Rahul Sankrityayan
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Hindi Books, Lokbharti Prakashan, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण, सनातन हिंदू जीवन और दर्शन
Meri Tibbat Yatra (PB)
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Hindi Books, Lokbharti Prakashan, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण, सनातन हिंदू जीवन और दर्शनMeri Tibbat Yatra (PB)
स्त्री-जीवन के क़ानूनी पहलू पर विस्तार और प्रामाणिक जानकारी से लिखते हुए अरविन्द जैन ने स्त्री-विमर्श की सामाजिक-साहित्यिक सैद्धान्तिकी में एक ज़रूरी पहलू जोड़ा। क़ानून की तकनीकी पेचीदगियों को खोलते हुए उन्होंने अक्सर उन छिद्रों पर रोशनी डाली जहाँ न्याय के आश्वासन के खोल में दरअसल अन्याय की चालाक भंगिमाएँ छिपी होती थीं। इसी के चलते उनकी किताब ‘औरत होने की सज़ा’ को आज एक क्लासिक का दर्जा मिल चुका है। स्त्री लगातार उनकी चिन्ता के केन्द्र में रही है। बतौर वकील भी, बतौर लेखक भी और बतौर मनुष्य भी।
सम्पत्ति के उत्तराधिकार में औरत की हिस्सेदारी का मसला हो या यौन शोषण से सम्बन्धित क़ानूनों और अदालती मामलों का, हर मुद्दे पर वे अपनी किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठक का मार्गदर्शन करते रहे हैं। ‘बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री’ उनकी नई किताब है जो काफ़ी समय के बाद आ रही है। इस दौरान भारतीय स्त्री ने अपनी एक नई छवि गढ़ी है, और एक ऐसे भविष्य का नक़्शा पुरुष-समाज के सामने साफ़ किया है जिसे साकार होते देखने के लिए शायद अभी भी पुरुष मानसिकता तैयार नहीं है। लेकिन जिस गति, दृढ़ता और निष्ठा के साथ बीसवीं सदी के आख़िरी दशक और इक्कीसवीं के शुरुआती वर्षों में पैदा हुई और अब जवान हो चुकी स्त्री अपनी राह पर बढ़ रही है, वह बताता है कि यह सदी स्त्री की होने जा रही है और सभ्यता का आनेवाला समय स्त्री-समय होगा। इस किताब का आधार-बोध यही संकल्पना है।
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Hindi Books, Rajpal and Sons, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Volga Se Ganga PB
“राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893 – 14 अप्रैल 1963) बीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य के महत्त्वपूर्ण लेखक हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में विविध विषयों पर सौ से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिसमें भारतीय संस्कृति, बौद्ध धर्म, भाषा-शास्त्र, यात्रा-वृत्तांत, उपन्यास, कहानियाँ, निबन्ध सम्मिलित हैं। लेकिन उनकी अधिक प्रसिद्धि उनकी यात्राओं की पुस्तक के कारण है और उन्हें हिन्दी में यात्रा-साहित्य का जनक भी माना जाता है। सत्तर वर्षों के अपने जीवन में से पैंतालीस वर्ष तक वे यात्रा पर रहे, जिसमें वे चीन, तिब्बत, मध्य एशिया की दूर-दराज की जगहों पर गये। अपनी यात्राओं के आधार पर उन्होंने अनेक यात्रा-वृत्तांत लिखे। उनकी लिखी पुस्तकों में से वोल्गा से गंगा सबसे अधिक लोकप्रिय है। यह पुस्तक बहुत रोचक कथा-शैली में छह हज़ार ईसा पूर्व वोल्गा नदी के तट से 1942 के गंगा तट तक जिन लोगों का प्रवास हुआ उन्हीं पर केंद्रित है। 1958 में उनकी रचना ‘मध्य एशिया का इतिहास’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार और 1963 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।”
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