Luminous Books
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Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Bharatiya Kala : Lok Parampra evm Sangeet me Ganga ka Pravah
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Bharatiya Kala : Lok Parampra evm Sangeet me Ganga ka Pravah
भारतीय जन मानस के लिए गंगा भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक है। अपने स्वरूप एवं प्रवाह में निरंतर बदलाव लाने पर भी अपने मूल रुप में तो वही गंगा ने युगों-युगों तक एक समूची सभ्यता को न केवल सिंचित किया है, बल्कि उसका भरण-पोषण भी किया है। गंगा शाश्वता का प्रतीक है तथा कला, पौराणिक कथाएँ एवं साहित्य सभी उसका गुणगान करते हैं। आज भी हिंदुओं के सभी धार्मिक कार्य और संस्कारों में अनिवार्य तत्व के रूप में गंगाजल की प्रधानता है। भारतीय कला में गंगा नदी को देवी के रूप में अनेक प्रतीकों के साथ अपने संरक्षक की भूमिका में प्रेषित की गई है। मकर कुंभ तथा अनेक अलंकारों से सुसज्जित किया गया है। यह सभी विशेषताएं गंगा के अर्थ को विस्तार देती है । धर्म के अनेक पक्षों, मिथकों तथा कलाओं में शताब्दियों से स्वरूपों तथा कथ्यो के द्वारा उन्हें प्रदर्शित किया जाता रहा है। प्रस्तुत पुस्तक धर्माचार्यों, जिज्ञासुओं, शोधकर्ताओं, आचार्यों, राजनेताओं इतिहासकारों एवं आमजन के लिए नितांत उपयोगी साबित होगा।
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Bhishm Krit Ganga Stuti
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Bhishm Krit Ganga Stuti
भीष्म राजा शान्तनु के पुत्र थे। भागीरथी गंगाजी से उनका जन्म हुआ था। वे द्यो नामक नवम वसु के अवतार माने जाते हैं। उनका पूर्व नाम देवव्रत था। उन्होंने अपने पिता की इच्छा पूर्ण करने के लिए आजीवन अविवाहित रहने की दृढ़ प्रतिज्ञा ली थी जिससे उनका नाम भीष्म पड़ा। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा गंगा की स्तुति और महात्म का वर्णन है। भीष्म कहते हैं वे ही देश, जनपद, आश्रम और पर्वत पुण्य की दृष्टि से पवित्र हैं, जिनके बीच से होकर सरिताओं में उत्तम भारतीय धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है। बहुत से पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता हैं।
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Daiveey Shakti Sampann Kinnar Aur Kinnar Akhaada
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Daiveey Shakti Sampann Kinnar Aur Kinnar Akhaada
प्राचीन भारत में कित्ररों का उल्लेख साहित्य, धर्मग्रंथों और सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष रूप से मिलता है। किन्नरों का वर्णन बुद्धि, विद्या और बल में सामर्थ्य रखते हुए चित्रित किया गया है। किन्नरों को अक्सर अद्वितीय गुणों और क्षमताओं वाले प्राणी के रूप में देखा गया है, जो देवताओं और मनुष्यों के बीच एक सेतु का कार्य करते थे। उनके सामाजिक, सांस्कृतिक, और आध्यात्मिक महत्व को विभित्र प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक संदर्भों में व्यापक रूप से वर्णित किया गया है। महाभारत में कित्रर रूप में शिखंडी और ब्रह्नलला का स्थान विशेष है। वाल्मीकि कृत रामायण के उत्तरकांड में वर्णित किन्नरों की प्रत्यक्ष उपस्थिति मिलती है।
किन्नरों की सामाजिक स्थिति हमेशा से ही एक बहस का मुद्दा रही है। हालांकि, समय के साथ इस समुदाय ने अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष किया और समाज में सम्मान प्राप्त करने के लिए कई कदम उठाए। इस संघर्ष और संघर्ष के हिस्से के रूप में किन्नर अखाड़े की स्थापना की गई। किन्त्रर वर्ग के उत्थान और समाज में पर्याप्त सम्मान दिलाने के उद्देश्य को चरितार्थ करने के लिए किन्नर अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी प्रयासरत है।SKU: n/a -
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Dalit Utthaan Ke Agradoot Pandit Madan Mohan Malviy
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Dalit Utthaan Ke Agradoot Pandit Madan Mohan Malviy
कितना प्राचीन अपना देश है। कालखंड से देश की प्राचीनता तिथि से तय नहीं किया जा सकता। यहां का सामाजिक जीवन भी भारत की ही तरह प्राचीन है। भारत का सामाजिक जीवन अत्यंत विविधतापूर्ण है तथा उसकी सामाजिक संस्थाएं सतत प्रवाहमान है। महाभारत में ऐसे समाज का चित्रण है जो अधिक मुक्त और स्पंदनशील है। मालवीय जी ने कहा ‘‘जन्म-जाति की उच्चता या नीचता के स्थान पर गुण एवं कर्म पर इसके आगे जाति-पाँति नहीं मानता।’’ २३ जनवरी, १९२७ से २६ जनवरी के बीच प्रयाग में त्रिवेणी तट पर अर्धकुम्भ के अवसर पर ‘अखिल भारतवर्षीय सनातन धर्म महासभा’ का अधिवेशन हुआ। चार दिन के इस कार्यक्रम के तीन दिनों की अध्यक्षता मालवीय जी की रही, परन्तु २५ जनवरी को महाराजा दरभंगा कामेश्वर सिंह बहादुर के सभापतित्व में विद्वतमंडली और प्रतिनिधियों द्वारा बड़े महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किये गये ‘महासभा’ के इसी अधिवेशन के माध्यम से अछूतों को ‘मंत्र-दीक्षा’ देने का प्रस्ताव भी उन्होंने स्वीकृत कराया। तत्पश्चात सन १९२७ में महाशिवरात्रि के दिन काशी में दशाश्वमेध घाट पर उन्होंने सभी वर्णों के लोगों को मंत्र दीक्षा दी। ये मंत्र इस प्रकार थे- ‘ॐ नम: शिवाय’, ‘ॐ नमो नारायणाय’, ‘ॐ रामाय नम:’, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ आदि।
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GANGA AVTARAN : RAHASYA EVAM PRAYOJAN
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)GANGA AVTARAN : RAHASYA EVAM PRAYOJAN
सनातन धर्म में नदियों को देवी का स्वरूप माना जाता है। धरती पर गंगा का अवतरण भागीरथ जी के प्रयास के द्वारा ही संभव हो सका। मां गंगा पापविमोचनी है, मंदाकिनी है, जाह्नवी है, कई नामों से इस धरती पर पुकारा जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को स्वर्ग में बहने वाली गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने की कथा कई महाकाव्यों, पुराणों और अन्य हिंदू धर्म ग्रंथों में मिलती है। सबसे पहले गंगा के अवतरण की कथा वाल्मीकि रचित रामायण के बालकांड के सर्ग ३४ से सर्ग ४४ में मिलती है। आकाश से हिमालय पर उतरती हैं। सत्रह सौ मील धरती सींचती हुई सागर में विश्राम करने चली जाती हैं। वह कभी थकती नहीं, अटकती नहीं। वह तारती हैं, उबारती हैं और भलाई करती हैं। यही उनका काम है। वह इसमें सदा लगी रहती हैं।
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Ganga Teerth
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Ganga Teerth
भारत में गंगा नदी को बहुत पवित्र के साथ उनको माता का दर्जा प्राप्त है। गंगा केवल जीवनदायिनी नहीं है, बल्कि वह सभी पापों को नष्ट करती है और मोक्ष की प्राप्ति करवाती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक गंगा के जल का हर कार्य में प्रयोग किया जाता है। धार्मिक दृष्टि से गंगा कामनाओं को पूर्ण करने वाली, पापों को हरने वाली, मंगलकरणी, सुख, समृद्धि, शांति देने वाली मानी गई है। भारतीय ऋषि-महर्षियों को गंगा के वैज्ञानिक महत्व एवं अद्भुत प्राकृतिक संरचना का ज्ञान था, इसी कारण गगीता व अन्य शास्त्र-पुराणों में गंगा भारतीय संस्कृति का प्राण बताया है। भारतीय जन मानस में गंगा को परब्रह्म, निर्विकार, निराकार, पापहारिणी और सत्-चित् आनंद का प्रतीक माना जाता है। वे जीवन पोषण की पूर्णता हैं तो पूर्णमुक्ति की संदेश वाहक तथा कारक भी।
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Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)
Kumbh Kee Apriy Ghatanaon Ka Vishleshan
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Kumbh Kee Apriy Ghatanaon Ka Vishleshan
कुम्भ मेला में हर अखाड़ा अपना महत्व और स्थान रखने की कोशिश करता है, और जब हजारों साधु-संत एक साथ होते हैं, तो कभी-कभी यह प्रतिस्पर्धा हिंसक रूप ले लेती है। प्रत्येक अखाड़ा अपने आपको प्रमुख और प्रभावशाली मानता है, और कुम्भ मेला एक ऐसा अवसर होता है जब विभिन्न अखाड़े अपनी धार्मिक और सामाजिक स्थिति साबित करने की कोशिश करते हैं। कुम्भ मेले में प्रमुख स्थान पर स्नान करने के लिए बहुत प्रतिस्पर्धा होती है। हर अखाड़ा यह चाहता है कि वह सबसे पहले स्नान करने के लिए अपने साधुओं को भेजे, जो धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह संघर्ष पारंपरिक तौर पर अखाड़ों की आंतरिक प्रतिस्पर्धा, सम्मान और पद की चाहत से जुड़ा होता है। कुम्भ मेला अपने धार्मिक महत्व के बावजूद कभी-कभी इन संघर्षों के कारण चर्चा में रहता है, लेकिन इसका उद्देश्य और महत्व समग्र रूप से भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को समर्पित है।….. १८२० का हरिद्वार कुम्भमेला इतिहास में दर्ज वह कुम्भ है, जिसमें ज्ञात स्रोतों के मुताबिक भगदड़ से ४५० से भी ज्यादा तीर्थयात्रियों की मौत हुई और १००० से ज्यादा लोग घायल हुए। इसके बाद १८४० के प्रयाग कुम्भ मेले में ५० से अधिक मौतें हुई। तत्कालीन सरकारी तंत्र में लगातार मची उथल-पुथल और व्यवस्था के मामूली इंतजामों के कारण इसके बाद के प्रत्येक कुम्भ में भी भगदड़ से तीर्थयात्री मरते रहे, जिनका आधिकारिक ब्यौरा तक उपलब्ध नहीं है। यदि २०वीं शताब्दी की बात करें तो १९०६ के प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ से ५० से अधिक मौतें हुईं और १०० से ज्यादा लोग घायल हुए थे। प्रयागराज में होने वाले कुंभ और माघ मेले के इतिहास में देश की आजादी के बाद १९५४ के कुंभ को भी दुर्घटना की वजह से याद किया जाता है। इस मेले में मौनी अमावस्या के दिन त्रिवेणी बांध पर मची भगदड़ में सैकड़ों श्रद्धालुओं को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
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Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)
Kumbh Snaan Se Bimari Phailane Ka Dushprachaar
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Kumbh Snaan Se Bimari Phailane Ka Dushprachaar
किसी खास जगह पर और किसी खास समय पर ही कुंभ लगने के पीछे एक पूरा विज्ञान है। आज आधुनिक विज्ञान ने बहुत से प्रयोग किए हैं जिससे पता चला है कि पानी की अपनी स्मृति यानी याद्दाश्त होती है। भारत में कुंभ मेला, यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त अमूर्त सांस्कृतिक विरासत है, जो पृथ्वी पर सबसे बड़े मानव समागमों में से एक है। चक्रीय रूप से होने वाला यह आध्यात्मिक संगम अपनी धार्मिक जड़ों एवं मान्यताओं से आगे बढ़कर विज्ञान और औषधीय स्वरुप है।
जैसे-जैसे हम इस कालातीत संगम की गहराई में उतरते हैं, तो पाते हैं कि इसकी प्रासंगिकता अनुष्ठानिक सीमाओं से कहीं आगे तक फैली हुई है, जो समकालीन दुनिया के लिए एक गहन चिंतन, मनन, मंथन और शोध आधारित अध्ययन का विषयवस्तु है। इस संगम की खगोलीय प्राचीनता और उसके धार्मिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक महत्व पर एक अद्वितीय वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करना आज समय की आवश्यकता है ताकि इस संगम की पीछे छुपे रहस्यों और खगोलीय वैज्ञानिता के पहलुओं को उजागर किया जा सके। पौराणिक मान्यताओं और यह संगम यह दर्शाता है कि किस प्रकार सौरमंडल के खगोलीय पिंड एक विशेष अवस्था में पहुंचकर जल और जीवन को प्रकृति एवं परमात्मा से जोड़कर सनातन संस्कृति में महा पर्व का रूप धारण कर लेते हैं।SKU: n/a -
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)
Maha Kumbh Samaajik Samarasata Aur Hindu Samagam
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Maha Kumbh Samaajik Samarasata Aur Hindu Samagam
कुम्भ के आयोजन का उद्देश्य सामूहिक चिंतन था। ऋषि, महर्षि, ब्रह्मर्षि एक समय और स्थान विशेष पर बड़ी संख्या में उपस्थित होकर समाज, राष्ट्र और प्रकृति की समस्याओं पर सामूहिक चिंतन करते थे और चिंतन निष्कर्ष रुपी अमृत से समाज, राष्ट्र और प्रकृति लाभान्वित होती थी। इसका उद्देश्य है कि व्यष्टि और समष्टि जीवन को धर्मादर्श के उच्च सिंहासन पर सुदृढ़ रूप में प्रतिष्ठित करना। धर्म की मृत संजीवनी से अनुप्रेरित कर, समाज और राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक स्तर को संचारित करते हुए उसे शाश्वत कल्याण में विमंडित करना था।
कुंभ में जाति-पांति, ऊंच-नीच का भेदभाव भुलाकर सभी एक ही रंग में रंगे दिखाई देते हैं, जो वास्तव में भारतीय संस्कृति का परिचायक है। भारतवासी, राजा-प्रजा, धनी-दरिद्र, भद्र-अभद्र, पंडित-मूर्ख, गृहस्थ-वनवासी आदि सभी अपने धर्म के नाम पर भेदभाव और द्वंद्व भूल जाते हैं। बिना बुलावे के करोड़ों लोग इस उत्सव में सम्मिलित होते हैं।समग्र राष्ट्र की शिराओं में इस आयोजन की ऊर्जा स्पंदित होती है। जबरदस्त ज्वार उफनाता है कि उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम सब मिलकर एक हो जाते हैं, सब एक-दूसरे को प्रेरणा देते हैं, एक दूसरे से प्रेरणा लेते हैं। अपनी आध्यात्मिक तृषा बुझाते हैं, एक नया आत्मविश्वास, आत्मसम्मान के साथ जिंदा रहने की, शक्ति पाते है।
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Mithila ke Adhunik Diggaj (Vol-II)
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Mithila ke Adhunik Diggaj (Vol-II)
‘मिथिला के आधुनिक दिग्गज’ की पहली और दूसरी प्रत्येक श्रृंखला में मिथिला की धरती से पच्चीस ऐसे सफल व्यक्तियों को शामिल किया गया है जिन्होंने अपने जीवन में एक मुकाम हासिल किया है। हालाँकि, मिथिला के प्रति समर्पण और उनके योगदान को मानदंड रखकर ही सफल व्यक्तियों का चित्रण इस पुस्तक में किया गया है। महत्वपूर्ण रूप से, ‘आधुनिक दिग्गजों’ पर इस अग्रणी पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक ने प्रत्येक सफल व्यक्ति के निवास स्थान का दौरा किया है। चित्रित किए गए महापुरुषों के साथ लेखक की तस्वीर भी पुस्तक के अंत में दर्शाई गई है। इसके अलावा, पुस्तक में चित्रित सभी दिग्गजों को व्यापक शोध, असंख्य हितधारकों के साथ गहन परामर्श और प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से पत्रकारों की राय के आधार पर चुना गया है। चित्रित किए जाने वाले संभावित महापुरुषों से संबंधित पत्रकारों की राय जानने के लिए जनकपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की गई थी। इसलिए, चित्रित किए गए दिग्गजों के चयन की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है, क्योंकि लेखक को पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक लगभग एक सहस्राब्दी से भी अधिक समय तक एक मूलयवान विरासत के रूप में मैथिलों का मार्गदर्शन करती रहेगी।
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Pandit Deenadayaal Upaadhyaay Kee Kahasyamay Mrtyu Ka Sach
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Pandit Deenadayaal Upaadhyaay Kee Kahasyamay Mrtyu Ka Sach
१९६७ के कालीकट अधिवेशन में उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। वह मात्र ४३ दिन जनसंघ के अध्यक्ष रहे। १०/११ फरवरी, १९६८ की रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई। टखना टूटा था, सिर पर चोट लगी थी, दाहिने बांह पर खून का निशान था और मुट्ठी में ५ रुपये का नोट। ११ फरवरी को प्रात: पौने चार बजे सहायक स्टेशन मास्टर को खंभा नं० १२७६ के पास कंकड़ पर पड़ी हुई लाश की सूचना मिली। प्रात:काल रेलवे का डाक्टर घटना स्थल पर पहुंचा और जांच-पड़ताल करने के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। रेलवे पुलिस ने शव का फोटो खींचा। शव को कोई पहचान न सका और उसे लावारिस घोषित कर दिया। लगभग छ: घंटे के बाद शव को प्लेटफार्म पर लाकर रखा गया। मुगलसराय नगर के संघ कार्यकर्ता गुरुबक्श सिंह कपाही ने शव की पहचान दीनदयाल उपाध्याय के रूप में की। पल भर में बिजली के करंट की तरह यह समाचार जनता में फैल गया। सभी लोग स्तब्ध रह गये । जनसंघ के अनेकानेक कार्यकर्ता वहां एकत्रित हो गये । लखनऊ और दिल्ली को इस दु:खद घटना की सूचना तुरन्त फोन द्वारा दी गई। पू० गुरुजी को भी फोन से सूचना दी गई। दिल्ली में संसदीय दल की जो बैठक चल रही थी वह तुरन्त स्थगित हो गई। भागदौड़ शुरू हो गई। चारों ओर शोक की लहर फैल गई। लोगों ने कहा कि ऐसे कर्मयोगी और तपस्वी के प्राणों का दुश्मन कौन बन बैठा। यह रहस्य अभी तक बना हुआ है।
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Pandit Deendayal Upadhyay Krtitv Vyaktitv Tatha Viraasat
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Pandit Deendayal Upadhyay Krtitv Vyaktitv Tatha Viraasat
सहृदयता, बुद्धिमता, सक्रियता एवं अध्ययनसायी वृत्ति वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक विचार और जीवन-शैली हैं। भारत और भारतीयता उनके जीवन और चिंतन का आवृत्त है। राष्ट्रसेवा को सर्वोपरि मानने वाले और राष्ट्र एवं समाज के प्रति आजीवन समर्पित रहने वाले पंडित जी ने अपने मौलिक चिंतन से राष्ट्र-जीवन को प्रेरित और प्रभावित किया।
पंडित दीनदयाल जी ने एकात्म मानव दर्शन की एक ऐसी दार्शनिक अवधारणा भारत की राजनीति को देने का काम किया है, जो कि अन्य अवधारणाओं से सर्वथा भिन्न है, और भारत की संस्कृति, भारत की परंपरा एवं भारत की प्रकृति के सर्वथा अनुरूप है।
पंडित दीनदयाल जी का स्पष्ट रूप से यह कहना था कि व्यक्ति के संबंध में, समाज के संबंध में, परिवार के संबंध में, सृष्टि के संबंध में कभी भी एकांगी विचार नहीं होना चाहिए।
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Samajik Samarasata Aur Sant Samaaj
सृष्टि में सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है और उनमें एक ही चैतन्य विद्यमान है। भारतीय संस्कृति में कभी भी किसी के साथ किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं किया गया है। हमारे वेदों में भी जाति या वर्ण के आधार पर किसी भेदभाव का उल्लेख नहीं है। गुलामी के सैकड़ों वर्षो में आक्रमणकारियों द्वारा हमारे धार्मिक ग्रंथों में कुछ मिथ्या बातें जोड़ दी गई, जिससे उनमें कई विकृतियां आ गईं। इसके कारण आज भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। वेदों में जाति के आधार पर नहीं, बल्कि कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था बतायी गयी है। संतों का समाज में समरसता भावजागरण में योगदान अमूल्यऔर अतुलनीय है।……………..
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Sanatan Dharm Evan Parampara Ke Rakshak Akhade
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन, सही आख्यान (True narrative)Sanatan Dharm Evan Parampara Ke Rakshak Akhade
भारत में वैदिक सनातन परंपरा की रक्षा, विकास और धर्म के प्रचार-प्रसार में जगतगुरु आध शंकराचार्य जी का योगदान अद्वितीय है। अद्वैत वेदांत के प्रणेता, सनातन धर्म के प्राणधार, कश्मीर से कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोने वाले, जगदगुरु आदि शैकराचार्य ने ढाई हजार साल पूर्व सनातन धर्म की रक्षा के लिए दशनामी संन्यासी संप्रदाय की नींव डालकर जो परंपराएं स्थापित की थीं उनका दशनामी संन्यासी संप्रदाय आज भी पूरी मजबूती से निर्वहन कर रहा है।
जगद्वरु आदि शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में चार आध्यात्मिक पीठों की स्थापना की थी और दशनामी संन्यास परंपरा को दस संन्यासी नामों में विभक्त किया था और हर एक पीठ के साथ इन संन्यासी दशनामों को संबद्ध किया गया।दशनामी संप्रदाय से जुड़े साधु संत शास्त्र और शस्त्र परंपरा पारंगत होते हैं। दशनामी संन्यासी अदम्य साहस और कुशल प्रतिभाशाली नेतृत्व के धनी होते हैं। इस सम्प्रदाय के साघु भगवा वस्त्र धारण करते हैं और गले में रुद्राक्ष की माला पहनते हैं और अपने माथे पर चंदन का त्रिपुंड लगाते हैं और शरीर में राख मलते हैं। बहुत से नागा संन्यासी श्मशान साधना के लिए कपाल धारण करने के साथ-साथ श्मशान की राख से भी अपने शरीर का सम्मान करते हैं।
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English Books, Luminous Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Srutipada Sarita
The treatise is a well-assorted collection of Dhrupad-Dhamar songs. These are musical notation of traditional Song-texts from the Dagar Oral Tradition and Self-composed ones by the Author with varied themes and also trying to highlight the peculiarities and finesses of the Dagar Bani. Spanning the profound and ancient musical tradition of India, Pandit Ritwik Sanyal has devoted his entire life to Dhrupad. He is acclaimed as a singer whose performances transcend perception of time and space, seeking union with the intangible essence of divinity. He generously shares his music since five decades, through his performances and seminars all over India and the World.
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English Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
The Living Legends of Mithila (Vol-II)
English Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)The Living Legends of Mithila (Vol-II)
In each of the first and second series of Modern Legends of Mithila, twenty-five accomplished individuals from the land of Mithila have been included—those who have achieved significant milestones in their lives. However, their dedication to Mithila and their contributions to the region have been the primary criteria for their inclusion in this book.
Importantly, the most distinctive feature of this pioneering work on Modern Legends is that the author personally visited the residences of each of these accomplished individuals. Photographs of the author with the portrayed legends are also featured at the end of the book.
Furthermore, the selection of all the legends depicted in the book is based on extensive research, in-depth consultations with numerous stakeholders, and the opinions of journalists gathered through a press conference. To gauge journalists’ views on potential legends to be featured, a press conference was also organized in Janakpur.
Therefore, the selection process of the featured legends is entirely transparent, as the author firmly believes that this book will continue to serve as a valuable legacy and a guiding light for the people of Mithila for over a millennium.
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