Bhagawan Parshuram
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, धार्मिक पात्र एवं उपन्यास
ADBHUT SANNYASI
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, धार्मिक पात्र एवं उपन्यासADBHUT SANNYASI
यह गाथा है एक निस्पृह योगी की, चिरंजीवी तपस्वी की, कठिनतम कर्तव्यरत निर्विकार पुरुषार्थी की, अपराजेय योद्धा की।
वे आवेशावतार नहीं थे, न ही अंशावतार। क्रोधावतार कहकर उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता।
आज तक पृथ्वी पर उनके शौर्य की झलक है, वह उनकी साक्षात् उपस्थिति में कितनी प्रभावी रही होगी। वे उस भृगुकुल के भूषण थे, जिसकी महिमा का विस्तार पवित्र नदियों और समुद्रों, पर्वतों और गहन वनों में विद्यमान असंख्य आश्रमों में ही नहीं संपूर्ण त्रैलोक्य में था, भगवान् विष्णु के वक्षस्थल से लेकर हिमगिरि में भृगु शिखर तक। मदांध सत्ता की कुटिलता के विरुद्ध जनप्रतिरोध का प्रबलतम स्वर हैं परशुराम। आजकल के कथित लोकतंत्रों के जन्म के युगों पूर्व वे तंत्र पर लोक के प्रभावी नियंत्रण के अधिष्ठाता हैं। यदि भारतीय चेतना यूरोपीय प्रभुत्व की बंधक न हुई होती तो स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के लिए मानवीय संघर्ष की गाथा परशुराम से प्रारंभ हुई होती; कथित फ्रांसीसी क्रांति से नहीं।
वे कोरे योद्धा नहीं थे। उन्होंने साधारण मनुष्यों को शास्त्र और शस्त्र दोनों सौंपकर वह सामर्थ्य दिया कि वे स्वयं अभ्युदय और निःश्रेयस पा सकें।
उनकी अद्भुत जीवनगाथा हमारे युग को भी स्वमंगल से सर्वमंगल और अराज से स्वराज हेतु प्रेरित कर सके, यही इस कृति का पावन प्रयोजन है।SKU: n/a -
Hindi Books, Kalpana Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Bhagavan Parshuram Puran
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Hindi Books, Kalpana Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, इतिहास, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Bhagavan Parshuram Puran
भारतीय दर्शन-परम्परा में ब्रह्म और जीव का सम्बन्ध नित्य माना गया है। एक आस्था के अनुसार, जीव ब्रह्म का ही सूक्ष्म रूप है, उसी ब्रह्म से उसका जन्म होता है और मृत्यु के पश्चात् उसी ब्रह्म में विलीन होकर उसकी मुक्ति होती है। दूसरी आस्था के अनुसार, वह करुणामयी जब अपने ही प्रतिरूप जीव को मायावी जगत में किसी विपत्ति में देखता है तो उसे त्राण दिलाने के लिए वह स्वयं अवतारी रूप में प्रकट होता है और अपने भक्तों का उद्धार करता है। अब जगत, क्योंकि मूलतः माया के प्रसार का आधार है और जीव अपनी अबोधता, अज्ञानता व चंचलता के कारण बार-बार उसमें डूब जाता है, इसलिए हर-बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है कि ईश्वर को इस धरती पर आना पड़ता है। इसीलिए भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में अवतारवाद की संकल्पना की गई। ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से क्योंकि विष्णु ही इस जगत के पालक देव है, इसीलिए उन्हें ही अपने कर्त्तव्य निर्वाह के लिए हर बार अवतार लेना पड़ता है। मूलतः इन अवतारों की संख्या दस मानी गई थी, किन्तु बाद में विष्णु के 24 अवतारों को मान्यता दे दी गई। इसके अनेक कारण रहे।
विष्णु के दस अथवा चौबीस अवतारों में मात्र एक अवतार परशुराम का ऐसा है जिसे चिरंजीवी होने का भी वरदान प्राप्त है, अन्यथा शेष सभी अवतार इस पृथ्वी पर अपना कार्य सम्पन्न करने के पश्चात् वापिस देव लोक को लौट गये। इस दृष्टि से परशुराम जी का अस्तित्व शेष सभी अवतारों से कहीं अधिक गुरू है। विभिन्न युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि युग) की भारतीय पौराणिक धारणा में यद्यपि यह पहले से ही अन्तर्च्यूत है कि धर्म इन युगों में क्रमशः क्षीण होता जा रहा है, तथापि प्रत्येक युग में विष्णु के इस अवतार पर यह दायित्व बना रहा कि उसने इस पृथ्वी पर से अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार के रूप में अधर्म और अमर्यादा का मर्दन करना है। इसीलिए परशुराम पर आज जितना भी साहित्य उपलब्ध है, उसमें भिन्नता है-उनके जन्म को लेकर, उनके जन्म स्थान को लेकर, उनके कर्म-स्थान को लेकर। परन्तु इन भिन्न आस्थाओं का एक सकारात्मक रूप भी है कि सम्पूर्ण भारतीय चित्त ने इस अवतारी पुरुष के प्रति अपनी आस्था का प्रमाण देते हुए इसे अपने क्षेत्र-विशेष से किसी न किसी रूप में जोड़ने में गर्व अनुभव किया। यदि सुदूर पूर्वोत्तर प्रदेश अरुणाचल में ‘परशु कुण्ड’ की उपस्थिति को यह कहकर मान्यता दी गई कि यहीं परशुराम ने अपने रक्त रंजित परशु को ‘ब्रह्मपुत्र’ में शुद्ध किया था और तभी से उनके परशु पर लगे लहु से लाल होने पर उसका एक नाम ‘लोहित’ भी पड़ा, तो दूसरी ओर, सुदूर दक्षिण-पश्चिम की लोक आस्था परशुराम को केरल की स्थापना का आधार मानती है। इसी प्रकार उत्तर भारत में रेणुका झील, मध्य भारत में नर्मदा तट पर जमदग्नि आश्रम आदि ऐसे अनेक प्रसंग है जो सम्पूर्ण भारतीय आत्मा की परशुराम के प्रति श्रद्धा का प्रमाण देते हैं। ऐसे विराट अवतारी पुरुष पर उपलब्ध अनन्त लोक-कथाओं, आस्थाओं और साहित्य का अवगाहन तब तक असम्भव था जब तक कोई व्यक्ति पूर्ण आस्था, श्रद्धा व समर्पण के साथ भगवान् परशुराम के चरित में आकण्ठ डूबकर उसका मन्थन न करता। इस समर्पण की एक और महत्वपूर्ण शर्त यह भी थी कि कहीं कोई शंका या द्वन्द्व इस मार्ग में अवरोध उत्पन्न नहीं करेगा क्योंकि अनेक स्थलों पर अनेक प्रसंगों, घटनाओं, व्याख्याओं में लोक ने अपनी श्रद्धा के अतिरेक में बहुत कुछ ऐसा भी जोड़ दिया है कि सामान्य व्यक्ति उसे स्वीकार करने को कदाचित् तैयार न होता।
किन्तु मुझे अत्यन्त प्रसन्नता व संतोष है कि डॉ. विक्रम शर्मा जी ने अपनी अगाध आस्था व श्रद्धा का परिचय देते हुए उन्हें बहुत ही परिश्रम से ऐसा क्रमबद्ध कर दिया है कि यह ग्रन्थ सामान्य ग्रन्थ भक्ति एवं शक्ति के प्रतीक भगवान् परशुराम न रह कर’ भगवान् परशुराम पुराण’ में परिवर्तित हो गया है। उन्होंने न जाने कहाँ-कहाँ से परशुराम जी के जीवन से जुड़े प्रसंगों को खोज – खोज कर पूरा एक सन्दर्भ कोश बना दिया है। मुझे लगता है कि शायद ही कोई ऐसा स्रोत बचा होगा जिस पर डॉ. शर्मा की दृष्टि न पड़ी हो। फिर उन स्रोतों से एकत्रित किये गये तथ्यों को क्रम देना-यह उससे बड़ा भागीरथ कार्य था जो इन्होंने सहज ही सम्पन्न किया। मैं समझता हूँ कि यह साक्षात भगवान् परशुराम जी की कृपा रही कि उन्होंने जैसे अपनी ही उपस्थिति में यह वृहत् कार्य सम्पन्न करवाया। लेखक ने भगवान् परशुराम चरित को इस प्रकार सूत्रबद्ध किया है कि वह रोचकता के साथ-साथ पाठकों की अनेक जिज्ञासाओं का भी शमन करेगा। इतनी ही नहीं, यह ग्रन्थ मेरे विभाग में स्थापित ‘भगवान् परशुराम पीठ’ को भी परोक्षतः अनेक प्रकार से दिशा-निर्देश देने में सहयोगी बनेगा-ऐसी मेरी धारणा है। उसी विश्वास के साथ डॉ. विक्रम शर्मा जी के लिए बहुत-बहुत शुभ कामनाएं।SKU: n/a -
Hindi Books, Rajkamal Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, धार्मिक पात्र एवं उपन्यास
Bhagawan Parshuram
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Hindi Books, Rajkamal Prakashan, अध्यात्म की अन्य पुस्तकें, धार्मिक पात्र एवं उपन्यासBhagawan Parshuram
आर्य-संस्कृति का उषःकाल ही था, जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि-पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म हुआ। यह वह समय था जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त में यदु और पुरु, भरत और तृत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थीं और जहाँ वसिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व आदि महापुरुषों के आश्रमों से गुंजरित दिव्य ऋचाएँ आर्यधर्म का संस्कार-संस्थापन कर रही थीं। लेकिन दूसरी ओर सम्पूर्ण आर्यावर्त, नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था। ऐसे में युवावस्था में प्रवेश कर रहे परशुराम ने आर्य-संस्कृति को ध्वस्त करने वाले हैहयराज की प्रचंडता को चुनौती दी और अपनी आर्यनिष्ठा, तेजस्विता, संगठन-क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के बदल पर विजयी हुए। संक्षेप में कहें तो यह उपन्यास एक युगपुरुष की ऐसी शौर्यगाथा है जो किसी भी युग में अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती रहेगी।
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