्तक में लेखिका ने अपने जीवन की गुल्लक में से छोटे-बड़े लम्हे समेटे हैं, जो कि वास्तविकता में उनके ही नहीं, इस पुस्तक को पढ़ने वाले हर पाठक को अपने जीवन की घटनाओं से जोड़ेंगे।”
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, Suggested Books, इतिहास
Zindagi Ki Geometry
“आम आदमी के स्तर पर बात करें तो विवेक का टकराव ही जीवन को अनिश्चितताओं से भर देता है और यह अनिश्चितता तब और बढ़ जाती है, जब हमको सही जानकारी से वंचित रखा गया हो, जब हमारे अपने ही समाज के समझदार लोगों के द्वारा सदियों से पाले जा रहे अंधविश्वासों से हम उबर नहीं पाते-शिक्षित होकर भी।
यदि हम पूर्वग्रहों से बाहर आ सकें, दूसरों के विचारों का खुले दिल से विश्लेषण करें और अपने विचारों से दूसरे लोगों को भी सच्चे मन से अवगत कराएँ एवं उनके अच्छे विचारों को ग्रहण करें तो उबाने वाली एकरसता नहीं, बल्कि समरसता आ सकती है समाज में, जो बड़ी बात होगी।
कहानी-संग्रह ‘जिंदगी की ज्योमेट्री’ की कहानियाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले लोगों के विवेक के एक अलग माहौल से, टकराव से उत्पन्न परिस्थितियों से जूझने की गाथाएँ हैं। कहीं कोई अपने विवेक के माहौल से टकराव के बाद टूट जाता है तो कहीं परेशानी की भट्ठी में तपकर और मजबूत होकर निकलता है। कहीं कोई बीच का रास्ता पकड़ लेता है, समझौता कर लेता है। माननीय संवेदना को स्पर्श करने वाली पठनीय कहानियों का संकलन।”
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Bhartiya Vidya Bhavan, Hindi Books, Suggested Books, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
आधे रास्ते – Aadhe Raaste Autobiography (Set of 3 Volumes)
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Munshji’s biography in Hindi has been written in three parts.This book is the Hindi edition of the Second book of Munshi : His Art and Work Series. The Hindi editions have been published by the Bhavan’s Delhi Kendra.
Kulapati Munshi was a very versatile person. He was the foremost advocate of his times, an educationist and a literary genius. By establishing the Bhavan he gave a new dimension to culture and education. This extraordinary man’s thinking was a guiding light to the country’s education, literature and culture.SKU: n/a

















