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Kisan Aandolan Ka Sankshipta Itihas


स्वामी सहजानन्द सरस्वती का कार्यक्षेत्र भले ही बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश रहा हो, लेकिन भारत की किसान चेतना की उनकी समझ व्यापक थी। आंदोलन के इस संक्षिप्त इतिहास में विवरण का विस्तार नहीं है, फिर भी 1836 से 1853 के बीच के मोपला विद्रोहों और भीलों के संघर्षों का भी उन्होंने संज्ञान लिया है। 1856 के हूल (संथाल विद्रोह) को किसान विद्रोह के रूप में रेखांकित करने वाले तो वे शायद पहले चिंतक और इतिहासकार है। उन्होंने किसान सभा के झंडे तले लड़ाइयाँ ही नहीं लड़ीं, संघर्ष और विद्रोह की पूरी परम्परा को भी रेखांकित किया है। यह पुस्तक मुख्य रूप से किसान सभा के उनके संस्मरणों पर आधारित है। उन्होंने आजादी के पहले के आंदोलन की संक्षिप्त जानकारी देने के साथ-साथ उस नयी अवधारणा का भी निर्माण किया जिसको लेकर आज भी विचार करने की जरूरत है। संपादक राघव शरण शर्मा ने स्वामीजी की रचनावली का भी संपादन किया है और इस क्रम में पर्याप्त सामग्री एकत्र की है। इस पुस्तक में परिशिष्ट के रूप में उन्होंने स्वामीजी के निधन के बाद के किसान आंदोलनों का संक्षिप्त विवरण जोड़ दिया है। तेलंगाना विद्रोह से लेकर अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली की सीमाओं पर इकट्ठे हुए किसानों के सफल आदोलन की भी संक्षेप में चर्चा कर दी है। इससे इस पुस्तक का महत्त्व और बढ़ गया है।

Rs.225.00 Rs.250.00

  • Publisher ‏ : ‎ Prakashan Sansthan (1 January 2023)
  • Paperback ‏ : ‎ 184 pages
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 9789389127928
Weight 0.300 kg
Dimensions 8.7 × 5.5 × 1.4 in

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