वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Bhagavan Parshuram Puran
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Bhagavan Parshuram Puran
भारतीय दर्शन-परम्परा में ब्रह्म और जीव का सम्बन्ध नित्य माना गया है। एक आस्था के अनुसार, जीव ब्रह्म का ही सूक्ष्म रूप है, उसी ब्रह्म से उसका जन्म होता है और मृत्यु के पश्चात् उसी ब्रह्म में विलीन होकर उसकी मुक्ति होती है। दूसरी आस्था के अनुसार, वह करुणामयी जब अपने ही प्रतिरूप जीव को मायावी जगत में किसी विपत्ति में देखता है तो उसे त्राण दिलाने के लिए वह स्वयं अवतारी रूप में प्रकट होता है और अपने भक्तों का उद्धार करता है। अब जगत, क्योंकि मूलतः माया के प्रसार का आधार है और जीव अपनी अबोधता, अज्ञानता व चंचलता के कारण बार-बार उसमें डूब जाता है, इसलिए हर-बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है कि ईश्वर को इस धरती पर आना पड़ता है। इसीलिए भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में अवतारवाद की संकल्पना की गई। ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से क्योंकि विष्णु ही इस जगत के पालक देव है, इसीलिए उन्हें ही अपने कर्त्तव्य निर्वाह के लिए हर बार अवतार लेना पड़ता है। मूलतः इन अवतारों की संख्या दस मानी गई थी, किन्तु बाद में विष्णु के 24 अवतारों को मान्यता दे दी गई। इसके अनेक कारण रहे।
विष्णु के दस अथवा चौबीस अवतारों में मात्र एक अवतार परशुराम का ऐसा है जिसे चिरंजीवी होने का भी वरदान प्राप्त है, अन्यथा शेष सभी अवतार इस पृथ्वी पर अपना कार्य सम्पन्न करने के पश्चात् वापिस देव लोक को लौट गये। इस दृष्टि से परशुराम जी का अस्तित्व शेष सभी अवतारों से कहीं अधिक गुरू है। विभिन्न युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि युग) की भारतीय पौराणिक धारणा में यद्यपि यह पहले से ही अन्तर्च्यूत है कि धर्म इन युगों में क्रमशः क्षीण होता जा रहा है, तथापि प्रत्येक युग में विष्णु के इस अवतार पर यह दायित्व बना रहा कि उसने इस पृथ्वी पर से अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार के रूप में अधर्म और अमर्यादा का मर्दन करना है। इसीलिए परशुराम पर आज जितना भी साहित्य उपलब्ध है, उसमें भिन्नता है-उनके जन्म को लेकर, उनके जन्म स्थान को लेकर, उनके कर्म-स्थान को लेकर। परन्तु इन भिन्न आस्थाओं का एक सकारात्मक रूप भी है कि सम्पूर्ण भारतीय चित्त ने इस अवतारी पुरुष के प्रति अपनी आस्था का प्रमाण देते हुए इसे अपने क्षेत्र-विशेष से किसी न किसी रूप में जोड़ने में गर्व अनुभव किया। यदि सुदूर पूर्वोत्तर प्रदेश अरुणाचल में ‘परशु कुण्ड’ की उपस्थिति को यह कहकर मान्यता दी गई कि यहीं परशुराम ने अपने रक्त रंजित परशु को ‘ब्रह्मपुत्र’ में शुद्ध किया था और तभी से उनके परशु पर लगे लहु से लाल होने पर उसका एक नाम ‘लोहित’ भी पड़ा, तो दूसरी ओर, सुदूर दक्षिण-पश्चिम की लोक आस्था परशुराम को केरल की स्थापना का आधार मानती है। इसी प्रकार उत्तर भारत में रेणुका झील, मध्य भारत में नर्मदा तट पर जमदग्नि आश्रम आदि ऐसे अनेक प्रसंग है जो सम्पूर्ण भारतीय आत्मा की परशुराम के प्रति श्रद्धा का प्रमाण देते हैं। ऐसे विराट अवतारी पुरुष पर उपलब्ध अनन्त लोक-कथाओं, आस्थाओं और साहित्य का अवगाहन तब तक असम्भव था जब तक कोई व्यक्ति पूर्ण आस्था, श्रद्धा व समर्पण के साथ भगवान् परशुराम के चरित में आकण्ठ डूबकर उसका मन्थन न करता। इस समर्पण की एक और महत्वपूर्ण शर्त यह भी थी कि कहीं कोई शंका या द्वन्द्व इस मार्ग में अवरोध उत्पन्न नहीं करेगा क्योंकि अनेक स्थलों पर अनेक प्रसंगों, घटनाओं, व्याख्याओं में लोक ने अपनी श्रद्धा के अतिरेक में बहुत कुछ ऐसा भी जोड़ दिया है कि सामान्य व्यक्ति उसे स्वीकार करने को कदाचित् तैयार न होता।
किन्तु मुझे अत्यन्त प्रसन्नता व संतोष है कि डॉ. विक्रम शर्मा जी ने अपनी अगाध आस्था व श्रद्धा का परिचय देते हुए उन्हें बहुत ही परिश्रम से ऐसा क्रमबद्ध कर दिया है कि यह ग्रन्थ सामान्य ग्रन्थ भक्ति एवं शक्ति के प्रतीक भगवान् परशुराम न रह कर’ भगवान् परशुराम पुराण’ में परिवर्तित हो गया है। उन्होंने न जाने कहाँ-कहाँ से परशुराम जी के जीवन से जुड़े प्रसंगों को खोज – खोज कर पूरा एक सन्दर्भ कोश बना दिया है। मुझे लगता है कि शायद ही कोई ऐसा स्रोत बचा होगा जिस पर डॉ. शर्मा की दृष्टि न पड़ी हो। फिर उन स्रोतों से एकत्रित किये गये तथ्यों को क्रम देना-यह उससे बड़ा भागीरथ कार्य था जो इन्होंने सहज ही सम्पन्न किया। मैं समझता हूँ कि यह साक्षात भगवान् परशुराम जी की कृपा रही कि उन्होंने जैसे अपनी ही उपस्थिति में यह वृहत् कार्य सम्पन्न करवाया। लेखक ने भगवान् परशुराम चरित को इस प्रकार सूत्रबद्ध किया है कि वह रोचकता के साथ-साथ पाठकों की अनेक जिज्ञासाओं का भी शमन करेगा। इतनी ही नहीं, यह ग्रन्थ मेरे विभाग में स्थापित ‘भगवान् परशुराम पीठ’ को भी परोक्षतः अनेक प्रकार से दिशा-निर्देश देने में सहयोगी बनेगा-ऐसी मेरी धारणा है। उसी विश्वास के साथ डॉ. विक्रम शर्मा जी के लिए बहुत-बहुत शुभ कामनाएं।SKU: n/a -
Gita Press, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Bhagvannam Mahima Aur Prarthna Ank(Code1135)
यह विशेषांक भगवन्नाम-महिमा एवं प्रार्थना के अमोघ प्रभाव का सुन्दर विश्लेषक है। इसमें विभिन्न सन्त-महात्माओं, विद्वान् विचारकों के भगवन्नाम-महिमा एवं प्रार्थना के चमत्कारों के सन्दर्भ में शास्त्रीय लेखों का सुन्दर संग्रह है। इसके अतिरिक्त इसमें कुछ भक्त-सन्तों के नाम-जप से होनेवाले सुन्दर अनुभवों का भी संकलन किया गया है।
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Gita Press, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Bhagvat Navneet(Code2009)
श्रीमदभागवत एक जीवन-दर्शन है। यह मानव जीवन का एक अनुपम, उत्कृष्ट एवं आदर्श मार्गदर्शक है। इसमें जीवन के प्रश्नों के उत्तर हैं, जीवन एवं जगत की समस्याओं के समाधान हैं और सफल, सार्थक, समृद्ध एवं शान्तिपूर्ण जीवन जीने के व्यावहारिक सूत्र हैं। इस पुस्तक में श्रीमदभागवत पर सन्त श्रीरामचन्द्र केशव डोंगरे जी महाराज का सरस प्रवचन दिया गया है।
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Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Bharatiya Kala : Lok Parampra evm Sangeet me Ganga ka Pravah
Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Bharatiya Kala : Lok Parampra evm Sangeet me Ganga ka Pravah
भारतीय जन मानस के लिए गंगा भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक है। अपने स्वरूप एवं प्रवाह में निरंतर बदलाव लाने पर भी अपने मूल रुप में तो वही गंगा ने युगों-युगों तक एक समूची सभ्यता को न केवल सिंचित किया है, बल्कि उसका भरण-पोषण भी किया है। गंगा शाश्वता का प्रतीक है तथा कला, पौराणिक कथाएँ एवं साहित्य सभी उसका गुणगान करते हैं। आज भी हिंदुओं के सभी धार्मिक कार्य और संस्कारों में अनिवार्य तत्व के रूप में गंगाजल की प्रधानता है। भारतीय कला में गंगा नदी को देवी के रूप में अनेक प्रतीकों के साथ अपने संरक्षक की भूमिका में प्रेषित की गई है। मकर कुंभ तथा अनेक अलंकारों से सुसज्जित किया गया है। यह सभी विशेषताएं गंगा के अर्थ को विस्तार देती है । धर्म के अनेक पक्षों, मिथकों तथा कलाओं में शताब्दियों से स्वरूपों तथा कथ्यो के द्वारा उन्हें प्रदर्शित किया जाता रहा है। प्रस्तुत पुस्तक धर्माचार्यों, जिज्ञासुओं, शोधकर्ताओं, आचार्यों, राजनेताओं इतिहासकारों एवं आमजन के लिए नितांत उपयोगी साबित होगा।
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Hindi Books, Luminous Books, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Bhishm Krit Ganga Stuti
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भीष्म राजा शान्तनु के पुत्र थे। भागीरथी गंगाजी से उनका जन्म हुआ था। वे द्यो नामक नवम वसु के अवतार माने जाते हैं। उनका पूर्व नाम देवव्रत था। उन्होंने अपने पिता की इच्छा पूर्ण करने के लिए आजीवन अविवाहित रहने की दृढ़ प्रतिज्ञा ली थी जिससे उनका नाम भीष्म पड़ा। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा गंगा की स्तुति और महात्म का वर्णन है। भीष्म कहते हैं वे ही देश, जनपद, आश्रम और पर्वत पुण्य की दृष्टि से पवित्र हैं, जिनके बीच से होकर सरिताओं में उत्तम भारतीय धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है। बहुत से पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता हैं।
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Gita Press, Hindi Books, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Brahmavaivart Puran, Kewal Hindi
इस पुराण में चार खण्ड हैं। ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, श्रीकृष्णजन्मखण्ड और गणेशखण्ड। इसमें भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन, श्रीराधा की गोलोक-लीला तथा अवतार-लीला का सुन्दर विवेचन, विभिन्न देवताओं की महिमा एवं एकरूपता और उनकी साधना-उपासना का सुन्दर निरूपण किया गया है। अनेक भक्तिपरक आख्यानों एवं स्तोत्रों का भी इसमें अद्भुत संग्रह है। यह पुस्तक रंगीन चित्रों के साथ मोटे टाइप में प्रकाशित की गयी है।
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Gita Press, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति
Brihadaranyak-Upanishad
यह उपनिषद् यजुर्वेद की काण्वीशाखा में वाजसनेय ब्राह्मण के अन्तर्गत है। कलेवर की दृष्टि से यह समस्त उपनिषदों की अपेक्षा बृहत् है तथा अरण्य (वन) में अध्ययन किये जाने के कारण इसे आरण्यक भी कहते हैं। वार्त्तिककार सुरेश्वराचार्य ने अर्थतः भी इस की बृहत्ता स्वीकार की है। विभिन्न प्रसंगों में वर्णित तत्त्वज्ञान के इस बहुमूल्य ग्रन्थरत्न पर भगवान् शंकराचार्य का सबसे विशद भाष्य है।
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Chitramay Shiv Puran 2318
इस पुराण में परात्पर ब्रह्म शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। इसमें इन्हें पंचदेवों में प्रधान अनादि सिद्ध परमेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। शिव-महिमा, लीला-कथाओं के अतिरिक्त इसमें पूजा-पद्धति, अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद कथाओं का सुन्दर संयोजन है। यह पुस्तक मोटे टाइप में रंगीन चित्रों के साथ प्रकाशित की गयी है। { इस पुस्तक में 1088 पृष्ठ हैं जिनमें पढ़ने के लिए कथाएँ हैं। यह हार्ड बाउंड और एक खंड में है।. }
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