Rajeev ‘Acharya’
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, Suggested Books, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, सही आख्यान (True narrative)
DEVYANI: Ek Pauranik Katha
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Hindi Books, Prabhat Prakashan, Suggested Books, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, सही आख्यान (True narrative)DEVYANI: Ek Pauranik Katha
“शुक्राचार्य का ध्यान भंग हुआ एवं अपने समीप एक अपरिचित तरुण को देखकर प्रश्नसूचक दृष्टि से उसे देखने लगे। तत्पश्चात् कच ने कुछ कहा, जिसे देवयानी नहीं सुन सकी, परंतु वह यह देखकर चकित रह गई कि शुक्राचार्य ने कच को आलिंगनबद्ध कर लिया तथा उसका मस्तक सूँघने लगे।
‘आज से तुम इस आश्रम के सदस्य हो। मैं तुम्हें विद्या-दान अवश्य दूँगा, पुत्र कच।’ शुक्राचार्य का यह कथन देवयानी ने स्पष्टरूपेण सुना।
‘गुरुदेव, मैं यह व्रत लेकर आया हूँ कि जब तक मेरी दीक्षा पूर्ण होगी, तब तक मैं पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा।’
यह सुनकर देवयानी क्षुब्ध हो उठी। उसके हृदय में नाना प्रकार के विचार-तरंग उठने लगे। ‘स्वयं के प्रति कितना श्रेष्ठ भाव है इस युवक में!’ ‘यहाँ कौन इसका ब्रह्मचर्य खंडित करने हेतु प्रतिबद्ध होकर बैठा है?’ “”पिताश्री क्यों इस प्रकार अनुग्रह प्रदर्शित कर रहे हैं?’ ‘इस अभिमानी युवक से किसी प्रकार का संवाद रखना उचित नहीं।’
यह संकल्प लेकर देवयानी अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई परंतु बारंबार उसके मानस- पटल पर कच का प्रभावशाली व्यक्तित्व प्रकाशित हो जाता। अब तो कच स्वप्नों में भी दस्तक देने लगा था।
देवयानी को केंद्र में रखकर लिखा पौराणिक आख्यान, जो तत्कालीन समाज व्यवस्था, संघर्ष, साहस और संबंधों को रेखांकित करता है।”
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Meri Ayodhya, Mera Raghuvansh
“हम दोनों भ्राता जब तक अपनी कुटी तक पहुँचते, तब तक अनर्थ घटित हो चुका था। हमारी कुटी रिक्त थी। भूमि पर धूलिकणों के मध्य अन्न एवं पात्र औंधे पड़े थे।
‘सीते!’ मैंने पुकारा, परंतु प्रत्युत्तर नहीं मिला।
‘सीते!’ मैंने पुन: पुकारा; पुन: प्रत्युत्तर में मुझे मौन ही प्राह्रश्वत हुआ।
तत्पश्चात मैं भयभीत कुटी के प्रांगण में आया, जहाँ विशाल वटवृक्ष अवस्थित था।
‘सीते! वृक्ष की आड़ में छिपकर मेरे साथ क्रीड़ा न करो। यह हास का समय नहीं है!’ फिर भी मुझे कोई उत्तर नहीं मिला।
अब मैं उसके पदचिन्हो को देखते हुए आगे बढऩे लगा। रथ के पहियों का चिह्नï मिलने के पश्चात् कोई अन्य चिह्नï नहीं मिला। मेरे धैर्य का सेतु टूट गया।
‘देवताओ, गंधर्वो! क्या आपने भी नहीं देखा?’ मैंने आकाश की ओर मुख करके भीषण गर्जना की। स्तब्ध पवनदेव ने अपना वेग मद्धिम कर दिया।
उस तनावपूर्व घड़ी में देवताओं ने प्रश्नसूचक दृष्टि से गुरु बृहस्पति की ओर देखा। उन्होंने मंद-मंद मुसकराते हुए कहा, ‘प्रभु लीला कर रहे हैं।
आह! मेरा हृदय असंख्य शरों से बिंधा हुआ था। मैं लीला नहीं कर रहा था, वरन राम रूपी मानव काया में असहनीय वेदना का अनुभव कर रहा था।
मैंने पुन: लक्ष्मण से कहा, अवश्य देखा होगा, इन वृक्षों ने, इन लताओं ने, इन पक्षियों ने, इन मृगों ने…। यह कहते हुए मैंने कदंब, अर्जुन, ककुभ, तिलक, अशोक, ताल, जामुन, कनेर, कटहल, अनार आदि अनेक वृक्षों से पूछा, क्या तुमने मेरी भार्या सीता को कहीं देखा है? परंतु वे सभी मौन रहे।
—इसी पुस्तक से”SKU: n/a
