Kalpana Prakashan
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Bhagavan Parshuram Puran
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Bhagavan Parshuram Puran
भारतीय दर्शन-परम्परा में ब्रह्म और जीव का सम्बन्ध नित्य माना गया है। एक आस्था के अनुसार, जीव ब्रह्म का ही सूक्ष्म रूप है, उसी ब्रह्म से उसका जन्म होता है और मृत्यु के पश्चात् उसी ब्रह्म में विलीन होकर उसकी मुक्ति होती है। दूसरी आस्था के अनुसार, वह करुणामयी जब अपने ही प्रतिरूप जीव को मायावी जगत में किसी विपत्ति में देखता है तो उसे त्राण दिलाने के लिए वह स्वयं अवतारी रूप में प्रकट होता है और अपने भक्तों का उद्धार करता है। अब जगत, क्योंकि मूलतः माया के प्रसार का आधार है और जीव अपनी अबोधता, अज्ञानता व चंचलता के कारण बार-बार उसमें डूब जाता है, इसलिए हर-बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है कि ईश्वर को इस धरती पर आना पड़ता है। इसीलिए भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में अवतारवाद की संकल्पना की गई। ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से क्योंकि विष्णु ही इस जगत के पालक देव है, इसीलिए उन्हें ही अपने कर्त्तव्य निर्वाह के लिए हर बार अवतार लेना पड़ता है। मूलतः इन अवतारों की संख्या दस मानी गई थी, किन्तु बाद में विष्णु के 24 अवतारों को मान्यता दे दी गई। इसके अनेक कारण रहे।
विष्णु के दस अथवा चौबीस अवतारों में मात्र एक अवतार परशुराम का ऐसा है जिसे चिरंजीवी होने का भी वरदान प्राप्त है, अन्यथा शेष सभी अवतार इस पृथ्वी पर अपना कार्य सम्पन्न करने के पश्चात् वापिस देव लोक को लौट गये। इस दृष्टि से परशुराम जी का अस्तित्व शेष सभी अवतारों से कहीं अधिक गुरू है। विभिन्न युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि युग) की भारतीय पौराणिक धारणा में यद्यपि यह पहले से ही अन्तर्च्यूत है कि धर्म इन युगों में क्रमशः क्षीण होता जा रहा है, तथापि प्रत्येक युग में विष्णु के इस अवतार पर यह दायित्व बना रहा कि उसने इस पृथ्वी पर से अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार के रूप में अधर्म और अमर्यादा का मर्दन करना है। इसीलिए परशुराम पर आज जितना भी साहित्य उपलब्ध है, उसमें भिन्नता है-उनके जन्म को लेकर, उनके जन्म स्थान को लेकर, उनके कर्म-स्थान को लेकर। परन्तु इन भिन्न आस्थाओं का एक सकारात्मक रूप भी है कि सम्पूर्ण भारतीय चित्त ने इस अवतारी पुरुष के प्रति अपनी आस्था का प्रमाण देते हुए इसे अपने क्षेत्र-विशेष से किसी न किसी रूप में जोड़ने में गर्व अनुभव किया। यदि सुदूर पूर्वोत्तर प्रदेश अरुणाचल में ‘परशु कुण्ड’ की उपस्थिति को यह कहकर मान्यता दी गई कि यहीं परशुराम ने अपने रक्त रंजित परशु को ‘ब्रह्मपुत्र’ में शुद्ध किया था और तभी से उनके परशु पर लगे लहु से लाल होने पर उसका एक नाम ‘लोहित’ भी पड़ा, तो दूसरी ओर, सुदूर दक्षिण-पश्चिम की लोक आस्था परशुराम को केरल की स्थापना का आधार मानती है। इसी प्रकार उत्तर भारत में रेणुका झील, मध्य भारत में नर्मदा तट पर जमदग्नि आश्रम आदि ऐसे अनेक प्रसंग है जो सम्पूर्ण भारतीय आत्मा की परशुराम के प्रति श्रद्धा का प्रमाण देते हैं। ऐसे विराट अवतारी पुरुष पर उपलब्ध अनन्त लोक-कथाओं, आस्थाओं और साहित्य का अवगाहन तब तक असम्भव था जब तक कोई व्यक्ति पूर्ण आस्था, श्रद्धा व समर्पण के साथ भगवान् परशुराम के चरित में आकण्ठ डूबकर उसका मन्थन न करता। इस समर्पण की एक और महत्वपूर्ण शर्त यह भी थी कि कहीं कोई शंका या द्वन्द्व इस मार्ग में अवरोध उत्पन्न नहीं करेगा क्योंकि अनेक स्थलों पर अनेक प्रसंगों, घटनाओं, व्याख्याओं में लोक ने अपनी श्रद्धा के अतिरेक में बहुत कुछ ऐसा भी जोड़ दिया है कि सामान्य व्यक्ति उसे स्वीकार करने को कदाचित् तैयार न होता।
किन्तु मुझे अत्यन्त प्रसन्नता व संतोष है कि डॉ. विक्रम शर्मा जी ने अपनी अगाध आस्था व श्रद्धा का परिचय देते हुए उन्हें बहुत ही परिश्रम से ऐसा क्रमबद्ध कर दिया है कि यह ग्रन्थ सामान्य ग्रन्थ भक्ति एवं शक्ति के प्रतीक भगवान् परशुराम न रह कर’ भगवान् परशुराम पुराण’ में परिवर्तित हो गया है। उन्होंने न जाने कहाँ-कहाँ से परशुराम जी के जीवन से जुड़े प्रसंगों को खोज – खोज कर पूरा एक सन्दर्भ कोश बना दिया है। मुझे लगता है कि शायद ही कोई ऐसा स्रोत बचा होगा जिस पर डॉ. शर्मा की दृष्टि न पड़ी हो। फिर उन स्रोतों से एकत्रित किये गये तथ्यों को क्रम देना-यह उससे बड़ा भागीरथ कार्य था जो इन्होंने सहज ही सम्पन्न किया। मैं समझता हूँ कि यह साक्षात भगवान् परशुराम जी की कृपा रही कि उन्होंने जैसे अपनी ही उपस्थिति में यह वृहत् कार्य सम्पन्न करवाया। लेखक ने भगवान् परशुराम चरित को इस प्रकार सूत्रबद्ध किया है कि वह रोचकता के साथ-साथ पाठकों की अनेक जिज्ञासाओं का भी शमन करेगा। इतनी ही नहीं, यह ग्रन्थ मेरे विभाग में स्थापित ‘भगवान् परशुराम पीठ’ को भी परोक्षतः अनेक प्रकार से दिशा-निर्देश देने में सहयोगी बनेगा-ऐसी मेरी धारणा है। उसी विश्वास के साथ डॉ. विक्रम शर्मा जी के लिए बहुत-बहुत शुभ कामनाएं।SKU: n/a -
Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Bharat Mein Jaati Evam Prajaati
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Bharat Mein Jaati Evam Prajaati
Caste is perhaps the most dominant aspect of Indian society and its study is incomplete without getting into the ramifications of the Hindu caste system. Caste and Race in India, since its first publication in the History of Civilization series, edited by C. K. Ogden in 1932, has remained a basic work for students of Indian sociology and anthropology. Over the years, this book has been highly acclaimed by teachers and reviewers alike, as a sociological classic. The present edition, an expanded version with five new chapters, elaborates on the evolution of sub-castes, and examines caste, sub-caste and kinship. It also presents a provocative and thorough analysis of the relationship between caste and politics by drawing examples from Tamil Nadu as experienced over the years. The concluding chapter is an incisive analysis of Indian society – the author apprehends that India will develop into a plural society and not a casteless one, which was the dream of the architects of her Constitution.
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Bharateey Aayurved
भारतीय आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में निगराने गाने पर रोगमुक्त करने अथवा उसका गगन करने तथा आयु बढ़ाने से है। बरक, एक प्रसिद्ध चिकित्सक और विद्वान जो लगभग २०० ईसा पूर्व रहते थे, आयुर्वेद के जनक के रूप में जाने अग्नि, जल और पृथ्वी। ये तत्व हर चीज में मौजूद हैं, जिसमें हमारा अपना शरीर भी शामिल है। भारतीय पुरातत्वों से बना हुआ मानते हैं. अंतरिक्ष, वायु, चरकसंहिता और सुश्रुतसंहिता चरकसंहिता, आयुर्वेद का सबसे पुराना ज्ञात ग्रन्थ है तथा इसका तुश्रुतसंहिता में अनुपालन हुआ है। हल्दी वो मसाला है जिसका प्रयोग आमतौर पर रसोई में होता है, लेकिन इसकी उपयोगिता के बारे में कम ही लोग जानते हैं। बता दें कि हल्दी कई सारे औषधीय गुणों से भरपूर होता है। हल्दी में मौजूद करक्यूमिन नामक यौगिक बेहद प्रभावी एंटीऑक्सीडेंट हैं, जो ब्लड शुगर और बैड कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में कारगर माना जाता है। इसके साथ ही यह शरीर की अशुद्धियों को आसानी से बाहर निकालने में भी मददगार साबित होता है। जैसा कि हम आपको ऊपर बता चुके हैं, आयुर्वेदिक चिकित्सा कई हजार साल पुरानी है। इसीलिए, आज भी उसमें किसी रोग का उपचार या उसकी रोकथाम करने के लिए हर्बल दवाओं के साथ-साथ विशेष प्रकार के योग व्यायाम और आहार बदलाव आदि की भी मदद ली.
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, प्रेरणादायी पुस्तकें (Motivational books), सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)
Bharateey Sangeet Ka Itihaas
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, प्रेरणादायी पुस्तकें (Motivational books), सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Bharateey Sangeet Ka Itihaas
भारतीय संगीत का इतिहास
अपनी पुस्तक के प्रथम प्रकरण में जोशीजी ने “संगीत
का जन्म” पर विश्व के अनेक विद्वानों के विभिन्न मतों का उल्लेख किया है जोकि मनोरंजनात्मक, हृदयस्पर्शी तथा मार्मिक भी है।
दूसरे प्रकरण में संगीत और भाषा के जन्म का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया, जिसमें कि यह सिद्ध किया है कि भाषा से पूर्व, संगीत का जन्म हो चुका था।
तीसरे प्रकरण में “भारत की प्राकृतिकावस्था का संगीत पर क्या प्रभाव पड़ा” पर सुन्दर प्रकाश डाला है।
चौथे प्रकरण में प्रागैतिहासिक काल के संगीत पर प्रकाश डाला है। इस काल को पूर्व पाषाणकाल, उत्तर पाषाण काल, ताम्र काल तथा लौह काल इत्यादि चार भागों में विभक्त किया है।
पाँचवें प्रकरण में सिंधु नदी की घाटी तथा हड़प्पा (पंजाब) की सभ्यता व संगीत पर ऐतिहासिक दृष्टि से विचार किया है जोकि बड़ा महत्त्वपूर्ण है।
छठे प्रकरण में वैदिक युग के सांस्कृतिक विकास का गौरवपूर्ण ढंग से विस्तृत रूप का वर्णन करके यह प्रमाणित किया है कि वैदिक संस्कृति का विकास भारत में ही हुआ और यहीं से निकलकर भारतीय संगीत विश्व में फैला।
सातवें प्रकरण में पौराणिक काल के संगीत व सामाजिक परिस्थिति का प्रलुब्धकारी वर्णन किया गया है।
आठवाँ प्रकरण रामायण काल में संगीत के विकास पर प्रकाश डालता है, इसमें यह दर्शाया है कि तब, संगीत का आत्मिक सौन्दर्य, समाज में पूर्णतया विकसित हो चुका था। संगीत-चरित्र की मर्यादा की रक्षा का साधन बन गया था।
नवें प्रकरण में महाभारत काल में संगीत के महत्त्व पर बड़े रोचक शब्दों में लिखा है। भगवान् श्रीकृष्ण को, संगीत के युग प्रवर्त्तक आचार्य प्रमाणित किया है।
दसवें प्रकरण में पाणिनि काल के संगीत की लोकप्रियता का वर्णन है।
ग्यारहवाँ प्रकरण में जनपदों के विषय में है। इसमें यह प्रमाणित किया है कि भारतीय संगीत, विदेशों में किस प्रकार पहुँचा। महाराजा वत्सराज उदयन के संगीत प्रेम का वर्णन गौरवमय है।SKU: n/a -
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Bihar ke Nirgun Bhakt Kavi (San 1900 Tak)
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, प्रेरणादायी पुस्तकें (Motivational books), सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Bihar ke Nirgun Bhakt Kavi (San 1900 Tak)
निर्गुण भक्ति-काव्य की परम्परा
संत शब्द ‘सत्’ का वाचक है। सत्-ब्रहृम अर्थात् सच्चा साधु, जो सत्य साध् ान में वर्त्तमान है, सत्य जीवन जी रहा है एवं जो सज्जन, धीर, नित्य, स्थायी, मान्य, पूज्य, प्रशस्त, शुद्ध, पवित्र, श्रेष्ठ, उत्तम, भला, पण्डित, विद्वान् आदि सबकुछ है ।
संत शब्द के अन्तर्गत साधु संन्यासी, विरक्त, त्यागी, महात्मा सबका समावेश है । इसमें हरिभक्त धार्मिक एवं सर्वगुण सम्पन्न पुरूष भी समाये हैं। ऐसे उदार महात्माओं में ऐसा अहंकार कभी जन्म ही नहीं ले सकता कि मैं संत हूँ। संत लोग ‘तृणादपि सुनीच’ एवं ‘तरोरपि सहिष्णु’ होते हैं। यहाँ तक कि सहसा कोई व्यक्ति उनकी ‘साधुता’ एवं ‘संतपना’ समझ और देख नहीं पाते। क्योंकि ऐसे व्यक्ति किसी बाह्य दिखावा धारण कर, या शरीर को विशेष प्रकारके वस्त्रों से सजाकर संत, महात्मा नहीं बनते । संसारी बनावट, संसारिकों, मायावियों के लिए है, उससे संत को लेशमात्र का भी लगाव नहीं है। कोई भी साधक अपनी कठोर साधना और सहज भाव के साधन से ही अपने परम साध्य (संतत्व) को प्राप्त कर सकता है। संत की समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ अर्हनिश ब्रह्ममय बनी रहती हैं। उसकी जिह्वा पर प्रभु का नाम शब्द कर्ण कुहर मे नाम-ध्वनि और आँखों से चराचर को ब्रह्ममय देखता है। ऐसे महापुरूष प्रतिपल अपने अंतः का निरीक्षण और परीक्षण करते रहते हैं। ऐसे तो उनके निर्मल मन में किसी प्रकार के विकार की जगह होती ही नहीं; दुर्योग से कहीं से कुछ हल्की-सी सांसारिकता ने प्रवेश किया कि वे उस असंत भाव को तत्क्षण निष्कासित कर देते हैं। ऐसे लोग सतत् जागरूक और सावधान रहते हैं। परदुख कातरता और परोपकार ही उनका व्यसन होता है। उनके प्रति दुर्विचार, शत्रु भाव रखने वाले के प्रति भी वे उसके प्रति सद्भाव ही रखते हैं। वे पंच क्लेशों और षड्विकारों को पल भर के लिए भी अपने पास फटकने नहीं देते, अनिष्ट करने वालों की भी वे उनकी इष्ट साधना ही करते हैं। वैसे ही महापुरूषों के लिए गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा
‘तुलसी संत सुअम्ब तरू, फूलै फलै पर हेत । जितते वे पाहन हनै, उतते वे फल देत ।।
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Bihar ki lok Kathayen
जन्म : 29 दिसम्बर 1978 (पंजाब के शहर बटाला में)
शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी), एम.फिल., पी.एच.डी. (गुरु नानक विश्वविद्यालय, अमृतसर)
प्रकाशन : अमर अजाला, दिव्य हिमाचल, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, दैनिक सवेरा, दैनिक ट्रिब्यून, पंजाब केसरी, उत्तर प्रदेश, परिकथा, हंस इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित
कृतियाँ
कथाकार सतीश जमाली (लघुशोध ग्रंथ) अंधेरों के खिलाफ लड़ना है (कविता संग्रह) पंजाब का हिन्दी साहित्य और प्रमुख चिन्तक ‘शिखरों का स्पर्शी’, ‘कविता कहो जिन्दगी’ तथा ‘काव्य विविधा’ कविता संग्रहों में कविताएँ संकलितमूलतः कवयित्री, कथाकार सैली बलजीत की ज्येष्ठ संतान, उदयीमान कलाशिल्पी अमितेश्वर सैली की ज्येष्ठ बहन। लेखन की शुरूआत घर के साहित्यिक माहौल से आरम्भ हुई। देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त। कविताओं में नारी चेतना तथा सामाजिक विषमताओं का चित्रण करने में दक्ष आकाशवाणी और दूरदर्शन जालन्धर से कविताएँ तथा वार्ताएँ प्रसारित । विश्वविद्यालय स्तर के सेमीनारों तथा कवि सम्मेलनों में भागीदारी ।
सम्मान : साहित्य-कला विकास परिषद्, बेगूसराय (बिहार) 2021, राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा कवि पुरस्कार 1995, दिशा साहित्य मंच सम्मान 2012, त्रिवेणी साहित्य अकादमी सम्मान (जालन्धर) 2017, पंजाब कला साहित्य अकादमी जालन्धर का युवा कवयित्री विशेष अकादमी सम्मान 2021
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Gumanam Veeranganaon Ka Itihaas
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Gumanam Veeranganaon Ka Itihaas
संसार में परमात्मा ने स्त्री-शक्ति का मुकाबला करने वाली कोई दूसरी शक्ति उत्पन्न नहीं की। वास्तव में भारतीय इतिहास में गौरवपूर्ण अध्याय के निर्माण कार्य में जितना सहयोग स्त्री शक्ति ने दिया है उतना अभी तक किसी ने नहीं दिया। आदिकाल में भी जब-जब देवासुर-संग्राम छिड़ा राक्षसी शक्ति को नष्ट करने के लिए दैवी शक्ति का आश्रय लिया गया। भारत के स्वाधीनता संग्राम में आक्रमणकारियों के विरुद्ध सदैव स्त्री शक्ति अग्रणी रही। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अनेक दौरों से गुजरा। 1857 के विद्रोह में विश्व के सबसे महान् व शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती दी गई। 1857 के इस विद्रोह में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल जैसी वीरांगनाओं का योगदान विशेष उल्लेखनीय रहा। गांधी युग में राष्ट्रीय आन्दोलन जन आंदोलन में परिवर्तित हो गया। इस युग में सभी धर्मों व सम्प्रदायों के अनुयायियों तथा जनता के प्रत्येक वर्ग ने बढ़-चढ कर भाग लिया। इस कार्य में महिलाएँ भी पीछे नहीं रही। आरंभ से लेकर अंत तक उन्होंने न केवल शंतिपूर्ण आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया अपितु वे क्रांतिकारी गतिविधियों में भी सक्रिय रहीं। गांधी जी भी राष्ट्रीय आन्दोलन में महिलाओं की भागीदारी के पूर्ण पक्षधर थे। राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेकर महिलाओं ने न केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की बल्कि गिरफ्तार भी हुई। कुल मिलाकर महिलाओं के अंदर इस समय जो राष्ट्रचेतना पैदा हुई थी उसने यह सिद्ध कर दिया कि वे एक ऐसी राष्ट्रीय शक्ति है जो राष्ट्र की स्वाधीनता और अधिकारों के लिए सभी बंधनों से उन्मुक्त होकर लड़ सकती है। इस समय जिन स्त्रियों ने इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था उनमें एक पंक्ति उनकी भी थी जो गांधी जी के अहिंसावादी नीति का अनुसरण कर रही थीं और दूसरी पंक्ति उनकी थी जिन्होंने क्रांति का मार्ग चुना था। राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में अपने आप को महिलाओं ने विविध आयामों के साथ प्रस्तुत किया है।
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Hariyana Ki Lokakathaen
लोकविरसा किसी भी प्रांत की धरोहर होती है। इसकी मासूमियत में इतनी ताकत होती है कि जो प्राकृतिक आपदाओं और मानव द्वारा छेड़छाड़ के बावजूद भी जिन्दा रहती है। यह अन्नत तक चलने वाली लोकधरोहर है, जो कभी खत्म हो ही नहीं सकती।
हरियाणा की लोककथाओं में लोकनायक, जिन्न, भूतों, पिशाचों, राक्षसों तथा खौफनाक दरिन्दों से भिड़ने की क्षमता रखते हैं तथा अदृश्य शक्तियों से जीत प्राप्त करने का फन जानते हैं। यह लोककथाएं मनुष्य में जिज्ञासा तथा दिलचस्पी उत्पन्न करती हैं। किस तरह अंधेरी अनदेखी जगहों पर लोककथाओं का नायक खौफनाक जीव-जन्तुओं से भिड़ कर अपने वष में कर लेता है।
यह तिलिस्मी लोककथाएं आज भी पाठकों को भीतरी मन से प्रभावित करती हैं और सच ही वह उन तिलिस्मी कन्दराओं में विचरने लगता है।
हमारे बुजुर्ग ना तो किसी राजघराने से होते थे और ना ही बहुत धनाढ्य होते थे। उनमें अधिकतर मेहनतकश किसान या श्रमजीवी ही होते थे। उनके लिए लोकविरासत एक जुनून, एक चुम्बकीय आकर्षण .. तथा जीने का बहाना ही हुआ करता था।
कोई ज़माना था हम अपने दादा-नाना से कहानी सुनते थे, जिन्हें जम्मू-कश्मीर में बात सुनाना भी कहते हैं। इन्हीं लोककथाओं को हमने ‘बातों’ के रूप में जाने कितनी बार सुना होगा। हमारी लोकविरासत बहुत ही समृद्ध और गंभीर है, जिनमें आलौकिक आकर्षण तथा चुम्बकीय शक्ति के अनेक द्वार खुलते प्रतीत होते हैं।
हरियाणा की यह लोककथाएं हरियाणा के जनमानस और लोकधारा का बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथा अभिन्न अंग हैं। लोककथाओं में एक तिलिस्मी दुनिया के अनेक द्वार स्वतः ही खुलते प्रतीत होते हैं। हमारी लोककथाओं के कथानक भी अद्भुत और तिलिस्म से भरे होते हैं। इनमें क्या-क्या नहीं होता। हमारी लोककथाओं में परियाँ, प्रेत, पिशाच, दैत्य, गिठमुठिए, बोलने वाले साँप, तोते, बिल्लियाँ, लोमड़ियाँ, इच्छाधारी नाग, उड़ने वाले घोड़े, शलेडे, रहम दिल मछलियाँ, रहस्यमयी पेड़, रहस्यमयी कुएं, रहस्यमयी नदी-नाले, रूप बदलने वाले जंगली जानवर, दरख़्तों की डालियों पर लटके साँप, चन्दन से महकते जंगल, ढोंगी साधु, रहम दिल राजा-वजीर, चोरों के काफिले और भी ना जाने क्या-क्या नहीं होता। यह सब हमें एक तिलिस्मी दुनिया में विचरने को विवश कर देते हैं।
यह कपोल कल्पित पात्र लोककथाओं की रूह होते हैं। यह कल्पित पात्र चाहे विज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते लेकिन हमारी लोक विरासत ने इन्हें कभी विस्मृत नहीं होने दिया। ‘एक बार की बात है’ या ‘बात बहुत पुरानी है’ या ‘बात बहुत पुरानी नहीं है’ आदि शब्द सुनते ही एक तिलिस्मी और रहस्यमयी परिलोक, एक आलौकिक दुनिया के मायवी किस्सों वाला संसार मन की भीतरी तहों में जीवित होने लगता है।
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Himaachal kee Lokakathaen
लोकविरसा किसी भी प्रदेश की धरोहर होती है। इसकी मासूमियत में इतनी ताकत होती है कि जो प्राकृतिक आपदाओं और मानव द्वारा छेड़छाड़ के बावजूद भी ज़िन्दा रहती है। यह अन्नत तक चलने वाली लोकधरोहर है, जो कभी ख़त्म हो ही नहीं सकती।
हिमाचल की लोककथाओं में लोकनायक, जिन्न, भूतों, पिशाचों, राक्षसों तथा खौफनाक दरिन्दों से भिड़ने की क्षमता रखते हैं तथा अदृश्य शक्तियों से जीत प्राप्त करने का फन जानते हैं। यह लोककथाएं मनुष्य में जिज्ञासा तथा दिलचस्पी उत्पन्न करती हैं। किस तरह अंधेरी अनदेखी जगहों पर लोककथाओं का नायक खौफनाक जीव-जन्तुओं से भिड़ कर अपने वश में कर लेता है।
यह तिलिस्मी लोककथाएं आज भी पाठकों को भीतरी मन से प्रभावित करती हैं और सच ही वह उन तिलिस्मी कन्दराओं में विचरने लगता है।
हमारे बुजुर्ग ना तो किसी राजघराने से होते थे और ना ही बहुत धनाढ्य होते थे। उनमें अधिकतर मेहनतकश किसान या श्रमजीवी ही होते थे। उनके लिए लोकविरासत एक जुनून, एक चुम्बकीय आकर्षण… तथा जीने का बहाना ही हुआ करता था।
कोई ज़माना था हम अपने दादा-नाना से कहानी सुनते थे, जिन्हें हिमाचल प्रदेश में बात सुनाना भी कहते हैं। इन्हीं लोककथाओं को हमने ‘बातों’ के रूप में जाने कितनी बार सुना होगा। हमारी लोकविरासत बहुत ही समृद्ध और गंभीर है, जिनमें आलौकिक आकर्षण तथा चुम्बकीय भाक्ति के अनेक द्वार खुलते प्रतीत होते हैं।
हिमाचल की यह लोककथाएं हिमाचल के जनमानस और लोकधारा का बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथा अभिन्न अंग हैं। लोककथाओं में एक तिलिस्मी दुनिया के अनेक द्वार स्वतः ही खुलते प्रतीत होते हैं। हमारी लोककथाओं के कथानक भी अद्भुत और तिलिस्म से भरे होते हैं। क्या-क्या नहीं होता। हमारी लोककथाओं में परियाँ, प्रेत, पिशाच, दैत्य, गिठमुठिए, बोलने वाले साँप, तोते, बिल्लियाँ, लोमड़ियाँ, इच्छाधारी नाग, उड़ने वाले घोड़े, भालेडे, रहम दिल मछलियाँ, रहस्यमयी पेड़, रहस्यमयी कुँए, रहस्यमयी नदी-नाले, रूप बदलने वाले जंगली जानवर, दरख़्तों की डालियों पर लटके साँप, चन्दन से महकते जंगल, ढोंगी साधु, रहम दिल राजा-वजीर, चोरों के काफिले और भी ना जाने क्या-क्या नहीं होता। यह सब हमें एक तिलिस्मी दुनिया में विचरने को विवश कर देते हैं।
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Lok Aastha Ka Mahaaparv Chhath
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, प्रेरणादायी पुस्तकें (Motivational books), सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Lok Aastha Ka Mahaaparv Chhath
भारतीय संस्कृति के अमर गायक महाकवि जयशंकर प्रसाद जी ने कहा है –
‘हिमालय के आँगन में प्रथम किरणों का दे उपहार, ऊषा ने हँस अभिनन्दन किया और पहनायाहिरक-हार ।
जगे हम लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक, व्योम-तम-पुंज हुआ तब नाश अखिल संसृति हुई अशोक” ।। सचमुच, अखिल सृष्टि को अभय प्रदान करने वाला दिव्य प्रकाश ही सनातन संस्कृति या भारतीय संस्कृति है। यह संस्कृति आदिकाल से पतित-पावनी, पावन-तोया गंगा मैया की भाँति निर्बाध प्रवाहित चली आ रही है। इस भारतीय संस्कृति की आत्मा उसकी धार्मिक परम्पराएँ हैं। ऋग्वेद् के ‘पृथ्वीसूक्त’ के अनुसार हमारी मातृभूमि अनेक प्रकार के जन को धारण करती हैं। ये बहु भाषा-भाषी जन नाना प्रकार के सम्प्रदायों में विश्वास करते हैं, लेकिन सबका धर्म वही एक सनातन है । इसीलिए इसी विविधता में एकता के चलते, भारतवर्ष की अन्तरात्मा कभी आक्रान्त नहीं हुई । हमारे ऋषि, मुनि, मनीषियों ने अनेकता के मूल में छिपी एकता के उन तत्त्वों की खोज की, जो हमारी सांस्कृतिक एकता का आज भी वहन कर रहे हैं । समन्वयात्मक दृष्टिकोण जैसा बलशाली तत्त्व हमारी संस्कृति की आत्मा है ।
हमारी धार्मिक परम्पराएँ सबल, निर्बाध और लोक हितकारी बनी रहें, इसके लिए हमारे मनीषियों ने इस संस्कृति में अनेक प्रकार के व्रतपर्वोत्सवों का विधान निर्मित किया है । पुरूषार्थ चतुष्टय में सब की अनिवार्यता है, पर ‘मोक्ष’ सर्वोपरि है । और भक्ति, ज्ञान, वैरग्य मोक्ष के प्रमुख कारक हैं, इसलिए इनपर हमारे ऋषि पल-पल सावधान रहे हैं । दैनिक चर्या के नित्य, नैमितिक एवं काम्य कर्मों में भगवान की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए मानव-जीवन का व्रतपर्वोत्सवों से समृद्ध होना परम आवश्यक है ।
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Meri Mati Mera Desh
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, प्रेरणादायी पुस्तकें (Motivational books), सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Meri Mati Mera Desh
आज की तेजी से भागती दुनिया और कठिन प्रतिस्पर्धात्मक दैनिक जीवन में, युवाओं को हमारी समृद्ध विरासत और अतीत को याद करने के लिए मुश्किल से ही समय मिलता है। यह सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है जब राष्ट्र आज़ादी का अमृत महोत्सव (भारतीय स्वतंत्रता के 77 वर्ष का स्मरणोत्सव) मना रहा है। भारत में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ाई एक अनूठी कहानी है, जो हिंसा से प्रभावित नहीं है। बल्कि एक कहानी जो इस लम्बे-चौड़े उपमहाद्वीप में वीरता, बहादुरी, सत्याग्रह, समर्पण और बलिदान की विविध कहानियों से भरी है। ये कहानियाँ समृद्ध भारतीय सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं की रचना करती हैं। इस प्रकार, गुमनाम नायकों को कम-ज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में परिभाषित करने की जरूरत नहीं है। वे कभी-कभी ऐसे नेता हो सकते हैं जिनके आदर्श भारतीय मूल्य प्रणाली को चित्रित करते हैं।
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Panjab Ki Lokakathaen
लोकविरसा किसी भी प्रांत की धरोहर होती है। इसकी मासूमियत में इतनी ताकत होती है कि जो प्राकृतिक आपदाओं और मानव द्वारा छेड़छाड़ के बावजूद भी जिन्दा रहती है। यह अन्नत तक चलने वाली लोकधरोहर है, जो कभी ख़त्म हो ही नहीं सकती।
पंजाब की लोककथाओं में लोकनायक, जिन्न, भूतों, पिशाचों, राक्षसों तथा खौफनाक दरिन्दों से भिड़ने की क्षमता रखते हैं तथा अदृश्य शक्तियों से जीत प्राप्त करने का फन जानते हैं। हैं। यह लोककथाएं मनुश्य में जिज्ञासा तथा दिलचस्पी उत्पन्न करती हैं। किस तरह अंधेरी अनदेखी जगहों पर लोककथाओं का नायक खौफनाक जीव-जन्तुओं से भिड़ कर अपने वश में कर लेता है।
यह तिलिस्मी लोककथाएं आज भी पाठकों को भीतरी मन से प्रभावित करती हैं और सच ही वह उन तिलिस्मी कन्दराओं में विचरने लगता है।
हमारे बुजुर्ग ना तो किसी राजघराने से होते थे और ना ही बहुत धनाढ्य होते थे। उनमें अधिकतर मेहनतकश किसान या श्रमजीवी ही होते थे। उनके लिए लोकविरासत एक जुनून, एक चुम्बकीय आकर्शण… तथा जीने का बहाना ही हुआ करता था।
कोई ज़माना था हम अपने दादा-नाना से कहानी सुनते थे, जिन्हें पंजाब में बात सुनाना भी कहते हैं। इन्हीं लोककथाओं को हमने ‘बातों’ के रूप में जाने कितनी बार सुना होगा। हमारी लोकविरासत बहुत ही समृद्ध और गंभीर है, जिनमें आलौकिक आकर्शण तथा चुम्बकीय शक्ति के अनेक द्वार खुलते प्रतीत होते हैं।
पंजाब की यह लोककथाएं पंजाब के जनमानस और लोकधारा का बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथा अभिन्न अंग हैं। लोककथाओं में एक तिलिस्मी दुनिया के अनेक द्वार स्वतः ही खुलते प्रतीत होते हैं। हमारी लोककथाओं के कथानक भी अद्भुत और तिलिस्म से भरे होते हैं। इनमें क्या-क्या नहीं होता। हमारी लोककथाओं में परियाँ, प्रेत, पिशाच, दैत्य, गिठमुठिए, बोलने वाले साँप, तोते, बिल्लियाँ, लोमड़ियाँ, इच्छाधारी नाग, उड़ने वाले घोड़े, शलेडे, रहम दिल मछलियाँ, रहस्यमयी पेड़, रहस्यमयी कुँए, रहस्यमयी नदी-नाले, रूप बदलने वाले जंगली जानवर, दरख्तों की डालियों पर लटके साँप, चन्दन से महकते जंगल, ढोंगी साधु, रहम दिल राजा वजीर, चोरों के काफिले और भी ना जाने क्या-क्या नहीं होता। यह सब हमें एक तिलिस्मी दुनिया में विचरने को विवश कर देते हैं। यह कपोल कलपित पात्र लोककथाओं की रूह होते हैं। यह कलपित पात्र चाहे विज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते लेकिन हमारी लोक विरासत ने इन्हें कभी विस्मृत नहीं होने दिया। ‘एक बार की बात है’ या ‘बात बहुत पुरानी है’ या ‘बात बहुत पुरानी नहीं है’ आदि शब्द सुनते ही एक तिलिस्मी और रहस्यमयी परिलोक, एक आलौकिक दुनिया के मायवी किस्सों वाला संसार मन की भीतरी तहों में जीवित होने लगता है।
समय के साथ-साथ इन लोककथाओं का अलग ढंग से अध्ययन और विवेचन होने लगा है। लोककथाएं कहाँ से पनपती हैं…? यह कैसे और कहाँ विचरती हैं…? क्या-क्या… क्यों-क्यों तथा कैसे-कैसे घटता है, निस्संदेह यह अध्ययन का विशय हो सकता है। ‘पंजाब की लोककथाएँ’ के सृजन कार्य के अन्तराल में मुझे इस तिलिस्मी दुनिया के अनेक मायावी पड़ावों से गुज़रते हुए सुखद लगा है। मैं इस अन्तराल में लगभग इस मायावी दुनिया का एक अभिन्न अंग बनी रही हूँ। इन लोककथाओं के सृजन में मैंने प्रसव पीड़ा का भी अनुभव किया है। सच ही इस तिलिस्मी संसार में विचरना सुखद भी लगा और यंत्रणामय भी। मैंने पंजाब की विरासत को लोककथाओं के माध्यम से सहेजने का प्रयास मात्र किया है जो मेरे लिए निस्संदेह संतोशप्रद है।
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आचार्य शीलक राम
आचार्य शीलक राम का जन्म एक किसान परिवार में 1965 ई. में हुआ। आपने अपनी शिक्षा की शुरूआत गाँव के ही विद्यालय से शुरु करके उसमानिया विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से संपन्न की। आपने दर्शनशास्त्र, हिंदी व संस्कृत विषयों से स्नातकोत्तर परीक्षाएं उत्तीर्ण करके दर्शनशास्त्र विषय से एम.फिल्. व पीएच.डी. की उपाधियां अर्जित की। इसके साथ ही आपने ‘दर्शनशास्त्र’, ‘धार्मिक अध्ययन’ एवं ‘जैन- बौद्ध-गाँधी व शांति अध्ययन’ विषयों से नेट (UGC NET) परीक्षाएं उत्तीर्ण की हैं। लेखक ने महान् दार्शनिक ऋषि दयानंद, योगिराज अरविंद, जिद्दू कृष्णमूर्ति, ओशो रजनीश आदि की योग-साधना तथा सनातन भारतीय हिंदू योग साधना में पारंगत हिमालय के योगियों के मार्गदर्शन में कई वर्षों तक योग साधना की। आपने कई महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया है। इस समय आप कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के अंतर्गत ‘दर्शनशास्त्र विभाग’ में असिसटेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। आपने बचपन से ही लेखन कार्य शुरू कर दिया था। अब तक आपकी पचास पुस्तकों का लेखन हो चुका है जिनमें से पच्चीस प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तकों में भगवान् का गीत ढाई आक्खर प्रेम का आंक्ख्यां देक्खी • जीवन-दर्शन एवं संस्कृति लूट सके तो लूट दर्शन ज्योति सांगी पं. लखमीचंद के सांगों का दार्शनिक विवेचन अमृतकलश हरियाणवी लोक साहित्य में दर्शन की अवधारणा : बाजे भगत एवं पं. लखमीचंद के विशेष संदर्भ में जागो भारत ब्रह्मज्ञानी कौन? महायोद्धा श्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा विश्वगुरू भारत भारतीय दर्शन की सनातन परंपरा भगवान् बुद्ध का आर्य वैदिक सनातन हिंदू-दर्शन सनातन भारतीय योग साधना एवं उसकी विविध ध्यान-विधियाँ सम्मिलित हैं। आपकी दो पुस्तकों ‘भगवान् का गीत’ व ‘ढाई आक्खर प्रेम का’ को हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला द्वारा सम्मानित किया गया है। आप हरियाणवी भाषा के भी प्रसिद्ध कवि, लेखक एवं आलोचक हैं। काव्य, आलोचना, दर्शन एवं योग में आपकी गति विस्मयकारी है। सनातन भारतीय आर्य हिंदू वैदिक संस्कृति, योग, दर्शन, जीवन मूल्यों तथा राष्ट्र भाषा के प्रति आपकी असीम श्रद्धा है तथा इनके प्रचार-प्रसार हेतु आप सतत् कार्यरत हैं। इसके साथ आप दस अंतर्राष्ट्रीय रैफरीड रिसर्च जर्नल्स के संपादक एवं स्वामी हैं। इन जर्नल्स के नाम हैं
‘चिंतन’, ‘प्रमाण’, ‘द्रष्टा’, ‘दर्शन’, ‘दर्शन-ज्योति’, ‘स्वदेशी’, ‘ABSURD’, ‘AWARENESS’, ‘JUSTICE’ एवं ‘VISION’ I
विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रिसर्च जर्नल्स में आपके पचास शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में भी आपके 300 के लगभग लेख प्रकाशित हो चुके हैं। इस समय आप अध्यापन के साथ-साथ योगाभ्यास करवाने, लेखन करने, राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रचार-प्रसार करने तथा सनातन भारतीय जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता को समस्त जगत् को समझाने हेतु कार्यरत हैं।SKU: n/a -
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Vaidik Sanskrti Ka Udgam Kshetr Mandar
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वैदिक संस्कृति का उदगम क्षेत्रः
मंदार
प्रस्तुत ग्रंथ “वैदिक संस्कृति का उदगम क्षेत्रः मंदार” में लेखक ने यह साबित किया है कि वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति का उदगम क्षेत्र मंदार पर्वत ही रहा है जो वर्तमान में बिहार के बांका जिले में स्थित है। साथ ही यह दशार्या गया है कि सृष्टि उदविकास का इतिहास प्राचीन भारत के मूलखंड “अंगबिहार” से ही प्रारंभहोता है। विश्व सभ्यता और संस्कृति की मातृभूमि करोडो वर्ष पूर्व का भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया का पूर्वांचल मूल भाग “अंग बिहार” ही रहा था जहाँ सात करोड वर्ष पूर्व आज के इंग्लैण्ड, अमेरिका, रुस, चीन, यूरेशिया, पारस, यूरोपीय आदि देशों की सभ्यता पनप रही थी ।
अंग की ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विचारधारा में निहित वैदिक, पौराणिक तथ्यों और वैदिक रहस्यों की छानबीन करने पर मूल सृष्टि, मूल सभ्यता, मूल संस्कृति एवं मूल जीव विकास का जो पुरातात्विक एवं वैज्ञानिक आधार मिला है, वह आज तक के प्राचीन भारतीय इतिहास, प्राचीन साहित्य संस्कृति, भाषा विज्ञान एवं भूगोल में समूल परिवर्तन चाहती है तथा वर्तमान इतिहासकार, पुराविदों, भाषाविदों एवं शोधकताओं को सजग करता हुआ एक समुचित दिशा निर्देश करती है।
प्रस्तुत ग्रंथ में अग्नि, पृथ्वी, इन्द्र, वरुण, रुद्र, भरत, विवस्वत, यम, प्रजापति, अदिति, दिति पुत्रों एवं वैदिक ऋषियों सहित राजा महराजाओं के संबंध में विस्तृत जानकारियां दी गई है और वैदिककालीन भूगोल, रामायणकालीन भूगोल एवं महाभारतकालीन भूगोल के आधार पर वेद, पुराण, रामायण एवं महाभारत वर्णित मूल स्थानों, मूल दिव्यधामो एवं मूल तीर्थस्थलों की खोज की गई है जो प्राचीन भारतीय इतिहास के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करती है। प्रस्तुत पुस्तक को पाठकों के बीच रखते हुए गर्व का अनुभव हो रहा है।SKU: n/a






