वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
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Yajurveda
यजुर्वेद का मुख्य विषय मानवोचित कर्म को बताना है तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि इस वेद में कर्म के अत्यरिक्त कोई अन्य विषय व्याख्यात नहीं हुआ है। यजुर्वेद में इनसे पृथक् ईश्वर, जीव, प्रकृति, सृष्टि-रचना, जीवन-मृत्यु आदि दार्शनिक विषयों पर गहन चिंतन प्राप्त होता है। दार्शनिक तत्व के साथ-साथ समाज शास्त्र जिसमें मनुष्यों के सर्वहितकारी नियम, वर्ण और आश्रम व्यवस्था, नारी सम्मान आदि का मूल, बीज रुप में उल्लेखित है। राष्ट्र भावना का और राष्ट्र में मनुष्यों के योगदान पर यजुर्वेद प्रकाश डालता है और राष्ट्र को सबल बनाने का उपाय बताता है। यजुर्वेद पर्यावरण के महत्व और उसकी सुरक्षा पर भी उपदेश करता है। यजुर्वेद का मन्त्र “द्यौः शान्तिः.-यजु.36-17” अनेक स्थानों पर दृष्टिगोचर होता है जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड सभी के लिए शान्तिदायक हो ऐसी प्रार्थना की गयी है। यहां शान्तिदायक ब्रह्माण्ड तभी होगा जब इनका संतुलन बना रहे और ये प्रदूषणादि दोषों से पृथक रहें। इस प्रकार यजुर्वेद पर्यावरण के महत्व पर उपदेश करता है। इस वेद में अनेक विषयों का उपदेश है, जैसे औषधिशास्त्र का “सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु”- ऋ.6.22 आदि। गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त पर, जैसे – आकृष्णेन रजसा वर्तमानो..-ऋ.33.43 आदि।
कृषि विद्या पर भी कृषन्तु भूमिं शुनं – यजु.12.69 आदि अनेक मन्त्र हैं। पशुपालन और गौरक्षा का “यजमानस्य पशुन् पाहि”-यजु.1.1 आदि मन्त्रों द्वारा उपदेश हैं। गणित विद्या पर “एका च मे तिस्त्रश्च मे तिस्त्रश्च.”- यजु.18.24 आदि मन्त्रों द्वारा उपदेश है। यजुर्वेद के 18वें अध्याय में अनेक खनिजों के नामों को बताया गया है।
प्रस्तुत भाष्य महर्षि दयानन्द सरस्वती रचित है। इस भाष्य में ऊपर वर्णित सभी विषयों के अतिरिक्त अन्य विषयों का भी समावेश है। यह भाष्य नैरुक्त प्रक्रिया से सम्पन्न विज्ञान और दर्शनों की कसौटियों पर खरा उतरता है। जहां अन्य भाष्य केवलमात्र कर्मकांड युक्त है, वहीं ये भाष्य लौकिक, अलौकिक आदि ज्ञान-विज्ञान से युक्त है। इस भाष्य में व्यवहारिक ज्ञान की प्रचुरता है। भाष्यकार ने भाष्य में अर्थ प्रमाण की दृष्टि से निरूक्त, अष्टाध्यायी, तैत्तरीय संहिता, शतपथ ब्राह्मण का प्रमाण दिया है, जिससे भाष्य की शैली की प्रमाणिकता सिद्ध होती है। सभी मन्त्रों का उत्तम और जीवन में उपयोगी विषयों के अनुरूप यह भाष्य है। इस भाष्य के अध्ययन करने पर आप स्वयं कह उठेंगे कि “सर्वज्ञानमयो हि सः।
भाष्यकार : महर्षि दयानन्द सरस्वती
सम्पूर्ण यजुर्वेद भाष्य प्रथम बार कंप्यूटर द्वारा मुद्रित, शुद्धतम् सामग्री, नयनाभिराम डिजिटल छपाई, आकर्षक आवरण, उत्तम कागज, सुंदर टाइप, शब्दार्थ व मन्त्रानुक्रमणिका सहित एक खण्ड में प्रस्तुत |
यजुर्वेद का विषय केवल कर्मकाण्ड ही नहीं है, बल्कि इसमें वर्णित है अध्यात्म एवं दर्शन ,सृष्टि-रचना तथा मोक्ष, नैतिक तथा आचारमूलक शिक्षाएं , मनोविज्ञान बुद्धिवाद, समाज दर्शन , राष्ट्र भावना, पर्यावरण का संरक्षण। काव्य तत्व के अतिरिक्त यजुर्वेद में विद्यमान है, विश्व मानव की एकता जैसे उपयोगी विषय ।
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Yajurveda (Set of 2 Volumes)
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यजुर्वेद-भूमिका
१. यजुर्वेद का वेदों में स्थान और महत्त्व
वेद चार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद में मुख्य रूप से देवताओं की स्तुतियाँ हैं। भारतीय परम्परा में इसे ज्ञानकाण्ड कहा गया है। यजुर्वेद में यज्ञों के अनुष्ठान के लिये मन्त्र हैं। इसे कर्मकाण्ड कहा गया है। सामवेद देवताओं के स्तुतिगान के लिये मन्त्रों का संग्रह है। इसे उपासनाकाण्ड के नाम से पुकारा गया है। अथर्ववेद में विषयों की विविधता है। इसमें ज्ञान, कर्म और उपासना तीनों ही प्रकार के मन्त्र उपलब्ध हैं।
-वैसे तो सभी वेदों में यज्ञ के महत्त्व को स्वीकार किया गया है और सबमें ही यज्ञसम्बन्धी मन्त्र उपलब्ध हैं, परन्तु यजुर्वेद विशेष रूप से यज्ञों से सम्बन्धित वेद है। इसमें विविध प्रकार के यज्ञों के अनुष्ठानों में विनियुक्त होने वाले मन्त्रों का संग्रह है। इस प्रकार यजुर्वेद अन्य वेदों से नितान्त भिन्न प्रकृति वाला वेद है। यजुर्वेद यज्ञप्रधान है। यास्काचार्य ने यजुर्वेद का निर्वचन करते हुए कहा है यजुर् यजतेः। अर्थात् यजुः शब्द की निष्पत्ति यज धातु से हुई है और इस प्रकार यजु मन्त्रों का यजनक्रिया से विशेष सम्बन्ध है। एक अन्य परिभाषा के अनुसार अनियताक्षरावसानो यजुः कहा गया है। अर्थात् यजुः वह है जिसमें अक्षरों की संख्या निश्चित नहीं है। जहाँ ऋक् अथवा ऋचा में गायत्री, अनुष्टुप् आदि छन्दों की संख्या निश्चित होती है, वहाँ यजुः में अक्षरों की संख्या निश्चित नहीं होती। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऋक् या ऋचा पद्म है और यजुः गद्या है। कहा भी गया है गद्यात्मको यजुः। –
२. बबुर्वेद की शाखाएँ
बनुर्वेद मुख्य रूप से दो प्रकार का है कृष्णयजुर्वेद और शुक्लयजुर्वेद। कृष्णयजुर्वेद वह है, किसमें ब्राह्मण अंश भी मिला हुआ है। ब्राह्मण अंश के मिश्रण के कारण उसे शुक्ल अर्थात् शुद्ध, पवित्र नहीं माना गया और उसे कृष्णयजुर्वेद की संज्ञा दी गई। इसके विपरीत वह यजुर्वेद जिसमें ब्राह्मण अंश जुड़ा हुआ नहीं है, उसे शुक्ल अर्थात् शुद्ध, पवित्र, मिश्रणमुक्त यजुर्वेद कहा गया है। यजुर्वेद के इस दो प्रकार के विभाजन के विषय में महीधर ने अपने भाष्य के आरम्भ में एक बहुत रोचक कथा का वर्णन किया है व्यास ने मनुष्यों की बौद्धिक क्षमता के निरन्तर ह्रास को दृष्टि में रखते हुए वेद का ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व इन चार भागों में विभाजन किया और इन्हें क्रमशः अपने चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु को पढ़ाया। इन शिष्यों ने इन्हें अपने शिष्यों को पढ़ा दिया। एक बार वैशम्पायन अपने शिष्य याज्ञवल्क्य पर किसी कारण से क्रुद्ध हो गए और उसने जो कुछ पढ़ा था उसे वापस देने को कहा। याज्ञवल्क्य ने अपनी योगशक्ति के द्वारा पठित यजुर्वेद को वमन कर दिया। गुरु की आज्ञा से अन्य शिष्यों ने तीतर पक्षी का रूप धारणSKU: n/a -
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चारों वेद भाष्य (8 भागों में) – A Complete Set of All Four Vedas in Sanskrit-Hindi
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Govindram Hasanand Prakashan, Hindi Books, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृतिचारों वेद भाष्य (8 भागों में) – A Complete Set of All Four Vedas in Sanskrit-Hindi
सभी वेदों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। वेद संतप्त मानवों को अपूर्व शांति प्रदान करते हैं। आधि-व्याधि और वासनाओं से विक्षुब्ध मानव-हृदय वेद-मंत्रों का उच्चारण करते हुए आनंदसागर में निमग्न हो जाता है।
वेद क्या हैं-वैदिक संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है और संपूर्ण विश्व के द्वारा वरणीय है। वेद ज्ञान-विज्ञान के अक्षय कोष हैं। वेद संपूर्ण वैदिक वाङ्मय का प्राण हैं। वेदों में तेज, ओज, और वर्चस्व की राशि है। वेदों में दिग्दिगंत को पावन करने वाले दिव्य उपदेश हैं, मानवता को झकझोरनेवाले अनुपम आदेश और संदेश हैं। वेद में आधिभौतिक उन्नति की चरम सीमा है, आधिदैविक अभ्युदय की पराकाष्ठा है और आध्यात्मिक आरोहण का सवोत्तम रूप है।
हम वेद क्यों पढ़ें-वेद उत्तम मनुष्य बनने और उत्तम संतान पैदा करने का आदेश देते हैं। ऋग्वेद में कहा है-‘मनुर्भव जनया दैव्यं जनम‘। वेद के स्वाध्याय से मनुष्य के मन और मस्तिष्क में यह बात भली-भाँति बैठ जाती है कि यह संसार परमात्मा द्वारा रचा गया है, जो अद्वितीय है। उससे बड़ा तो क्या उसके बराबर भी कोई नहीं है। वह परमात्मा न्यायकारी है। मनुष्य जैसे कर्म करता है, वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है-यह विचार मनुष्य को पुण्यात्मा, सदाचारी, दयालु, परोपकारी, न्यायकारी, पर-दुःखकातर, निर्भय और मानवता के गुणों से सुभूषित बना देता है।
वेद हमें जीवन जीने की कला सिखाता है। हमारा अपने प्रति क्या कर्तव्य है, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है, परमात्मा के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है-इस सबका ज्ञान हमें वेद से ही प्राप्त होगा। वर्णाश्रम धर्मों का प्रतिपादन भी वेद में सुंदररूप में प्रस्तुत किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन सभी वर्गों के तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-इन सभी आश्रमवासियों के कर्तव्यकर्मों का सदुपदेश वेद में विद्यमान है, जिन पर आचरण करने से मनुष्य का जीवन उदात्त भावनाओं से पूर्ण, नियमित, संयमित और संतुलित बन जाता है। मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनाने के लिए वेद का अध्ययन अनिवार्य है। मनुष्य और कुछ पढ़े या न पढ़े, वेद तो उसे पढ़ना ही चाहिए।
महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना आर्यों का परमधर्म बतलाया है। हम उनके इसी आदेश का पालन करते हुए वेदों का प्रकाशन किया गया है ताकि वेदों का प्रचार और प्रसार होता रहे।
यह संस्करण कम्प्यूटर द्वारा मुद्रित, शुद्धतम् सामग्री, नयनाभिराम छपाई, आकर्षक आवरण, उत्तम कागज, मजबूत जिल्द, सुन्दर स्पष्ट टाईप, कुल 10400 पृष्ठों में, शब्दार्थ व मन्त्रानुक्रमणिका सहित आठ खण्डों में उपलब्ध है। ऋग्वेद-महर्षि दयानन्द तथा अन्य वैदिक विद्वानों द्वारा, यजुर्वेद-महर्षि दयानन्द, सामवेद-पं. रामनाथ वेदालंकार तथा अथर्ववेद-पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी का भाष्य है।SKU: n/a




