PRAKASHAN SANSTHAN
Showing 1–24 of 38 results
-
Hindi Books, Prakashan Sansthan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Aaryavart
भारतीय आर्य, वैदिक सभ्यता की स्थापना, संघर्ष, इतिहास, भूगोल, स्त्री-स्थिति और ब्रह्माण्डीय विज्ञान की औपन्यासिक कथा
ऋग्वेद विश्व मानव के जीवन दर्शन का पाठ है। मानव का जीवन सरल बनाने के लिए भूगोल और खगोल का पाठ है। मानव-मस्तिष्क में चलने वाले कोलाहल की परिणति स्त्री-पुरुष के प्रेम-संसर्ग और वर्चस्व ;सत्ताद्ध स्थापना की आकांक्षा के लिए संघर्ष है। मनुष्य में दूसरे की उन्नति और बढ़ती धन-संपदा को लेकर ईर्ष्या और विद्वेष है। शरीर में उपलब्ध इन दुर्गुणों के रसायन प्राणलेवा प्रतिस्पर्ध के विदू्रप हैं। शरीर के इसी मन में परिवार, समाज और देश के प्राण न्यौछावर करने वाले उदात्त गुणों का प्रकाट्य भी है। पफलतः शांति, संतोष, अहिंसा के साथ, अपरिग्रह, समता और न्याय का पालन भी है।
उम्र के सोपान चढ़ता जीवन कुछ ऐसी होनी-अनहोनी घटनाओं से गुजरता है, जो अचंभित करती हैं। अतएव मनुष्य इनकी परिणति भाग्य-दुर्भाग्य और प्रारब्ध् में देखता है। निरंतर गतिशील ब्रह्मांड में एक आश्चर्यजनक अनुशासन है। इस गतिशील अनुशासन पर नियंत्राण की वल्गाएं कोई नहीं जानता किसके हाथ में हैं ? यह संशय है, सो ईश्वर है। इस चराचर जगत् को किसने रचा? इस ज्ञान के परिणाम में पंचभूत हैं। इन पंच तत्त्वों का संतुलन गड़बड़ाता है तो मनुष्य का स्वास्थ्य तो गड़बड़ाता ही है, इनके असंतुलन के भैरव-मिश्रण का तालमेल ऐसा कोलाहल रच देता है कि तांडव की विराट प्रलयलीला मनुष्य के समस्त भौतिक-अभौतिक विज्ञान समस्त तथाकथित विकास की उपलब्ध्यिों को लील जाता है। बचा मनुष्य fफर इसी दिशा में चल पड़ता है। भारतीय दर्शन की यही जिजीविशा सर्वग्राही है।
इसी उपन्यास की भूमिका सेSKU: n/a -
Hindi Books, Prakashan Sansthan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
BHARTENDU HARISHCHANDRA GRANTHAWALI ( SET OF 6 VOLS.)
-11%
Hindi Books, Prakashan Sansthan, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)BHARTENDU HARISHCHANDRA GRANTHAWALI ( SET OF 6 VOLS.)
यह ग्रंथावली छह खंडों में उनकी सभी प्रमुख रचनाओं को समाहित करती है:
निबंध व सामाजिक लेख – जाति, धर्म, नारी शिक्षा, देशभक्ति आदि पर गहन विचार।
नाटक व रंगमंच – जैसे अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चन्द्र आदि।
काव्य व गीत – देशभक्ति, व्यंग्य, भक्ति और सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत।
पत्रकारिता लेखन – कवि वचन सुधा जैसी पत्रिकाओं से प्रकाशित विचारोत्तेजक लेख।
अनुवाद व रूपांतरण – संस्कृत, अंग्रेज़ी व बंगाली रचनाओं के सुंदर हिंदी रूपांतरण।
व्यक्तिगत पत्र व संस्मरण – उनके व्यक्तित्व और संघर्षों की झलक।
✅ ऐतिहासिक महत्व – 19वीं सदी के भारत और हिंदी पुनर्जागरण को समझने का दुर्लभ अवसर।
✅ भाषा विकास – आधुनिक हिंदी गद्य के शुरुआती रूप का प्रमाण।
✅ सामाजिक चेतना – जाति प्रथा, नारी अधिकार और उपनिवेशवाद जैसे विषयों पर स्पष्ट विचार।
✅ शोध व अध्ययन हेतु उपयोगी – हिंदी साहित्य, इतिहास, रंगमंच व पत्रकारिता के शोधार्थियों के लिए अमूल्य।
SKU: n/a -
Hindi Books, Prakashan Sansthan, Suggested Books, अन्य कथेतर साहित्य
Brahmrishi Vansh Vistar (PB)
-15%
Hindi Books, Prakashan Sansthan, Suggested Books, अन्य कथेतर साहित्यBrahmrishi Vansh Vistar (PB)
स्वामी सहजानंद सरस्वती बीसवीं सदी के एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी राजनेता थे, जिन्होंने किसानों के संघर्ष को भारत के मुक्ति संघर्ष से जोड़ने का काम किया था। वे अखिल भारतीय किसान सभा के संस्थापक थे। उनकी किसान चेतना के निर्माण में यथार्थवादी विश्वदृष्टि और वैज्ञानिक इतिहास दृष्टि की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, जिसे उन्होंने मार्क्सवाद के गहरे अध्ययन और किसानों के दुख-दर्द के साथ संवेदनात्मक जुड़ाव के माध्यम से अर्जित किया था। इसके साथ ही वे एक संत और भारतीय समाज, संस्कृति और परंपरा के गहरे अध्येता थे। उन्होंने किसान आंदोलन के प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाने के पूर्व, भारत की जातिव्यवस्था और उसकी गतिशीलता का भी गहरा अध्ययन किया था। यह पुस्तक- ‘ब्रह्मर्षि वंश विस्तर’ उसी अध्ययन के क्रम में लिखी गयी कृति है। इसमें उन्होंने ब्राह्मण जाति के सभी ‘फिरकों’ (शाखाओं-उपशाखाओं) की तत्कालीन अवस्था की जानकारी देने के साथ ही अलगाव और जुड़ाव के कारणों पर भी प्रकाश डाला है। हालांकि उनका रुख आलोचनात्मक नहीं है लेकिन अध्ययन इतना विशद है कि यह पुस्तक जातिव्यवस्था का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करने में भी सक्षम है। जातिव्यवस्था का लाभ प्रायः सामंत (और अब बदले हुए समय में नवधनाढ्य और पूंजीपति) ही उठाते रहे हैं, लेकिन यह स्वामीजी के अध्ययन और सजगता का ही परिणाम था कि अपने समय में वे किसानों को अपनी जाति के जमींदारों से अलग करने और किसान आंदोलन को नयी धार देने में सफल हुए। भारतीय समाज की आंतरिक गतिशीलता जो प्रायः जातियों के जुड़ाव और अलगाव के माध्यम से रेखांकित होती है, उसको समझने के लिए आज भी यह प्रासंगिक है। प्रकाशन संस्थान (नयी दिल्ली) से उनकी रचनावली आठ खंडों में प्रकाशित है। इनकी अप्रकाशित रचनाएं निम्न हैं।
SKU: n/a


















