Publisher: Kalpana Prakashan, New Delhi
Author Tarkeshwar Upadhyay
Language: Hindi
Cover: HARDCOVER
Edition: 2024
ISBN: 9788196360931
Bihar ke Nirgun Bhakt Kavi (San 1900 Tak)
निर्गुण भक्ति-काव्य की परम्परा
संत शब्द ‘सत्’ का वाचक है। सत्-ब्रहृम अर्थात् सच्चा साधु, जो सत्य साध् ान में वर्त्तमान है, सत्य जीवन जी रहा है एवं जो सज्जन, धीर, नित्य, स्थायी, मान्य, पूज्य, प्रशस्त, शुद्ध, पवित्र, श्रेष्ठ, उत्तम, भला, पण्डित, विद्वान् आदि सबकुछ है ।
संत शब्द के अन्तर्गत साधु संन्यासी, विरक्त, त्यागी, महात्मा सबका समावेश है । इसमें हरिभक्त धार्मिक एवं सर्वगुण सम्पन्न पुरूष भी समाये हैं। ऐसे उदार महात्माओं में ऐसा अहंकार कभी जन्म ही नहीं ले सकता कि मैं संत हूँ। संत लोग ‘तृणादपि सुनीच’ एवं ‘तरोरपि सहिष्णु’ होते हैं। यहाँ तक कि सहसा कोई व्यक्ति उनकी ‘साधुता’ एवं ‘संतपना’ समझ और देख नहीं पाते। क्योंकि ऐसे व्यक्ति किसी बाह्य दिखावा धारण कर, या शरीर को विशेष प्रकारके वस्त्रों से सजाकर संत, महात्मा नहीं बनते । संसारी बनावट, संसारिकों, मायावियों के लिए है, उससे संत को लेशमात्र का भी लगाव नहीं है। कोई भी साधक अपनी कठोर साधना और सहज भाव के साधन से ही अपने परम साध्य (संतत्व) को प्राप्त कर सकता है। संत की समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ अर्हनिश ब्रह्ममय बनी रहती हैं। उसकी जिह्वा पर प्रभु का नाम शब्द कर्ण कुहर मे नाम-ध्वनि और आँखों से चराचर को ब्रह्ममय देखता है। ऐसे महापुरूष प्रतिपल अपने अंतः का निरीक्षण और परीक्षण करते रहते हैं। ऐसे तो उनके निर्मल मन में किसी प्रकार के विकार की जगह होती ही नहीं; दुर्योग से कहीं से कुछ हल्की-सी सांसारिकता ने प्रवेश किया कि वे उस असंत भाव को तत्क्षण निष्कासित कर देते हैं। ऐसे लोग सतत् जागरूक और सावधान रहते हैं। परदुख कातरता और परोपकार ही उनका व्यसन होता है। उनके प्रति दुर्विचार, शत्रु भाव रखने वाले के प्रति भी वे उसके प्रति सद्भाव ही रखते हैं। वे पंच क्लेशों और षड्विकारों को पल भर के लिए भी अपने पास फटकने नहीं देते, अनिष्ट करने वालों की भी वे उनकी इष्ट साधना ही करते हैं। वैसे ही महापुरूषों के लिए गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा
‘तुलसी संत सुअम्ब तरू, फूलै फलै पर हेत । जितते वे पाहन हनै, उतते वे फल देत ।।
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Rs.445.00 Rs.495.00
| Weight | 0.850 kg |
|---|---|
| Dimensions | 8.7 × 5.51 × 1.57 in |
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संदीप देव

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