सही आख्यान (True narrative)
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Hindi Books, Hindu Rights Forum, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Yahudi Eesaiyat Va Islaam
प्रत्येक मनुष्य में भगवान होने की सम्भावना मौजूद होती है, पर उसकी सम्भावना को सुअवसर नहीं मिल पाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि प्रभुत्वशाली लोगों में प्रभुत्त की चाह अपने आस-पास के लोगों के दिव्योत्थान में बाधा पहुँचाती है। वास्तव में प्रभुत्वशाली व्यक्ति स्वयं को ही भगवान की तरह पूज्य बनाना……….
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Yuddha Aur Shanti Mein Mera Jeevan
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Yuddha Aur Shanti Mein Mera Jeevan
“जिन यहूदियों ने भारत को अपना ठिकाना बनाया था, वे यहाँ किसी प्रतिकूल भेदभाव के बिना खूब फले-फूले । इनमे से बगदादी गडरिआ समुदाय की संख्या बहुत कम थी, लेकिन उसने भारत के महानतम समकालीन सिपाहियों में से एक लेफ्टिनेंट जनरल जैकब को पैदा किया | यह पुस्तक उन्हीं की रोमांचकारी कथा है ।
जैकब का जन्म एक यहूदी कारोबारी परिवार में हुआ था। जब द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो 1941 में जैकब अपने परिवार को सूचना दिए बिना नाजियों से लड़ने के लिए सेना में भरती हो गए। उन्हें भारतीय तोपखाने में कमीशन दिया गया था और उन्होंने मध्य-पूर्व, बर्मा एवं सुमात्रा में अनेक कारवाइयों में भाग लिया था।
जैकब अत्यंत कुशाग्र बुद्धि थे। उन्होंने इन्फैंट्री एवं आर्टिलरी ब्रिगेडों की कमान सँभाली थी। वे तोपखाना विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे और अंत में पूर्वी सेना के कमांडर-इन-चीफ भी रहे। यह एक ऐसे युवा यहूदी अधिकारी की दिलचस्प कहानी है, जिसने कोई समझौता किए बिना अपने सिद्धांतों एवं मान्यताओं के आधार पर चुनौतियों को स्वीकार किया। उन्होंने कुछ ऐसे बहादुर एवं विश्वसनीय लोगों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया, जो उस समय भारतीय राजनीतिक एवं सैन्य अखाड़े के पहलवान माने जाते थे। उन्होंने ढाका के पतन की सफल रणनीति काररवाइयों का पर्यवेक्षण स्वयं किया और शत्रु को बिना शर्त सार्वजनिक आत्मसमर्पण करने के लिए विवश कर दिया, जो जनरल नियाजी एवं उनके 93,000 सैनिकों द्वारा किया गया इतिहास का एकमात्र बिना शर्त सार्वजनिक आत्मसमर्पण था।
अत्यंत सुबोधगम्य शैली में लिखी इस आत्मकथा में एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में जीवन सजीव हो उठा है। यह मात्र एक महान् सैनिक की जीवनगाथा ही नहीं है, अपितु इसमें कुछ उन अत्यंत प्रभावशाली एवं देदीप्यमान व्यक्तित्वों की झलकियाँ भी हैं, जिन्होंने उन अशांत युगों का इतिहास लिखा था।”
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Zindagi Ka Ganit
“वैशवीकरण एवं बाजारवाद ने हमारी आस्था को सिरे से समाप्त करने का काम किया है । बस हमारे भीतर छोड़ा है तो वस्तुवाद का जहर, जिसके कारण हम मनुष्य से मशीनों में परिवर्तित होते जा रहे हैं । जीवंतता का आभास धीरे-धीरे लुप्त होता चला जा रहा है, जो कि एक अत्यधिक विचारणीय प्रश्न है।
हमें विकास की धारा से अछूता नहीं रहना चाहिए, परंतु विकास की कीमत हम अपने यथार्थ, अपने अस्तित्व के मूल्य से नहीं चुका सकते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘जीवन का गणित ‘ में इस विकासवादी समाज में बढ़ती जा रही विसंगतियों और धीरे-धीरे हमारी संस्कृति पर गहराते संकट को दिखलाने का प्रयास किया गया है ।
पाठकों के मन में प्रशन आएगा कि इस पुस्तक का नाम ‘ जीवन का गणित ‘ क्यों रखा है ? वैसे तो इस पुस्तक का एक लेख ‘ जीवन के गणित ‘ नाम से प्रकाशित हुआ है, परंतु इस पुस्तक में लेखिका ने अपने जीवन की गुल्लक में से छोटे-बड़े लम्हे समेटे हैं, जो कि वास्तविकता में उनके ही नहीं, इस पुस्तक को पढ़ने वाले हर पाठक को अपने जीवन की घटनाओं से जोड़ेंगे।”
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Surya Bharti Prakashan, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण, सही आख्यान (True narrative)
गाँधी वध और मैं | Gandhi Vadh Aur Main
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Surya Bharti Prakashan, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण, सही आख्यान (True narrative)गाँधी वध और मैं | Gandhi Vadh Aur Main
नाथूराम गोडसे
साहित्य दृष्टी से ‘गांधी-वध और मैं’ जीवनी,आत्मकथा तथा संस्मरण विधाओं का संगम हैं। गांधी वध करनेवाले वधक श्रद्धेय नाथूराम गोडसे का जीवन चरित है।लेखक की अपनी आत्म-कथा है।गांधी-वध से संबंधित तथा जेल-जीवन के संस्मरन हैं।इतिहास की दृष्टि से यह पुस्तक कांग्रेस,गांधी और भारत-विभाजन का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करती हैं इतिहास की सच्चाई को प्रकट करती हैं।भारत में प्रचारित झूठे तथा मनगढंत तथ्यों को उजागर करती हैं।
“गांधी-वध और मैं” राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के भाई और इस षड्यंत्र में शामिल तथा उसके लिए कारावास भोगने वाले गोपाल गोडसे की कलम से उनका पक्ष प्रस्तुत करने वाली पुस्तक है। यह नाथूराम गोडसे की जीवनी भी है, गोपाल गोडसे की आत्मकथा भी है और साथ ही उनके संस्मरण भी। गांधीजी की हत्या से जुड़ी तमाम रोमांचक बातें इस पुस्तक में दी गई हैं, जिन्हें पढ़कर गांधीजी से घृणा भी की जा सकती है और इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि…प्रार्थना के लिए जाते समय गोडसे की तीन गोलियों ने गांधीजी को नहीं रोका…बल्कि गांधीजी ने ही उन तीन गोलियों को रोका, ताकि वे और न फैलें, किसी और पर न पड़ें और घृणा का उसी क्षण अंत हो जाए!
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