Shapur Navsari
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Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)
Bangladesh Ki Manav Trasadi 1971: (The Rape of Bangladesh)
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Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहास, सही आख्यान (True narrative)Bangladesh Ki Manav Trasadi 1971: (The Rape of Bangladesh)
1971 के बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन पर लिखी गयी यह पुस्तक इस दृष्टि से अभूतपूर्व है कि प्रथमतः पश्चिमी पाकिस्तान की सेना द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में 1970-71 में चल रहे बंगाली नरसंहार, विशेषकर हिन्दू नरसंहार तथा बंगाली स्त्रियों के साथ सामूहिक यौन अपराध को इस पुस्तक के मूल लेखक ने विश्व के सम्मुख प्रकट किया। इस लेखक का नाम एंथनी मास्करेन्हास था। एंथनी मास्करेन्हास उन चुनिंदा 8 पत्रकारों में से थे, जिन्हें मार्च 1971 के अंत में पाकिस्तान सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान आमंत्रित किया था ताकि वे पाकिस्तान के कुकृत्यों पर आवरण डाल सकें तथा बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन को उपद्रव बताकर तथा पाकिस्तानी सेना द्वारा उनके दमन के कार्यक्रम को देशभक्ति का चोला पहनाकर, विश्व की निगाहों में पाकिस्तान को दोषमुक्त दिखा सकें।
परंतु विनाशलीला की वीभत्सता कुछ इतनी अधिक थी कि एंथनी मास्करेन्हास का निष्पक्ष मन विचलित हो उठा। परंतु उन्हे ज्ञात था कि यदि उन्होंने सच्चाई बयान की तो पाकिस्तान सरकार का कोपभाजन अवश्य बनेंगे, अतएव उन्होंने सर्वप्रथम अपने परिवार को लंदन प्रतिस्थापित किया तथा फिर स्वयं भी लंदन चले गए तथा वहाँ बैठकर 13 जून 1971 को ‘संडे टाइम्स’ में एक नरसंहार (Genocide) नाम से उन्होंने एक स्तम्भ लेख लिखा जिसमें पाकिस्तान सरकार द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में की जा रही नृशंसता का सजीव चित्रण किया। यही वह रिपोर्ट थी जिसने न केवल विश्व के सम्मुख पाकिस्तान की क्रूरता का पर्दाफाश किया, बल्कि भारत द्वारा बांग्लादेश में हस्तक्षेप करने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया।
यह पुस्तक 1 अक्टूबर 1971 को लिखी गयी थी, अतएव इसमें मार्च 1971 से लेकर सितंबर 1971 के अंत तक की दमनकारी नृशंसताओं का ही विवरण है। अध्याय 9 में यह स्पष्ट उल्लेख है कि पुस्तक लिखे जाने के समय तक लगभग 5 लाख बंगाली कत्ल किए जा चुके थे तथा लगभग 80 लाख घरबार छोड़कर भारत में शरण के लिए आ गए थे। युद्ध की समाप्ति बांग्लादेश की स्वतंत्रता के साथ ही 16 दिसम्बर 1971 को हुई। हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि अगले ढाई महीनों में कितने अन्य बंगाली कत्ल किये गये होंगे तथा विस्थापित होने के लिए विवश किये गये होंगे। इस पूरे प्रकरण में स्त्रियों को, विशेषकर हिन्दू स्त्रियों को अनिर्वचनीय लज्जास्पद यंत्रणा से होकर गुजरना पड़ा, जो मूल पुस्तक के शीर्षक “The Rape of Bangladesh” से ही इंगित होता है।
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Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहास
Goa Ka Isai Nyayadhikaran Fransisi Dr. Charles Dellon Ka Vistrit Vivran (PB)
-17%
Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहासGoa Ka Isai Nyayadhikaran Fransisi Dr. Charles Dellon Ka Vistrit Vivran (PB)
यह पुस्तक, 1961 में अनंत काकबा प्रियोलकर द्वारा लिखित “Goa Inquisition” के द्वितीय खंड का हिन्दी रूपांतर है। इसमें एक फ्रेंच युवा डॉक्टर डिलोन के अनिर्वचनीय कष्टों का वर्णन है जो उन्हें गोवा के ईसाई न्यायाधिकरण के धार्मिक जेलों में रहते हुए सहने पड़े। उन पर ईसा मसीह अथवा बाइबल की निंदा का अभियोग नहीं था वरन एक साधारण ईसाई सैंट एंथनी की निंदा का आरोप था। यह एक विडंबना है कि ईसाई न्यायाधिकरण विश्व में पवित्र न्यायाधिकरण के नाम से जाने जाते हैं।
गोवा के ईसाई न्यायाधिरण में पवित्र जैसा कुछ भी नहीं था। फ्रेंच दार्शनिक वोल्टेयर के शब्दों में:
“Goa is sadly famous for its inquisition, which is contrary to humanity as much as to commerce. The Portuguese monks deluded us into believing that the Indian populace was worshipping the Devil, while it is they who served him.”
क्या इन क्रूरताओं का उत्स ईसाई धर्म में था अथवा नहीं, यह शोध का विषय हो सकता है; परंतु यह कोई एकाकी ईसाई न्यायाधिकरण नहीं था वरन विभन्न देशों में फैले हुए अनेकों इस तरह के न्यायालयों में से एक था, जहां धार्मिक अपराधियों के प्रति इसी प्रकार की निर्ममता बरती जाती थी। इस संबंध में एक बार फिर वोल्टेयर के ही शब्दों में :
“Christians had been the most barbarous warmongers and killers, attacking people for no other reason than difference of opinion.”
इस पुस्तक में एक फ्रेंच नागरिक ने न्यायाधिकरण में एक कैदी के रूप में रहते हुए अपने अनुभवों का सजीव चित्रण किया है। वास्तव में इस विवरण के बाद ही गोवा में पवित्र न्यायाधिकरण समाप्त करने की बातें उठने लगी थीं।
इस पुस्तक के आखिरी कुछ पृष्ठों में एक ब्रिटिश अधिकारी क्लोडयस बुकानन द्वारा वर्ष 1808 में इस न्यायाधिकरण की यात्रा का भी वर्णन है जो डॉक्टर डिलोन के विवरण से मेल खाता है।
पुस्तक के अंत में ईसाई प्रशासकों तथा धर्माधिकारियों द्वारा 1541 से 1567 के मध्य गोवा तथा निकटस्थ पुर्तगाली प्रभाव वाले क्षेत्रों में नष्ट किये गए मंदिरों की सूची है, जिनका संदर्भ यूरोपीय लेखकों की अपनी पुस्तकें हैं।
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Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, सही आख्यान (True narrative)
Kamboja/Kambodia Ka Pracin Hindu Upnivesh
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Akshaya Prakashan, Hindi Books, इतिहास, ऐतिहासिक नगर, सभ्यता और संस्कृति, सही आख्यान (True narrative)Kamboja/Kambodia Ka Pracin Hindu Upnivesh
भौतिक सुखों में लिप्त भारतीयों की वर्तमान पीढ़ी के लिए आज यह विश्वास करना कठिन है आज से 2 हजार वर्ष से भी प्राचीन काल से भारतीय अपनी वीरता, साहस व उद्यमशीलता के बल पर पश्चिम में कैस्पियन सागर के तट से लेकर सुदूर पूर्व में फिलीपर्पीस व पूर्वी तिमोर तक अपनी बस्तियां बसाने में सफल रहे थे। भारतीयों के यह उपनिवेश, सांस्कृक्तिक उपनिवेश अवश्य थे, परंतु उन्होंने स्थानीय रीति-रिवाजों व उत्सवों को भी अपने में समाहित किया। इस दृष्टि से भारतीयों के यह उपनिवेश ईसाइयों तथा मुस्लिमों द्वारा स्थापित औपनिवेशिक व राजनैतिक साम्राज्यों से भिन्न थे जहाँ मिथ्यावादन, धूर्तता, छल व हिंसा का प्रयोग करके स्थानीय संस्कृक्ति को उजाड़ दिया गया था।
कंबोडिया अथवा कंबोज में भारतीय उपनिवेश की स्थापना प्रथम व द्वितीय शताब्दी ईस्वी से ही एक सिलसिलेवार ढंग से होनी शुरू हो गई थी। कंबोज में भारतीय सांस्कृक्तिक उपनिवेश स्थापित करने का श्रेय कौडिन्य नामक भारतीय ब्राह्मण को दिया जाता है जो दूसरी शताब्दी ईस्वी में यहाँ आया था। परंतु निश्चय ही कंबोज के तटीय क्षेत्रों में तथा निकटवर्ती जावा व सुमात्रा में भारतीय व्यापारिक बस्तियां इससे पूर्व भी रही होंगी, जिनका कुछ-कुछ संकेत जातक कथाओं में भी मिलता है, दृष्टांत के लिए समुद्द वणिज बौद्ध जातक कथा में, मिथिला के राजकुमार महाजनक द्वारा सुवर्णभूमि (आधुनिक सुमात्रा) की यात्रा का वर्णन है। कंबोज के राजाओं द्वारा निर्मित भव्य हिन्दू मंदिर आज भी विश्व के अनूठे आश्चर्यो में गिने जाते हैं। 1860 में, फ्रेंच प्रकृतिवादी तथा अन्वेषक, हेनरी मौहोत ने कंबोज स्थित विश्व के सबसे बड़े विष्णु मंदिर अंगकोरवाट से पाश्चात्य जगत को परिचित कराया। बक्सेई चामक्रोंग का शिव मंदिर, बायोन का बुद्ध मंदिर, कोह केर का शिव मंदिर, बन्तेय छमार का बुद्ध मंदिर इत्यादि भी उल्लेखनीय हैं।
यह पुस्तक डॉ. रमेश चंद्र मजूमदार द्वारा 1944 में लिखित मूल पुस्तक का हिन्दी अनुवाद है। वह प्रथम भारतीय थे जिन्होंने कंबोज में भारतीय संस्कृति की प्राचीन उपस्थिति को साक्ष्य के साथ विश्व के सामने रखा था।
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