RAGHUVENDRA TANWAR
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, अन्य कथेतर साहित्य, इतिहास, महाभारत/कृष्णलीला/श्रीमद्भगवद्गीता, सही आख्यान (True narrative)
Bharat Vibhajan: Punjab Ki Vyatha-Katha
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, अन्य कथेतर साहित्य, इतिहास, महाभारत/कृष्णलीला/श्रीमद्भगवद्गीता, सही आख्यान (True narrative)Bharat Vibhajan: Punjab Ki Vyatha-Katha
“इस पुस्तक में पंजाब के विभाजन का समग्र विवेचन प्रस्तुत करने के साथ-साथ विभाजन की पूरी प्रक्रिया और उससे उत्पन्न त्रासदी को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। इसमें अनगिनत स्थानीय और राष्ट्रीय घटनाओं को एक साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया है, जिससे कि उस दौर की परिस्थितियों और घटनाओं को आत्मसात् किया जा सके। वर्ष 1947 के दौरान पंजाब में घटित लगभग दिन-प्रतिदिन की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करते हुए, विभाजन के उस मानवीय पक्ष को रेखांकित किया गया है, जो मूलतः असहनीय मानवीय पीड़ा, विस्थापन और त्रासदी की गाथा है।
यह पुस्तक समाचार-पत्रों में प्रकाशित तथ्यों एवं अप्रकाशित स्रोतों के आधार पर विभाजन के समय पंजाब से संबंधित घटनाओं का सूक्ष्म अध्ययन प्रस्तुत करती है। इसके साथ ही, भारत और यूनाइटेड किंगडम से प्राप्त निजी डायरियों, पत्रों, संस्मरणों और प्रत्यक्षदर्शियों के अप्रकाशित स्रोतों का भी उपयोग किया गया है।
प्रशासनिक और सैन्य अधिकारियों के लेख भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने विभाजन की घटनाओं को निकट से देखा और उन्हें लिपिबद्ध किया था।
प्रो. तंवर ने इस पुस्तक में तथाकथित तथ्यों के पारंपरिक विवरणों से आगे बढ़कर महत्त्वपूर्ण मुद्दों एवं घटनाओं को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। उन्होंने लंबे समय से चली आ रही धारणाओं को चुनौती देते हुए ‘छोटी कहानियों’, ‘स्थानीय संवेदनाओं’ और ‘स्थानीय अनुभवों’ को इतिहास के केंद्र में रखा है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह पुस्तक अत्यंत ही प्रासंगिक है। पंजाब तथा औपनिवेशिक भारत के इतिहास में रुचि रखने वाले अध्येताओं के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है।”
SKU: n/a -
Hindi Books, Prabhat Prakashan, Suggested Books, अन्य कथेतर साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Samrajya Ka Sahaj Suryasta
-10%
Hindi Books, Prabhat Prakashan, Suggested Books, अन्य कथेतर साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्रSamrajya Ka Sahaj Suryasta
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी कई रंगों और रूपों वाली है। शायद एक सोची-समझी योजना के तहत केवल एक ही रूप-गांधीवादी ‘अहिंसक’ और सत्याग्रही धारा-राष्ट्र की स्मृति में गहराई से बस गया। जैसे-जैसे यह संघर्ष आगे बढ़ा, अंग्रेजों को यह विश्वास होने लगा कि उनके साम्राज्य के लिए अधिक गंभीर खतरा उस दूसरे आंदोलन से है, जो देशभक्ति, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गौरव के एक जोशीले मेल से उत्पन्न हुआ था। इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व क्रांतिकारियों, गुप्त समितियों और उनके जैसे अन्य लोगों द्वारा किया जा रहा था।
यह मोनोग्राफ (लघु-शोध ग्रंथ) इस बात पर चर्चा करता है कि किस प्रकार अंग्रेजों ने अपने ‘खतरे की आशंकाओं’ (threat perceptions) के आधार पर स्वतंत्रता सेनानियों को ‘खतरनाक’ और ‘कम खतरनाक’ श्रेणियों में वर्गीकृत किया था। खतरे की इन्हीं आशंकाओं ने जेल की स्थितियों और दी जाने वाली सजाओं को निर्धारित किया। लॉर्ड माउंटबेटन ने सन् 1947-48 में भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल के तौर पर अपने लगभग 15 महीने के कार्यकाल के दौरान 200 से भी ज्यादा विदाई समारोहों में भाग लिया था। अहम ब्रिटिश अधिकारियों और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच कायम सौहार्दपूर्ण, अनौपचारिक और निजी संबंधों ने एक तरह से स्वतंत्रता आंदोलन के उस भावनात्मक और ब्रिटिश विरोधी मूल कथानक को कमजोर कर दिया था। यह पुस्तक ऐसे अनजाने तथ्यों को अनावृत करती है।
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