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Bhagavan Parshuram Puran


भारतीय दर्शन-परम्परा में ब्रह्म और जीव का सम्बन्ध नित्य माना गया है। एक आस्था के अनुसार, जीव ब्रह्म का ही सूक्ष्म रूप है, उसी ब्रह्म से उसका जन्म होता है और मृत्यु के पश्चात् उसी ब्रह्म में विलीन होकर उसकी मुक्ति होती है। दूसरी आस्था के अनुसार, वह करुणामयी जब अपने ही प्रतिरूप जीव को मायावी जगत में किसी विपत्ति में देखता है तो उसे त्राण दिलाने के लिए वह स्वयं अवतारी रूप में प्रकट होता है और अपने भक्तों का उद्धार करता है। अब जगत, क्योंकि मूलतः माया के प्रसार का आधार है और जीव अपनी अबोधता, अज्ञानता व चंचलता के कारण बार-बार उसमें डूब जाता है, इसलिए हर-बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है कि ईश्वर को इस धरती पर आना पड़ता है। इसीलिए भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में अवतारवाद की संकल्पना की गई। ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से क्योंकि विष्णु ही इस जगत के पालक देव है, इसीलिए उन्हें ही अपने कर्त्तव्य निर्वाह के लिए हर बार अवतार लेना पड़ता है। मूलतः इन अवतारों की संख्या दस मानी गई थी, किन्तु बाद में विष्णु के 24 अवतारों को मान्यता दे दी गई। इसके अनेक कारण रहे।
विष्णु के दस अथवा चौबीस अवतारों में मात्र एक अवतार परशुराम का ऐसा है जिसे चिरंजीवी होने का भी वरदान प्राप्त है, अन्यथा शेष सभी अवतार इस पृथ्वी पर अपना कार्य सम्पन्न करने के पश्चात् वापिस देव लोक को लौट गये। इस दृष्टि से परशुराम जी का अस्तित्व शेष सभी अवतारों से कहीं अधिक गुरू है। विभिन्न युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि युग) की भारतीय पौराणिक धारणा में यद्यपि यह पहले से ही अन्तर्च्यूत है कि धर्म इन युगों में क्रमशः क्षीण होता जा रहा है, तथापि प्रत्येक युग में विष्णु के इस अवतार पर यह दायित्व बना रहा कि उसने इस पृथ्वी पर से अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार के रूप में अधर्म और अमर्यादा का मर्दन करना है। इसीलिए परशुराम पर आज जितना भी साहित्य उपलब्ध है, उसमें भिन्नता है-उनके जन्म को लेकर, उनके जन्म स्थान को लेकर, उनके कर्म-स्थान को लेकर। परन्तु इन भिन्न आस्थाओं का एक सकारात्मक रूप भी है कि सम्पूर्ण भारतीय चित्त ने इस अवतारी पुरुष के प्रति अपनी आस्था का प्रमाण देते हुए इसे अपने क्षेत्र-विशेष से किसी न किसी रूप में जोड़ने में गर्व अनुभव किया। यदि सुदूर पूर्वोत्तर प्रदेश अरुणाचल में ‘परशु कुण्ड’ की उपस्थिति को यह कहकर मान्यता दी गई कि यहीं परशुराम ने अपने रक्त रंजित परशु को ‘ब्रह्मपुत्र’ में शुद्ध किया था और तभी से उनके परशु पर लगे लहु से लाल होने पर उसका एक नाम ‘लोहित’ भी पड़ा, तो दूसरी ओर, सुदूर दक्षिण-पश्चिम की लोक आस्था परशुराम को केरल की स्थापना का आधार मानती है। इसी प्रकार उत्तर भारत में रेणुका झील, मध्य भारत में नर्मदा तट पर जमदग्नि आश्रम आदि ऐसे अनेक प्रसंग है जो सम्पूर्ण भारतीय आत्मा की परशुराम के प्रति श्रद्धा का प्रमाण देते हैं। ऐसे विराट अवतारी पुरुष पर उपलब्ध अनन्त लोक-कथाओं, आस्थाओं और साहित्य का अवगाहन तब तक असम्भव था जब तक कोई व्यक्ति पूर्ण आस्था, श्रद्धा व समर्पण के साथ भगवान् परशुराम के चरित में आकण्ठ डूबकर उसका मन्थन न करता। इस समर्पण की एक और महत्वपूर्ण शर्त यह भी थी कि कहीं कोई शंका या द्वन्द्व इस मार्ग में अवरोध उत्पन्न नहीं करेगा क्योंकि अनेक स्थलों पर अनेक प्रसंगों, घटनाओं, व्याख्याओं में लोक ने अपनी श्रद्धा के अतिरेक में बहुत कुछ ऐसा भी जोड़ दिया है कि सामान्य व्यक्ति उसे स्वीकार करने को कदाचित् तैयार न होता।
किन्तु मुझे अत्यन्त प्रसन्नता व संतोष है कि डॉ. विक्रम शर्मा जी ने अपनी अगाध आस्था व श्रद्धा का परिचय देते हुए उन्हें बहुत ही परिश्रम से ऐसा क्रमबद्ध कर दिया है कि यह ग्रन्थ सामान्य ग्रन्थ भक्ति एवं शक्ति के प्रतीक भगवान् परशुराम न रह कर’ भगवान् परशुराम पुराण’ में परिवर्तित हो गया है। उन्होंने न जाने कहाँ-कहाँ से परशुराम जी के जीवन से जुड़े प्रसंगों को खोज – खोज कर पूरा एक सन्दर्भ कोश बना दिया है। मुझे लगता है कि शायद ही कोई ऐसा स्रोत बचा होगा जिस पर डॉ. शर्मा की दृष्टि न पड़ी हो। फिर उन स्रोतों से एकत्रित किये गये तथ्यों को क्रम देना-यह उससे बड़ा भागीरथ कार्य था जो इन्होंने सहज ही सम्पन्न किया। मैं समझता हूँ कि यह साक्षात भगवान् परशुराम जी की कृपा रही कि उन्होंने जैसे अपनी ही उपस्थिति में यह वृहत् कार्य सम्पन्न करवाया। लेखक ने भगवान् परशुराम चरित को इस प्रकार सूत्रबद्ध किया है कि वह रोचकता के साथ-साथ पाठकों की अनेक जिज्ञासाओं का भी शमन करेगा। इतनी ही नहीं, यह ग्रन्थ मेरे विभाग में स्थापित ‘भगवान् परशुराम पीठ’ को भी परोक्षतः अनेक प्रकार से दिशा-निर्देश देने में सहयोगी बनेगा-ऐसी मेरी धारणा है। उसी विश्वास के साथ डॉ. विक्रम शर्मा जी के लिए बहुत-बहुत शुभ कामनाएं।

Rs.1,270.00 Rs.1,495.00

  • Publisher ‏ : ‎ Kalpana Prakashan, New Delhi
  • Publication date ‏ : ‎ April 1, 2018
  • Edition ‏ : ‎ 2018th
  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • ISBN-10 ‏ : ‎ 9386630508
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 978-9386630506
  • Author: Vikram Sharma
Weight 1.550 kg
Dimensions 9 × 5.7 × 1.57 in

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