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Alaknanda Sut


अलकनन्दा सुत जैसी कहानियाँ लिखी नहीं जातीं- वे पहाड़ की नमी में उपजती हैं, वादियों की हवा में गूँजती हैं और नदी के शोर में गुम हो जाती हैं।
शिवानन्द गैरोला, महज़ एक नाम नहीं है, जिजीविषा है। ऐसी जिजीविषा जो गढ़वाल की घाटियों में राह बनाती है, चट्टानों से टकराती है, थकती है पर कभी हार नहीं मानती। मानव के अदम्य मनोबल का मूर्तमान शिवानन्द कभी रुकता नहीं है। वह चलता है, बस चलता रहता है। कभी गाँव की पगडंडियों पर, कभी शहर की सड़कों पर – चुपचाप, लेकिन भीतर बहुत कुछ कहता हुआ ।
शिवानन्द–अलकनन्दा सुत – गुज़र गये एक पूरे कालखण्ड को जीवन्त करता है। कथा उसी कालखण्ड की सभ्यता को प्रतिबिम्बित करती है।
परम्परा, पलायन और संघर्ष के अनगिनत प्रश्नों से बुनी यह कथा उत्तर नहीं देती। लेकिन समाधान बताती है। सुख हर समय पकड़ने में नहीं है। कभी-कभी छोड़ देने से भी राह निकल आती है।
स्त्री अपमान और अस्मिता के प्रश्नों के सापेक्ष अलकनन्दा सुत पुरुष के अहं और अस्मिता को केन्द्र में रख कर उसके बल और कमज़ोरियों से संवाद करता है। उस पुरुष – केन्द्रित दृष्टिकोण को सामने लाता है-जहाँ पुरुष भी सीमाओं, ज़िम्मेदारियों और अपने अन्तर्द्वन्द्वों से जूझता है।
समय के लम्बे अन्तराल में प्रकृति, परम्पराओं और बदलती जीवन शैली के बीच परस्पर टकराते-सँभलते-टूटते सम्बन्धों की यह मार्मिक कथा स्मृतियों, अनुभवों और गहन शोध से बुनी गयी है। ऐसी कथा पहले जीयी जाती है, तब लिखी जाती है।
अलकनन्दा सुत उस पीढ़ी को विनम्र श्रद्धांजलि है, जिसने पहाड़ की ऊँचाइयों को छूने से पहले घाटियों के अँधेरों से जूझना सीखा। वह पीढ़ी, जो नश्वरता में मिट तो गयी लेकिन अपने होने के निशान छोड़ गयी ।

Rs.445.00 Rs.495.00

Author: Archana Painuly
Publication : Vani Prakashan

Weight 0.650 kg
Dimensions 8.7 × 5.7 × 1.5 in

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