RG Group Prakashan Books
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Rajasthani Granthagar, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
Khetri Naresh aur Vivekanand
खेतड़ी नरेश और विवेकानन्द : पुनीत बालुकामयी राजपूताने की मरूभूमि में कुछ ऐसी ज्योतिर्मयी शक्ति है कि समय-समय पर उस रक्त-रंजित स्थल में वह शक्ति लोगों के हितार्थ मानव रूप धारण किया करती है। स्वर्गीय राजा अजीतसिंह भी उस शक्ति के एक प्रतिबिंब थेे। स्वामी विवेकानंद और राजा अजीत सिंह उस सृजनहार शक्ति के दो निकटतम रूप थे, जो इस संसार में उस शक्ति की प्रेरणा से आए थे और अपना कर्तव्य-पालन कर उसी में लीन हो गए। स्वामी जी ने अपने आध्यात्मिक बल से अमेरिका में वेदांत-पताका फहराकर भारतवर्ष और हिंदू जाति का गौरव बढ़ाया था। वस्तुतः स्वामी तरूण भारत के स्फर्ति-स्त्रोत थे। अमेरिका में जाकर उन्होंने भारत के लिए जितने आंदोलन किए इतने कदाचित् किसी ने आज तक नहीं किए। इस आंदोलन में खेतड़ी-नरेश राजा अजीत सिंह जी का बड़ा योगदान था। स्वयं स्वामी जी की उक्ति है- “भारतवर्ष की उन्नति के लिए थोड़ा-बहुत मैनें किया है, वह खेतड़ी-नरेश के न मिलने से सम्भव न हो पाता”। प्रस्तुत पुस्तक में स्वामी विवेकानंद जी द्वारा किए गए देश-हित के कार्यों में खेतड़ी-नरेश भी किस रूप में सहायक बनें, उसका विस्तृत वर्णन है। समाज-कार्यों के लिए प्रोत्साहन करने वाली एक अद्भूत कृति। राजस्थान-शेखावाटी के लिए यह परम सौभाग्य की बात है कि वहां राजा अजीत सिंह जी के समान धर्मात्मा पुरूष हुए। उनके समय में न केवल खेतड़ी में ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना हुई बल्कि स्वामी जी ने विविदिषानंद से विवेकानंद नाम राजा अजीत सिंह जी के प्रेमानुरोध से धारण किया था।
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Rajasthani Granthagar, Religious & Spiritual Literature, इतिहास
Kshatriya Jati ki Suchi
क्षत्रिय जाति की सूची : ‘क्षत्रिय जाति की सूची’ में समस्त क्षत्रियों की एकता और संगठन के लिए एक प्रशस्त एवं सर्वतो-भद्र सभागार के अनुरूप है, जिसका सृजन आधुनिक युग के प्रभात में लगभग एक शताब्दी पूर्व हुआ था। इस पुस्तक में भारत के प्राचीन इतिहास, पुराणों में वर्णित सभी क्षत्रिय-कुलों के वर्णन के अतिरिक्त मध्य-युग में राजस्थान के क्षत्रिय-कुलों की शाखाओं का भी वर्णन हुआ है। आधुनिक युग में इस प्रकार की यह प्रथम पुस्तक है, जिससे समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप क्षत्रियों को संगठित होने में बहुत महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी। इस दृष्टि से इस पुस्तक के रचयिता ठाकुर बहादुर सिंह, बीदासर, का यह संग्रह उनकी दूरदर्शिता एवं जाति-प्रेम का परिचय देता है। भारत के प्राचीन क्षत्रियों को आधुनिक क्षत्रिय समाज से जोड़ने के लिए यह संग्रह एक सुदृढ एवं time tested सेतुबन्ध का कार्य भी करता है और इस प्रकार हमें भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध एवं महावीर के धर्म-सम्मत जीवन-व्यवहार और सम्राट अशोक, विक्रमादित्य, भोज और हर्षवर्द्धन के प्रजा-हितैषी कार्यों से प्रोत्साहित होने की प्रेरणा देता है। आशा है क्षत्रिय-समाज अपने संगठित बल से ऋषियों द्वारा स्थापित अपने कर्तव्यों के निर्वाह-स्वरूप राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनैतिक और प्रशासनिक कुशलता और जन-कल्याण की भावनाओं के प्रति क्रियाशील एवं सजग रहकर अन्य समाजों से मैत्री तथा सुहृदयता के सम्बन्ध सुदृढ़ करते हुए अपने बहुमुखी कर्तव्यों के प्रति तन-मन-धन से ससंकल्प उन्मुख होगा।
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Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, संतों का जीवन चरित व वाणियां
Kshatriya Samaj ki Kuldeviyan
Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, संतों का जीवन चरित व वाणियांKshatriya Samaj ki Kuldeviyan
क्षत्रिय समाज की कुलदेवियाँ : ईश्वर के प्रति प्रेम अथवा भक्ति के स्वरूप का भाषा के द्वारा बखान करना बड़ा कठिन मार्ग है। उपासना एवं पूजा ऐसे ही तत्त्व की हो सकती है, जिसे परम रूप में पूर्ण समझा जा सके। ईश्वर विनम्र है, यही कारण है कि भक्त अपने को सर्वथा ईश्वर की दया के ऊपर छोड़ देता है।
नारद सूत्र में भक्ति के विभिन्न प्रकार मिलते हैं। सच्ची भक्ति निःस्वार्थ आचरण के द्वारा प्रकट होती है। भक्त की श्रद्धा एवं विश्वास भक्ति का मूल आधार कहा जा सकता है। इसी रूप में कुलदेवियों की परम्परागत पूजा-अर्चना अलग-अलग वंशधरों में पूजीत हो रही है, जो कुल की रक्षा करने का दायित्व ग्रहण करती है। प्रस्तुत पुस्तक में क्षत्रिय वंश की कुलदेवियों पर प्रकाश डाला गया है। देवी से प्राप्त ज्ञान अर्जन, उनके प्रति रीति-रिवाज एवं परम्पराओं का बोध कराने में यह ग्रन्थ उपयोगी सिद्ध होगा।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Kumbhalgarh Ajey Durg
कुम्भलगढ़ अजेय दुर्ग : महाराणा कुम्भा जो एक वीर, साहसी, योग्य, विद्वान, संगीतकार, नाटककार व स्थापत्य कला का ज्ञाता था, उसने मेवाड़ राज्य की सुरक्षा हेतु मेवाड़ के चारों तरफ दुर्गों का निर्माण व पुननिर्माण करवाया। कर्नल टाॅड अपनी पुस्तक ‘राजस्थान के इतिहास’ भाग 1 में लिखता है कि ‘विदेशी लोगों के आक्रमण से मेवाड़ भूमि की रक्षा करने के लिए 84 दुर्ग स्थित हैं, उनमें से 32 दुर्गों का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया। उन 32 दुर्गों में कुम्भलगढ़ का नाम दुर्गविशेष प्रसिद्ध है। यह दुर्ग ऐसे स्थान पर बनाया गया है, जहाँ चारों और ऊँची दीवारें विद्यमान है, इसी कारण यह दुर्ग चितौड़ के अलावा श्रेष्ठ कहा जा सकता है।’ इससे स्पष्ट है कि महारणा कुम्भा ने अपने साम्राज्य की दूसरी राजधानी सुरक्षा की दृष्टि से कुम्भलगढ़ को बनाया। महाराणा कुम्भा के काल में मालवा व गुजरात के मुस्लिम शासकों ने कई आक्रमण कर कुम्भलगढ़ विजय का स्वप्न साकार करने का प्रयत्न किया, लेकिन प्रत्येक बार उन्हें असफलता ही प्राप्त हुई।
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Literature & Fiction, Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Lok Sahitya Vigyan
लोक साहित्य विज्ञान : उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जब लोक साहित्य अध्ययन-अध्यापन का विषय बना तब हिन्दी में उच्च स्तरीय लोक साहित्य-सम्बन्धी पुस्तकों की बेहद कमी थी। ‘लोक साहित्य विज्ञान’ ने उस कमी को काफी हद तक पूरा किया। वस्तुतः लोक साहित्य को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने वाला यह हिन्दी का प्रथम ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में न केवल लोक साहित्य की वैज्ञानिकता को सिद्ध किया गया है, अपितु वैज्ञानिक सिद्धान्त-निरूपण करके पुष्ट आधार पर लोक साहित्य को विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है।
“इस ग्रन्थ में कई विचारोत्तेजक तथा मानवीय स्थापनाएँ हैं। एक है ‘लोकमानस’ का सिद्धान्त। लोक मनोविज्ञान पर पाश्चात्य विद्वानों ने बहुत काम किया है, पर इस ग्रन्थ में लोकमानस की स्थापना का स्वरूप कुछ भिन्न है।” इसी प्रकार पुस्तक में लोक साहित्य की संकलन-संग्रह सम्बन्धी ऐतिहासिक-भौगोलिक प्रणाली का उपयोग तो किया गया है, पर उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप कई प्रकार से संशोधित करके काम में लिया गया है। लोक साहित्य का ‘क्षेत्रीय अनुसंधान’ से विशेष सम्बन्ध है। क्षेत्रीय अनुसंधानदृसम्बन्धी वैज्ञानिक प्रक्रिया को रेखांकित करते हुए इसे पूरे एक अध्याय में विस्तार के साथ स्पष्ट किया गया है। स्वयं डॉ. सत्येन्द्र की सम्मति में यह इस पुस्तक का ‘अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अध्याय’ है। अपने प्रथम प्रकाशन के बाद से ही लोक साहित्य के अध्येताओंदृशोधार्थियों आदि के लिए यह एक अनिवार्य ग्रन्थ के रूप में मान्य रहा है। पिछले काफी समय से यह अनुपलब्ध था। ग्रन्थ की उपयोगिता तथा महत्त्व को देखते हुए ही इसका पुनप्रकाशन किया गया है।SKU: n/a -
Hindi Books, Literature & Fiction, Rajasthani Granthagar, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Lok Sahitya Vigyan (PB)
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Hindi Books, Literature & Fiction, Rajasthani Granthagar, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृतिLok Sahitya Vigyan (PB)
लोक साहित्य विज्ञान
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जब लोक साहित्य अध्ययन-अध्यापन का विषय बना तब हिन्दी में उच्च स्तरीय लोक साहित्य-सम्बन्धी पुस्तकों की बेहद कमी थी। ‘लोक साहित्य विज्ञान’ ने उस कमी को काफी हद तक पूरा किया। obviously वस्तुतः लोक साहित्य को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने वाला यह हिन्दी का प्रथम ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में न केवल लोक साहित्य की वैज्ञानिकता को सिद्ध किया गया है, अपितु वैज्ञानिक सिद्धान्त-निरूपण करके पुष्ट आधार पर लोक साहित्य को विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। Lok Sahitya Vigyan
“इस ग्रन्थ में कई विचारोत्तेजक तथा मानवीय स्थापनाएँ हैं। एक है ‘लोकमानस’ का सिद्धान्त। लोक मनोविज्ञान पर पाश्चात्य विद्वानों ने बहुत काम किया है, पर इस ग्रन्थ में लोकमानस की स्थापना का स्वरूप कुछ भिन्न है।” thus इसी प्रकार पुस्तक में लोक साहित्य की संकलन-संग्रह सम्बन्धी ऐतिहासिक-भौगोलिक प्रणाली का उपयोग तो किया गया है, पर उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप कई प्रकार से संशोधित करके काम में लिया गया है।
also डॉ॰ सत्येन्द्र के अनुसार- “लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो आभिजात्य संस्कार शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित रहता है।”
लोक साहित्य का ‘क्षेत्रीय अनुसंधान’ से विशेष सम्बन्ध है। क्षेत्रीय अनुसंधानदृसम्बन्धी वैज्ञानिक प्रक्रिया को रेखांकित करते हुए इसे पूरे एक अध्याय में विस्तार के साथ स्पष्ट किया गया है। surely स्वयं डॉ. सत्येन्द्र की सम्मति में यह इस पुस्तक का ‘अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अध्याय’ है। अपने प्रथम प्रकाशन के बाद से ही लोक साहित्य के अध्येताओंदृशोधार्थियों आदि के लिए यह एक अनिवार्य ग्रन्थ के रूप में मान्य रहा है। पिछले काफी समय से यह अनुपलब्ध था। ग्रन्थ की उपयोगिता तथा महत्त्व को देखते हुए ही इसका पुनः प्रकाशन किया गया है। Lok Sahitya Vigyan (Science of Folk Literature)
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Literature & Fiction, Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Lokavlokan (Lok Jeevan Evam Lok Sahitya Sambandhi Lekh)
Literature & Fiction, Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृतिLokavlokan (Lok Jeevan Evam Lok Sahitya Sambandhi Lekh)
लोकावलोकन (लोक जीवन एवं लोक साहित्य सम्बन्धी लेख) : सुपर बाजार में सब्जी खरीदते हुए हम माली के बारे में नहीं सोचते, ऐसे ही कला को जब हम मात्र मंच पर से विशिष्टजनों के लिए प्रक्षेपित या सेवार्पित की जाती हुई जिंस बना देते हैं तब हम कलाकार और उस कला के व्यापक और निर्णायक आर्थिक-सामाजिक मानवीय पहलुओं को नजरअन्दाज कर देते हैं। यदि परम्परा के मूल और मूल्यवान अंशों की रक्षा होनी है, तो सांस्कृतिक संध्याओं के मौसमी ढोल-ढमाके के परे कुछ ज्यादा ठोस, ज्यादा सुचिंतित और ज्यादा सतत प्रयासों की दरकार रहेगी। इन विधाओं, उनकी विशेषताओं और उनसे जुड़े वाद्ययंत्रों को बचाना है, तो उन्हें नये सन्दर्भों में नई सार्थकता देनी होगी। तीन संकट हैं :- संकुचन-विलोपन, अवमिश्रण-पनीलापन, विरूपण-वर्णसंकरण-शायद तीन ही संभव निदान हैं। कुछ चीजों को लगभग ज्यों-का-त्यों बनाये रखने का प्रयास, उनके ही ठीए पर, गुरु शिष्य परम्परा आदि के माध्यम से ‘सम्प्रेषण’ (ट्रांसमिशन)। शेष का अनुकूलन, रूपान्तरण, प्रतिरोपण-एडैप्टेशन, ट्रांसफौर्मेशन, ट्रांसप्लान्टेशन। इन दोनों के लिए असाध्य, शेष मरणोन्मुख की यादगार, पहचान संजोना, शव का परिरक्षण-ममिफिकेशन जैसा, म्यूजियम में रखने जैसा। कुछ लोग पूरी सदेच्छा से, लोकवार्ता को रखने के लिए लोक संस्कृति की संबंधित सीप को बनाये रखने की बात करते हैं। यह अव्यावहारिक दुराशा है। कुछ और उतनी ही सदेच्छा से कहते हैं कि लोक-कला सीखने-सिखाने की चीज नहीं है, रूपान्तरण, अनुकूलन से उसका मूल स्वरूप नष्ट होता है। मत करिये, वह जहां है वहीं अपना मूल स्वरूप लिए-दिए नष्ट हो जाने वाली है। फिर, विरूपण तो बिना एडैप्टेशन, बिना हमारे चाहे भी तो हो ही रहा है।
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Rajasthani Granthagar, Religious & Spiritual Literature, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
Maharaja Agrasen evam Agrawal Samaj ka Sampurn Itihas
Rajasthani Granthagar, Religious & Spiritual Literature, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरणMaharaja Agrasen evam Agrawal Samaj ka Sampurn Itihas
महाराजा अग्रसेन एवं अग्रवाल समाज का सम्पूर्ण इतिहास : इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने महाराजा श्री अग्रसेनजी के जीवन सम्बंधित प्रामाणिक महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पुस्तक में महाराजा अग्रसेनजी की शासन प्रणाली, उनके सिद्धांत, अग्रोहा का विवरण, वर्तमान अग्रोहा धाम, अग्रवालों के गोत्र, उपनाम, वैश्य वर्ण और जातियां, अग्रोहा से सम्बंधित लोक कथाएं, महालक्ष्मी ब्रतकथा, उरुचरितम् तथा भाटों के गीत, अग्रवाल समाज के संस्कार एवं रीति-रिवाज, देश के विभिन क्षेत्रों में नाम कमाने वाले अग्रवाल गौरव, श्री पीठ का महत्व एवं कुलदेवी महालक्ष्मी की स्तुति, श्री अग्रचालीसा, अग्रस्तुति, उनके भजन, आरती इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों को सम्मिलित करके गागर में सागर भरने की एक छोटी सी कोशिश की है। आज तक अग्रसेन, अग्रोहा और अग्रवालों पर लिखी गई पुस्तकों का सार मिलाकर एक ऐसी पुस्तक लिखी है, जिसे पढ़कर अग्रवाल समाज की समस्त जानकारी प्राप्त होगी तथा प्रत्येक अग्रवाल भाई का सर गर्व से ऊँचा हो जायेगा।
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Rajasthani Granthagar, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
Maharana Kumbha : Vyaktitva evam Krititva
महाराणा कुम्भा : व्यक्तित्व एवं कृतित्व : महाराणा कुम्भा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उनके कृत्यों में ‘शास्त्र, संगीत और साहित्य’ का सुन्दर संगम सुस्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। विभिन्न प्रकार के विरुद्ध तथा परमगुरु, शैलगुरु तोडरमल्ल, दानगुरु, चापगुरु अभिनव – भरताचार्य, नंदिकेश्वरावतार, हिन्दू सूत्राण, न्वयभरत इत्यादि से विभूषित कुम्भा के विशाल व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण संकेत हैं। वह एक महान् विजेता, कुशल प्रशासक, उच्चकोटि के निर्माता, विशाल साहित्य का पल्लवितकार, वैदिक संस्कृति को संक्रमण काल से मुक्त कर, पुनर्जागरण स्थापित करने में प्रयासरत व्यक्तित्व था। इसीलिए कुम्भा के शासनकाल (1433 ई. से 1466 ई.) को मेवाड़ में स्वर्णयुग माना जाता है। वास्तव में कुम्भा को परमार नरेश भोज, मौर्यकालीन अशोक और समुद्रगुप्त का सामूहिक प्रतिरूप भी कहा गया है। भोज के समान संस्कृत साहित्य तथा देशज साहित्य को सृजनशीलता में तथा भवन निर्माण में भी अनुपम योगदान दिया। समुद्रगुप्त के समरूप विजय अभियानों का सूत्रपात करना तथा जनजीवन को सुखी एवं समृद्धशाली बनाने में अशोक के समकक्ष माना है। कुम्भा में एक राष्ट्रीय नायक होने के सारे गुणों के उपरान्त भी आश्चर्य है कि उनका राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन न होने का अभाव खटकता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली ने तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 10-12 जुलाई 2019 को उदयपुर में आहुत की थी। उसमें आये अधिकांश शोध पत्रों को ग्रन्थ के आकार में प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा और विश्वास है कि यह ग्रन्थ इस अभाव की पूर्ति की ओर अग्रसर होने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
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On Sale, Rajasthani Granthagar, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
Maharana Pratap : The Hero of Haldighati
-20%
On Sale, Rajasthani Granthagar, इतिहास, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरणMaharana Pratap : The Hero of Haldighati
“What follows is a feast of Rajasthani Dingal poetry in translation. There are few, perhaps none, as well equipped as Kesri Singh to create such translation. He is a master of Dingal and of English. His translation reflects not only his command of both languages but also his poetic imagination and fluency. It takes a poet to translate a poet.” – Prof. Lloyd L. Rudolph from the “Introduction”
I hope The Story of the Battle of Haldighati – which is as close to authentic history as can be – will be found interesting by the general reader; the essay discussing some of the Controversies Concerning the Battle, to be of some worth by serious scholars and researchers in the field of medieval Mewar history; and the Maharana and the Muse, delightful by lovers of property. – Author from the “Afterword”SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्र
Maharishi Kulvaibhav Vimarsh
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और समाजशास्त्रMaharishi Kulvaibhav Vimarsh
महर्षिकुलवैभवविमर्श (शोध-आलेखसंग्रह)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 11
पण्डित ओझा ने अपने ‘महर्षिकुलवैभवम्’ ग्रन्थ में ऋषि शब्द के चार अर्थों का निरूपण करने के साथ वेद का पौरुषेयापौरुषेयत्वविचार, वर्णव्यवस्था विज्ञान, षोडशकलपुरुष वैराज मनु का विवेचन किया है इन्हीं से सम्बद्ध गम्भीर शोधलेखों वाला प्रकृत ग्रन्थ उपर्युक्त विषयों का विस्तृत प्रतिपादक होने से मननीय एवं सङ्ग्रहणीय है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Marwar mein Jatiya Panchayat aur Samaj
प्रस्तुत पुस्तक ‘मारवाड़ में जातीय पंचायत और समाज’ में राजस्थान की देशी रियासतों में से सबसे बड़ी रियासत जोधपुर राज्य में 1818 से पूर्व लगभग 100 वर्षों में प्रचलित न्याय व्यवस्था की एक पक्ष जातीय पंचायतों की कार्यप्रणाली पर विस्तृत प्रकाश डाला। साथ ही उस समय की विभिन्न जातियों की संस्कृति की विस्तृत विवेचना की, जिसमें यहाँ रहने वाली जातियों के रहन-सहन, रीति-रिवाजों एवं उनमें प्रचलित अनेक प्रथाओं की विषद विवेचना कि हैं। जातीय पंचायतों के स्वरूप, संगठन, प्रकार, कार्य पद्धति एवं उनके क्षेत्राधिकार का विस्तृत वर्णन किया।
इस पुस्तक में लेखक ने जातीय पंचायतों की समाज में भूमिका पर विस्तृत विवेचना के साथ ही जातीय पंचायतों के समक्ष आने वाले प्रमुख वाद एवं उस समय प्रचलित दंड व्यवस्था का विस्तृत उल्लेख भी किया है।
इस काल में सम्बंधित देशी रियासत एवं जातीय पंचायतों के सम्बंधों के बारे में भी बताया तथा समाज में आर्थिक राजनीतिक एवं न्यायिक महत्व के बारे में भी पुस्तक में चर्चा की गई है।
इन मुद्दों को यह जातीय पंचायतें कितना प्रभावित करती थी, इन पर भी पुस्तक में विस्तृत विवेचना की गई है। इस प्रकार लेखक ने अंग्रेजों से आने से पूर्व प्रचलित न्याय व्यवस्था को विस्तृत रूप से बताने का प्रयास किया है, जिससे आधुनिक न्याय प्रणाली एवं पूर्व प्रचलित न्याय प्रणाली के बीच तुलना की जा सके तथा इनके गुण दोषों को भी जाना जा सके। लेखक ने इस विषय पर एक सराहनीय प्रयास किया है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, संतों का जीवन चरित व वाणियां
Meena Samaj ki Kuldeviyan
Rajasthani Granthagar, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, संतों का जीवन चरित व वाणियांMeena Samaj ki Kuldeviyan
मीणा समाज की कुलदेवियां : मानव आदिकाल से ही शक्ति की उपासना करता आया है। शक्ति का आदि स्वरूप देवी है। यह आद्याशक्ति सनातन शक्ति प्रकृति है, समस्त जगत की उत्पत्ति उसी से हुई, वही विश्व की जननी है। प्रत्येक सम्प्रदाय में देवी की उपासना परम्परा रही है। भारतीय संस्कृति में देवी की महिमा प्रतिष्ठापित है तथा समाज में देवी पूजा की जड़े बहुत गहरी हैं। प्रत्येक कुल की अधिष्टात्री देवी को कुलदेवी के रूप में पूजने की यहाँ परम्परा रही है। इसी कारण हर कुल की अपनी कुलदेवी स्थापित है और वह उस कुल की वंश वृद्धि और समृद्धि की प्रदाता मानी जाती है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने प्रयास करके मीणा समाज की 51 कुलदेवियों के सम्बद्ध में जानकारी व परिचय दिया है, जो उत्कृष्ट अन्वेषण के आधार पर आधारित है। मीणा समाज के लिए और उनके गोत्रों की पृथक-पृथक कुलदेवियों सम्बन्धी यह विवरण उपयोगी और पठनीय हैै। इससे मीणा समाज के लोग अवश्य लाभान्वित होंगे।
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Rajasthani Granthagar, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
Meera Bai : Pramanik Jivani evam Mool Padawali
मीरा बाई : प्रामाणिक जीवनी एवं मूल पदावली : भक्तिमती मीरांबाई के प्रकाशित पदों में से कितने ही पदों की प्रामाणिकता को लेकर उहापोह बनी हुई थी। श्रीसिंहल ने भाषा और स्रोत की प्रामाणिकता के आधार पर मीरांबाई द्वारा रचित मूल पदों का संकलन और सम्पादन करके प्रथम बार सन् 2008 में ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ के नाम से सटीक छपवाया, जिसमें एक भी पद मौखिक परम्परा का नहीं है; सभी पद लिखित स्रोतों पर आधारित है। प्राचीनतम दो पद विक्रम संवत् 1631 के हैं। गुरुग्रंथ-साहब से विक्रम संवत् 1661 का पद लिया गया है। विक्रम संवत् 1642, 1695, 1701, 1713, 1727 आदि में लिखित ग्रंथों से 128 पद संकलित किए गए है। इस प्रकार, इस संकलन में मीराबाई द्वारा रचित 312 पदों के मूल रूप, संभावित रूप और वर्तमान में प्रचलित पाठ तथा अनेक पदों के उपलब्ध पाठांतर देकर उनकी टीका भी की गई है। टीका में व्याख्या और टिप्पणी भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें अनेक सांशयिक ज्ञानों, वाक्यों, पंक्तियों का सप्रमाण, सविस्तार विवेचन है। ग्रंथ में मीराबाई की जीवनी से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों एवं साहित्यिक संदर्भों का विश्लेषण कर तर्कपूर्ण आंकलन प्रस्तुत किया गया है। जीवनी भाग में कई नए प्रामाणिक व इतिहासपुष्ट तथ्यों का उद्घाटन है। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ का विद्वत समाज ने दिल खोलकर स्वागत किया। परिमाणतः पुस्तक 3-4 महिने में ही खत्म हो गई। सभी का सुझाव था कि पुस्तक पद्यात्मक न होकर शोधग्रंथ है। अतः इसका नाम शोधग्रंथ परक होना चाहिए। इसीलिए अब यह ग्रंथ ‘मीरांबाई: प्रामाणिक जीवनी एवम् मूल पदावली’ के नाम से प्रकाशित हो रहा है। मुझे विश्वास है कि श्रीसिंहल द्वारा अत्यंत परिश्रमपूर्वक निर्मित प्रस्तुत शोधपरक ग्रंथ साक्षात् भक्तिस्वरूपा मीराबाई की श्रीकृष्णार्पित प्रामाणिक जीवनी और उनके मूल पदों से संबंधित मतांतरों का निराकरण कर सकेगा।
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Rajasthani Granthagar, जीवनी/आत्मकथा/संस्मरण
Meera Sudha Sindhu
मीरा सुधा सिन्धु : 16 विभागों में मीरा-पदों का विभाजन कर प्रत्येक विभाग की भूमिका तथा शब्दार्थ-भावार्थ सहित मीरा के पदों का सबसे बड़ा संग्रह, परम मीरा-भक्त स्वामी आनन्द स्वरूपजी ने सन् 1957 में ‘मीराँ-सुधा-सिन्धु’ ग्रन्थ का प्रकाशन ‘श्री मीराँ प्रकाशन समिति’, भीलवाड़ा द्वारा करवाया था। मीरा जैसी अनन्य कृष्णभक्त एवं साधिका की भक्ति में निहित अध्यात्म, दर्शन, भक्तिशास्त्र और दिव्यप्रेम के भावों को परम मीरा भक्त स्वामी आनन्दस्वरूपजी के अतिरिक्त केवल आचार्य रजनीश ही सही ढ़ंग से व्याख्यायित कर पाये हैं। संशोधित-परिवर्द्धित संस्करण में दो-नये अध्याय जोड़े गये हैं :- (1) स्वामी आनन्द स्वरूपजी का जीवनवृत, तथा (2) ‘मीराँ-सुधा-सिन्धु’ ग्रन्थ का संक्षिप्त परिचय। चूँकि स्वामीजी द्वारा लिखित-सम्पादित मूल ग्रन्थ अब बाजार में उपलब्ध नहीं है, जबकि मीरा के अध्येताओं तथा शोधार्थियों के लिए तो यह ग्रन्थ मीरा को जानने का प्रवेश द्वार है, अतः सुधी पाठकों एवं अध्येताओं के हित में मीरा स्मृति संस्थान, चित्तौड़गढ़ ने राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर के सहयोग से इस ग्रन्थ के पुनः प्रकाशन का निर्णय किया है। हमें विश्वास है कि दो खण्डों में प्रकाशित यह ग्रन्थ अध्येताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
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Rajasthani Granthagar, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Mewar ki Gaurav Gathayen
मेवाड़ की गौरव गाथाएँ : ‘मेवाड़’ शक्ति, शौर्य, पराक्रम एवं बलिदान के इतिहास का वह एक नाम है, जिसकी परम पावन माटी का कण–कण अपने में निहित पवित्रता का आभास कराता है और जन–जन अपने माथे पर गौरव–तिलक लगाने के लिए स्वतः प्रेरित होता है। स्मरण रहे कि हर युग में यहाँ का व्यक्ति मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण हेतु सदैव तत्पर रहा है। एक से बढ़कर एक बलिदानियों के कई स्वर्णिम पृष्ठ मेवाड़ के इतिहास से जुड़े है। पद्मावती का अद्भुत जौहर, पन्ना–कृष्णा का अमर त्याग, गोरा–बादल जैसे युवा व बाल योद्धाओं का युद्ध कौशल, भामाशाह का महादान तो अमरचन्द बड़वा का बलिदान आज सम्पूर्ण जगत के लिऐ प्रेरणा–स्रोत बना हुआ है।
पुस्तक के लखन एवं प्रकाशन का यही उद्देश्य है कि मेवाड़ की यह थाती जन–जन तक पहुँचे और विरोचित मूल्य का प्रकाश सर्वत्र बिखरे। साथ ही यह लिखते हुए भी हर्ष का अनुभव हो रहा है कि श्री तरुण देश–प्रदेश के सुनाम इतिहासकार के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार भी हैं, अतः प्रस्तुत गौरव गाथाओं में इतिहास के साथ–साथ साहित्य की अनुभूति का आनन्द भी मिलेगा। इसी आशा एवं विश्वास के साथ…SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, अन्य कथा साहित्य, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Pitra Samiksha
पितृ समीक्षा (अनुवाद)
पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला – 2
ऋग्वेद के अनुसार लोक भेद से तीन प्रकार के पितर होते हैं-पर, मध्यम और अवर। इन्हें दिव्यपितृ, ऋतुपितृ तथा प्रेतपितृ भी कहा जाता है। इनकी मूल प्रकृति में भेद के कारण ये आग्नेय, याम्य और सौम्य कहे जाते हैं क्योंकि अग्नि यम और सोम ये तीन पितरों के सहयोगी देवता हैं इनमें आग्नेय प्राण देव तथा सौम्य प्राण पितर कहलाते हैं इन दोनों के मेल से स्थावर जङ्गम समस्त पिण्डों की रचना होती है। इनका विस्तृत प्रतिपादन करने वाला यह ग्रन्थ सङ्ग्रहणीय है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, इतिहास
Pratapgarh Rajya ka Itihas
प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मेवाड़ राज्य के सिसोदिया वंश से जुड़ा रहा है। उसके शासक उसी राजवंश की एक प्रमुख शाखा के रूप में अपनी परम्पराएँ विकसित करते चले हैं। इस राजवंश की स्थापना आज से प्रायः पाँच सौ वर्ष पूर्व की गई थी। महाराणा कुंभा के भाई क्षेमकर्ण के पुत्र सूरजमल इस राज्य के संस्थापक शासक थे। बागड़, मालवा और मेवाड़ की सीमाओं से जुड़ा हुआ होने के कारण यह राज्य ‘कांठल’ के नाम से भी पुकारा जाता है। यहाँ के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों में भीलों और मीणों की बस्तियों की अधिकता पाई जाती है। प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास को पूर्णतः प्रकाश में लाने की दृष्टि से ही इस ग्रंथ की रचना की गई है। इसके विद्वान् लेखक ने इसे सात अध्यायों में विभक्त कर प्रथमतः उसका भौगोलिक विवरण दिया है जिससे उस राज्य के नाम, स्थान, क्षेत्रफल, सीमा, पर्वतश्रेणियों, नदियों, झीलों तथा वनप्रदेशों आदि की पूरी जानकारी मिल जाती है। प्रथम अध्याय का सम्पूर्ण सर्वेक्षण प्रतापगढ़ रियासत के इतिहास का सम्यक् बोध करने के पूर्व उसकी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझने की दृष्टि से परम उपयोगी है।
ग्रंथ के दूसरे अध्याय में सिसोदियों के पूर्व के राजवंशों का क्रमागत परिचय दिया गया है जिनकी परम्परा रघुवंशी प्रतिहारों, परमार और सोलंकी राजाओं तथा मुसलमान शासकों की भी गणना की गई है। तृतीय अध्याय महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह तक की राज्यघटनाओं का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत करता है तो चौथे अध्याय में महारावत तेजसिंह से प्रतापसिंह तक के शासनकाल की उपलब्धियाँ गिनाई गई हैं। ऐतिहासिक विवरण का यह क्रम महारावत पृथ्वीसिंह, सामंतसिंह, दलपतसिंह तथा महारावत सर रामसिंह तक चलता रहा है जिसमें उन शासकों के जीवन की मुख्य-मुख्य घटनाओं तथा उनकी राजवंशीय परम्पराओं आदि का भी विवरण सम्मिलित किया गया है। ग्रंथ के अंत में जोड़े गये, परिशिष्ट, अनुक्रमणिका एवं चित्रसूची के अध्ययन, अवलोकन तथा आकलन द्वारा प्रतापगढ़ राज्य की ऐतिहासिक सामग्री के उसे प्रपूरक भाग का भी प्रर्याप्त ज्ञान हो जाता है जो उस राज्य के निर्माण और विकास में सहायक सिद्ध हुई थी। कुल मिलाकर यह ग्रंथ प्रतापगढ़ राज्य का प्रामाणिक दस्तावेज है जिसे सही ढंग से खोज निकालने के लिए विद्वान लेखक को वर्षो तक अथक प्रयास करना पड़ा था। अपने क्षेत्र में इस ग्रंथ को लेखक की महान् उपलब्धि कहा जा सकता है।SKU: n/a -
Rajasthani Granthagar, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति
Pratiharon ka Mool Itihas
प्रतिहारों का मूल इतिहास : भारत के इतिहास में कुछ वंश बहुत महत्त्वपूर्ण रहे हैं, उनके साम्राज्य बड़े विस्तृत थे और उन्होंने साहित्य का बड़ा प्रसार किया। कुछ वंशों ने, जिनको जिस धर्म में आस्था थी, उसको बहुत फैलाया, परन्तु क्षत्रिय सभी धर्मों के प्रति उदार और सहिष्णु थे। शासक वर्ग जिस धर्म को मानता था, उसके अलावा अन्य धर्मों को संरक्षण प्रदान करते थे एवं दान-पुण्य देकर प्रोत्साहन देते थे। भारत के महान सम्राज्यों में प्रतिहारों का भी एक बड़ा साम्राज्य रहा है। इसकी एक विशेषता रही है कि जैसे मौर्य, नागवंश तथा गुप्तवंश आदि थे, उनके विरोधी दुश्मन एक तरफ ही थे, जिससे उपरोक्त वंशों के शासकों को अपने राज्यों तथा साम्राज्य के एक ही दिशा में शत्रु का सामना करना पड़ता था, जिससे वे सफल भी रहे। परन्तु प्रतिहारों के पश्चिम में खलीफा जैसी विश्वविजयी शक्ति से इनका मुकाबला चलता था। दक्षिण में राष्ट्रकूटों (राठौड़ों) से टक्कर थी, जो किसी भी सूरत में इनसे कम शक्तिशाली नहीं थे। पूर्व में बंगाल के पाल भी इनके शत्रु थे, वे इन जितने शक्तिशाली नहीं थे, फिर भी प्रतिहारों को उनसे युद्धों में व्यस्त रहना पड़ता था। अरब जो कि इनके शत्रु थे, उनके एक व्यापारी ने लिखा है कि प्रतिहारों को अपने साम्राज्य की समस्त दिशाओं में (चारों ओर) लाखों की संख्या में सैनिक रखने पड़ते है। इस प्रकार मौर्य, नागों और गुप्तों के मुकाबले में प्रतिहारों की शक्ति का आंकलन किया जाये तो प्रतिहारों की शक्ति उनसे अधिक होना सिद्ध होता है।
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