प्रोफेसर विवेकानंद तिवारी धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों के विद्वान है। तिवारी टोला, भभुआ, कैमूर (बिहार) में जन्मे, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षित प्रो० तिवारी की १५० से ज्यादा पुस्तकें और २५० से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। अनेक संस्थाओं से प्रो. तिवारी को प्राप्त सम्मानो में ‘भारत-भारती सम्मान’, ‘मालवीय शिक्षा सम्मान’, ‘राष्ट्र गौरव सम्मान’, ‘यू०पी० गौरव सम्मान’, ‘शारदा शताब्दी सम्मान’ एवं ‘महाशक्ति सम्मान’ विशेष उल्लेखनीय हैं। सम्प्रति आप अम्बेडकर पीठ (हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला) के अध्यक्ष हैं।
विशेषः प्रो० तिवारी का २०२३ में एक साथ ६१ पुस्तकों का प्रकाशन जो कि एक विश्व कीर्तिमान है।
Kumbh Kee Apriy Ghatanaon Ka Vishleshan
कुम्भ मेला में हर अखाड़ा अपना महत्व और स्थान रखने की कोशिश करता है, और जब हजारों साधु-संत एक साथ होते हैं, तो कभी-कभी यह प्रतिस्पर्धा हिंसक रूप ले लेती है। प्रत्येक अखाड़ा अपने आपको प्रमुख और प्रभावशाली मानता है, और कुम्भ मेला एक ऐसा अवसर होता है जब विभिन्न अखाड़े अपनी धार्मिक और सामाजिक स्थिति साबित करने की कोशिश करते हैं। कुम्भ मेले में प्रमुख स्थान पर स्नान करने के लिए बहुत प्रतिस्पर्धा होती है। हर अखाड़ा यह चाहता है कि वह सबसे पहले स्नान करने के लिए अपने साधुओं को भेजे, जो धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह संघर्ष पारंपरिक तौर पर अखाड़ों की आंतरिक प्रतिस्पर्धा, सम्मान और पद की चाहत से जुड़ा होता है। कुम्भ मेला अपने धार्मिक महत्व के बावजूद कभी-कभी इन संघर्षों के कारण चर्चा में रहता है, लेकिन इसका उद्देश्य और महत्व समग्र रूप से भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को समर्पित है।….. १८२० का हरिद्वार कुम्भमेला इतिहास में दर्ज वह कुम्भ है, जिसमें ज्ञात स्रोतों के मुताबिक भगदड़ से ४५० से भी ज्यादा तीर्थयात्रियों की मौत हुई और १००० से ज्यादा लोग घायल हुए। इसके बाद १८४० के प्रयाग कुम्भ मेले में ५० से अधिक मौतें हुई। तत्कालीन सरकारी तंत्र में लगातार मची उथल-पुथल और व्यवस्था के मामूली इंतजामों के कारण इसके बाद के प्रत्येक कुम्भ में भी भगदड़ से तीर्थयात्री मरते रहे, जिनका आधिकारिक ब्यौरा तक उपलब्ध नहीं है। यदि २०वीं शताब्दी की बात करें तो १९०६ के प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ से ५० से अधिक मौतें हुईं और १०० से ज्यादा लोग घायल हुए थे। प्रयागराज में होने वाले कुंभ और माघ मेले के इतिहास में देश की आजादी के बाद १९५४ के कुंभ को भी दुर्घटना की वजह से याद किया जाता है। इस मेले में मौनी अमावस्या के दिन त्रिवेणी बांध पर मची भगदड़ में सैकड़ों श्रद्धालुओं को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
Rs.495.00
| Weight | 0.450 kg |
|---|---|
| Dimensions | 8.7 × 5.5 × 1.5 in |
Author Vivekanand Tiwari
ISBN 9788119202218
Language Hindi
Publisher Luminous Books
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