Madhusudan Ojha
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Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Aashauchpanjika
आशौचपंजिका (हिन्दीभाषानुवादसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 17
वेदरहस्योद्घाटक पण्डित मधुसूदन ओझा ने जन्मसम्बन्धी तथा मरणसम्बन्धी आशौच का सम्यक् वेदानुसारी चिन्तन ‘आशौचपञ्जिका’ में प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थ में आधुनिक तर्कप्रधान समाज के लिए आशौच का स्वरूप, आशौच का कारण, आशौच का प्रभव, सापिण्ड्य आदि वस्तुओं का विज्ञान भी प्रमाण तथा युक्ति के साथ निरूपित किया गया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ आशौचविषय का अपूर्व ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में 1. परिभाषाध्याय 2. सूत्राध्याय 3. जन्माध्याय 4. मरणाध्याय 5 उत्तरक्रियाध्याय 6. दोषाध्याय 7 पाताध्याय 8 अतीतकालाध्याय 9 अपवादाध्याय 10 वाक्यसंग्रहाध्याय, भेद से दस अध्याय हैं।
पं. ओझा ने बीस प्रमुख स्मृतियों एवं तत्तत् आचार्यों द्वारा ग्रथित बासठ निबन्धग्रन्थों को आधार बनाकर देशकाल परिस्थिति के अनुसार प्रत्येक दृष्टि से चिन्तन प्रस्तुत किया है।SKU: n/a -
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Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Ambhowad
अम्भोवाद (हिन्दीभाषानुवादटिप्पणसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 9
प्रकृत ग्रन्थ में अम्भःपद से पानी या जल का निषेध न करते हुए विशेष रूप से यह प्रतिपादित किया गया है कि अम्भः से आपः की सृष्टि, आपः से व्योम आदि की सृष्टि तथा इसके बाद स्थूल भूतों की सृष्टि में जल की सृष्टि है। इस स्थूल जल से पृथिवी की रचना सम्भव नहीं है तो उसके इस सृष्टि का मूल होने का तो प्रश्न ही कहाँ है ?SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Aparwad
अपरवाद (टिप्पणनुवादसाहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 3
पर का अर्थ है आत्मा तथा अपर का अर्थ है प्रकृति। प्रकृति का दूसरा नाम स्वभाव भी है। इसलिए प्रकृति या स्वभाव को सृष्टि का कारण मानने वाले सभी अपरवादी हैं। प्रकृत ग्रन्थ इसी विषय का पूर्णविस्तार से विवेचन करने वाला उत्कृष्ट ग्रन्थ है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Atrikhyatih
अत्रिख्यातिः (हिन्दीभाषानुवादसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला 13
पुरातन विश्व और पुरातन भारत के सर्वविध ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति-सभ्यता, भूगोल इतिहास तथा व्यष्टि समष्टि चरित के निर्धान्त ज्ञान के लिए अत्रिख्याति एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। यहाँ वर्णित अत्रि प्राणविध भी है तथा नरविध भी। ओझा जी ने इस ग्रन्थ में वैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक उभयविध अत्रि के स्वरूप का निरूपण किया है।SKU: n/a -
Hindi Books, Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, इतिहास, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र, सही आख्यान (True narrative)
Collection of Madhusudan Ojha
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Hindi Books, Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, इतिहास, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र, सही आख्यान (True narrative)Collection of Madhusudan Ojha
पण्डित मधुसूदन ओझा
Collection of Pandit Madhusudan Ojha1.Varna Samiksha
2.Pitra Samiksha
3.Aparwad
4.Vyomwad
5.Aawaranwad
6.Indravijay
7.Veda Dharma Vyakhyanam
8.Smartkund Samikshadhyay
9.Ambhowad
10.Maharishi Kulvaibhav Vimarsh
11.Shrimad Bhagwad Gita Vigyan Bhashyam (Rahasy Kaandam)
12.Atrikhyatih
13.Dashvaad Rahasyam
14.Shrimad Bhagwad Gita Vigyan Bhashyam
15.Puran Niramanadhikaranam
16.Aashauchpanjika
17.Sharirak Vimarsh
18.Puranotpatiprasang
19.Ved Vigyan VishwakoshSKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Dashvaad Rahasyam
दशवादरहस्यम (हिन्दीभाषानुवादसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 14
नासदीयसूक्त की ‘नासदासीन्नो सदासीत्…..’ पङ्क्तियों को आधार बनाकर पण्डित ओझा जी के द्वारा इस ग्रन्थ के अन्तर्गत सदसद्वाद, रजोवाद, व्योमवाद, अपरवाद, आवरणवाद, अम्भोवाद, अमृतमृत्युवाद, अहोरात्रवाद, दैववाद तथा संशयवाद नामक दस वादों में सृष्टि के मूल कारण का अनुसन्धान किया गया है। इस शताब्दी में ओझा जी का यह अभूतपूर्व चिन्तन वेदविज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए एक ताजी हवा का अहसास कराने वाला है।SKU: n/a -
Hindi Books, Rajasthani Granthagar, Suggested Books, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)
Indra Vijay
Hindi Books, Rajasthani Granthagar, Suggested Books, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, वेद/उपनिषद/ब्राह्मण/पुराण/स्मृति, सही आख्यान (True narrative)Indra Vijay
An Old and Rare Book
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला 6 – इन्द्रविजयः – पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ | Pandit Madhusudan Ojha Granthamala 6 – Indravijay – Pt. Madhusudan Ojha Research CellSKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Kadambini
कादम्बिनी (स्वेपज्ञहिन्दीभाषानुवादसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 10
पण्डित ओझा जी के द्वारा ‘पर्जन्यशास्त्र’ (मेघमाला) को आधार बना कर लिखा यह ग्रन्थ वृष्टिविषयक निमित्तों का स्पष्ट प्रतिपादक है। इसी के साथ वृष्टि का यज्ञ के साथ सम्बन्ध, आपः (जल) की याज्ञिकता, उत्पत्ति एवं स्वरूप का स्पष्ट रूप से इस ग्रन्थ में प्रतिपादन किया गया है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Maharishi Kulvaibhav Vimarsh
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्रMaharishi Kulvaibhav Vimarsh
महर्षिकुलवैभवविमर्श (शोध-आलेखसंग्रह)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 11
पण्डित ओझा ने अपने ‘महर्षिकुलवैभवम्’ ग्रन्थ में ऋषि शब्द के चार अर्थों का निरूपण करने के साथ वेद का पौरुषेयापौरुषेयत्वविचार, वर्णव्यवस्था विज्ञान, षोडशकलपुरुष वैराज मनु का विवेचन किया है इन्हीं से सम्बद्ध गम्भीर शोधलेखों वाला प्रकृत ग्रन्थ उपर्युक्त विषयों का विस्तृत प्रतिपादक होने से मननीय एवं सङ्ग्रहणीय है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Pitra Samiksha
पितृ समीक्षा (अनुवाद)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 2
ऋग्वेद के अनुसार लोक भेद से तीन प्रकार के पितर होते हैं-पर, मध्यम और अवर। इन्हें दिव्यपितृ, ऋतुपितृ तथा प्रेतपितृ भी कहा जाता है। इनकी मूल प्रकृति में भेद के कारण ये आग्नेय, याम्य और सौम्य कहे जाते हैं क्योंकि अग्नि यम और सोम ये तीन पितरों के सहयोगी देवता हैं इनमें आग्नेय प्राण देव तथा सौम्य प्राण पितर कहलाते हैं इन दोनों के मेल से स्थावर जङ्गम समस्त पिण्डों की रचना होती है। इनका विस्तृत प्रतिपादन करने वाला यह ग्रन्थ सङ्ग्रहणीय है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Puran Niramanadhikaranam
पुराणनिर्माणाधिकरणम् (हिन्दीभाषानुवादसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला 16
पुराण सृष्टि का घटक तत्त्व भी है तथा इस विषय का बोधकशास्त्र भी है, दोनों की ही समीक्षा अभीष्ट है, फलस्वरूप इस वाक्य के दो अभिप्राय हैं :—(1) सृष्टि-घटक तत्त्व की सर्वतोभावेन विश्वग्रथनपरक दर्शन प्रक्रिया, जिसे विश्वविकास नाम से व्यवहृत किया जा सकता है। (2) उस पुराण के उद्भव प्रसङ्ग मात्र को देखना तथा उसका कथन करना।
इन दोनों अभिप्राय में पुराण ब्रह्माण्ड के शास्ता का पुराणशास्त्र से पहचानने का यत्न ‘पुराणशास्त्राभिज्ञान’ है। पं. ओझाजी का मन्तव्य है कि सर्वप्रथम एक ब्रह्माण्डपुराण नाम का ऋगादि की भाँति विशेष वेद था कालान्तर में यह ब्रह्माण्डपुराण ही 18 प्रतिपाद्य विषयों के आधार पर 18 महापुराणों के रूप में प्रसिद्ध हुआ।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Puranotpatiprasang
पुराणोत्पत्तिप्रसङ्ग: (हिन्दीभाषानुवादसहितम्) पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रंथमाला 19 : पुस्तक परिचय पूज्यवर्य ओझा जी के इतिहास पुराण नाम के महाभाग में विश्व विकास नाम का एक भाग है। इसमें पुराणोत्पत्तिप्रसङ्ग नाम का एक सन्दर्भ है। उस सन्दर्भ के अन्तर्गत यह ग्रन्थ पुराणाशास्त्राभिज्ञान है।
इस ग्रन्थ का प्रथम प्रकाशन ग्रन्थकार के सुपुत्र श्री प्रद्युम्नजी शर्मा द्वारा संवत् 2001 में तदनुसार सन् 1944 में हुआ था। म.म. पं. श्री गिरिधर जी शर्मा चतुर्वेदी का आरम्भिक वक्तव्य इस ग्रन्थ के विषय में था जो इस ग्रन्थ का परिचायक है। ___ लोमहर्षण ने वेदव्यासनिर्मित पुराणसंहिता का अध्ययन करके स्वयं एक नवीन पुराण संहिता का निर्माण किया। उस स्वनिर्मित पुराणसंहिता में उसने मन्वन्तर, सृष्टि, प्रतिसृष्टि, वंश व वंश्यानुचरित इन पांच तत्त्वों का (अधिक) समावेश किया। लोमहर्षण ने स्वनिर्मित पुराणसंहिता का त्रय्यारुणि, कश्यप, सावर्णि, अकृतव्रण, शांशपायन व हारीत इन 6 शिष्यों को अध्ययन कराया। इनमें से शांशपायन, सावर्णि तथा कश्यप इन तीनों ने स्वतन्त्र पुराणसंहिताओं का निर्माण किया। शांशपायन ने स्वनिर्मित पुराणसंहिता में आख्यान, उपाख्यान, गाथा व कल्पशुद्धि इन चार विषयों का अधिक संनिवेश किया। सावर्णि ने स्वनिर्मित पुराणसंहिता में दर्शनविद्याओं, कलाओं, आगमविषयों व नीतिविषयों का अधिक समावेश किया। इसी प्रकार कश्यप ने स्वनिर्मित पुराणसंहिता में वेदोपवृंहण व पुराणावतरण आदि विषयों का समावेश किया। लोमहर्षण तथा उसके तीन शिष्यों द्वारा निर्मित चारों पुराणसंहिता नैमिषक्षेत्र में सूतशौनक-संवाद-सिद्ध अष्टादश पुराणों की मूलभूत संहितायें कहलाती हैं।
और लोमहर्षणादि द्वारा प्रणीत मूलसंहिताओं का स्रोत बादरायणप्रणीत पुराणसंहिता है। इस तरह पुराणसंहिताओं की तीन श्रेणियां हो जाती हैं:1. कृष्णद्वैपायनप्रणीत पुराणसंहिता। 2. लोमहर्षण व उसके तीन शिष्यों द्वारा प्रणीत चार मूलसंहितायें 3. नैमिषक्षेत्र में सूतशौनकसंवादसिद्ध अष्टादश पुराणग्रन्थ जो कि आजकल लोक में प्रचलित हैं।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Sharirak Vimarsh
शारीरकविमर्श (हिन्दीअनुवादटिप्पणीसहित)पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 18
‘शारीरकविमर्श’ ब्रह्मविज्ञान के विभाग के अन्तर्गत प्रणीत है, यह ब्रह्ममीमांसाशास्त्र से सम्बन्धित है। पं. मधुसूदन ओझा ने शारीरक दर्शन से सम्बन्धित इस ग्रन्थ में वेदविज्ञान के अन्य आनुषंगिक विषयों का भी समीक्षात्मक विवेचन किया है। शब्दमय वेद के पौरुषेयत्ववाद तथा अपौरुषेयत्ववाद, ब्रह्मसूत्र में शास्त्रब्रह्म और आत्मब्रह्म रूप द्विविध ब्रह्म-मीमांसा, ब्रह्ममीमांसा में उपनिषद् शास्त्रों और दर्शनशास्त्रों के विरोधाभासों का परिहार आदि वेदविज्ञान विषयक मतों के रहस्योद्घाटक प्रतिपादन के कारण ‘शारीरकविमर्शः’ उत्कृष्ट ग्रन्थ है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, महाभारत/कृष्णलीला/श्रीमद्भगवद्गीता
Shrimad Bhagwad Gita Vigyan Bhashyam
श्रीमदभगवदगीताविज्ञानभाष्यम् (शीर्षकवडापरपर्यायमूल)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला 15
प्रस्थानत्रयी के हृदय के रूप में प्रतिष्ठित भक्ति, ज्ञान और कर्म की पावन त्रिवेणी, ‘भग’ सम्पत्ति को प्राप्त कराने वाली ‘श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्’ मन्वादिस्मृतियों की तरह केवल विधिनिषेधात्मक शास्त्र न होकर श्रुति की तरह अपने रहस्यज्ञान का प्रतिपादन करने वाली है। चूँकि गीता से भगवत्प्राप्ति होती है, इसलिए यह भगवत्’ है, शब्दवाक् होने से यह ‘गीता’ है तथा रहस्य का प्रतिपादन करने वाली होने से यह ‘उपनिषद्’ है। इस तरह ‘भगवद्गीतोपनिषद् नाम का निष्कर्ष है—’भगवत्प्राप्त्युपायभूत-शब्दवाङ्मयरहस्यशास्त्र’ ।
भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट ज्ञानामृतप्रवर्षिणी सर्वशास्त्रमयी ‘भगवद्गीता’ अपने सार्वकालिक महत्त्व के कारण अनेक व्याख्या एवं भाष्यग्रन्थों से युक्त होने पर भी पण्डित मधुसूदनओझा कृत विलक्षण गीताविज्ञानभाष्य’ से सुवर्णसौरभसम्पृक्त सी हो गयी है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Shrimad Bhagwad Gita Vigyan Bhashyam (Rahasy Kaandam)
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्रShrimad Bhagwad Gita Vigyan Bhashyam (Rahasy Kaandam)
श्रीमदभगवदगीताविज्ञानभाष्यम् (रहस्यकाण्डम)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला 12
वैदिक तत्त्ववाद को आधार बनाकर पण्डित ओझा द्वारा रचित यह ग्रन्थ रहस्यकाण्ड, शीर्षककाण्ड एवं आचार्यकाण्ड नामक तीन काण्डों में उपलब्ध है इनमें प्रथम रहस्यकाण्ड में पण्डित ओझा ने यह स्पष्ट किया है कि जिन वैज्ञानिक तत्त्वों को आधार बनाकर भगवान् कृष्ण ने उपदेश दिया था वे सभी तत्त्व इतिहासदोष के कारण लुप्त हो गये हैं उन्हीं तत्त्वों को प्रस्तुत करना इस विज्ञानभाष्य का उद्देश्य है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Smartkund Samikshadhyay
स्मार्तकुण्डसमीक्षाध्याय (हिन्दीभाषानुवादसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 8
यज्ञ सृष्टि की प्रथम व्यवस्था है, द्रव्यत्याग, भोगत्याग तथा सुखत्याग ही यज्ञ का स्वरूप है। एक आत्मा यज्ञधर्म का अनुसरण करके अनेक बनता है तथा वह अनेक उसी देवनिर्मित मूलधर्म का अनुसरण करके अर्थात् यज्ञ में स्वत्व का उत्सर्ग करके पुनः एकत्व में अवस्थित होता है। यह वेदोक्त यज्ञ का सिद्धान्त पक्ष है इस दृष्टि से प्रकृति की प्रत्येक क्रिया एवं मनुष्य की प्रत्येक चेष्टा यज्ञ है। इस यज्ञ के व्यवहारपक्ष का सूक्ष्म, मार्मिक एवं वैज्ञानिक निरूपण प्रकृत ग्रन्थ में किया गया है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथेतर साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Varna Samiksha
वर्ण समीक्षा (भाषानुवादसहिता)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 1
प्रातिशाख्य ग्रन्थों को आधार बनाकर रचित इस ग्रन्थ में आर्यमातृका एवं अनार्यमातृका के स्वरूप का विवेचन करते हुए आर्यमातृका के अन्तर्गत स्वर व व्यञ्जन से व्यवस्थित ब्रह्म, अक्ष, सिद्ध एवं भूत नाम से चार मातृकाओं तथा हीन क्रम मातृका के रूप में होडामातृका के निरूपण के साथ विवृति, स्वरभक्ति, यम, अनुस्वार, हुङ्कार, रङ्ग, अन्तःस्थ एवं ऊष्म भेद से आठ प्रकार के अयोगवाहों का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इसी क्रम में वाक्तत्त्व के निरूपण प्रसङ्ग में मन, प्राण एवं वाक् में प्राणतत्त्व की वास्तविक सत्ता का प्रतिपादन करते हुए मन एवं वाक् को इसी में प्रतिष्ठित बताया है। स्वरों के विविध रूपों के विवेचन प्रसङ्ग में उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित भेद से तीन प्रकार के प्रमुख स्वरों के साथ सङ्गीतशास्त्र के षड्ज, ऋषभ आदि सात स्वरों का समन्वय भी स्थापित किया गया है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Veda Dharma Vyakhyanam
वेदधर्मव्याख्यानम (हिन्दीभाषानुवादसहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला 7
पण्डित मधुसूदन ओझा के द्वारा लन्दन प्रवास के समय दिये गये व्याख्यानों के इस सङ्कलन का मुख्य विषय वैदिक धर्म है। यहाँ ओझाजी ने वेद एवं धर्म से सम्बन्धित विविध वैज्ञानिक रहस्यों का उद्घाटन करके संस्कृतज्ञों, दार्शनिकों एवं वेदविज्ञान में रुचि रखने वालों को एक नयी दृष्टि से परिचित कराया है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Vyomwad
व्योमवाद (टिप्पणनुवादसाहित)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 4
इस ग्रन्थ में यह प्रतिपादित किया गया है कि पञ्चभूतों में सूक्ष्मतम आकाश ही सृष्टि का मूल है। इस ग्रन्थ में तीन कल्प हैं—1. अमृत कल्प 2. अपां कल्प 3. ज्योतिः कल्प। इनमें अमृतकल्प में अद्वैतवाद, कार्यविभाग अणुविभाग तथा व्योमव्युत्पत्ति नामक चार प्रमुख विभाग हैं। द्वितीय ‘अपां कल्प’ अभ्व, लोक, भूत और गति भेद से चार भागों में विभक्त है। इसी प्रकार ज्योतिः कल्प के भी दो विभाग हैं जिनका सविस्तार वर्णन इस ग्रन्थ में उपलब्ध होता है।SKU: n/a



















