लोकविरसा किसी भी प्रांत की धरोहर होती है। इसकी मासूमियत में इतनी ताकत होती है कि जो प्राकृतिक आपदाओं और मानव द्वारा छेड़छाड़ के बावजूद भी जिन्दा रहती है। यह अन्नत तक चलने वाली लोकधरोहर है, जो कभी ख़त्म हो ही नहीं सकती।
पंजाब की लोककथाओं में लोकनायक, जिन्न, भूतों, पिशाचों, राक्षसों तथा खौफनाक दरिन्दों से भिड़ने की क्षमता रखते हैं तथा अदृश्य शक्तियों से जीत प्राप्त करने का फन जानते हैं। हैं। यह लोककथाएं मनुश्य में जिज्ञासा तथा दिलचस्पी उत्पन्न करती हैं। किस तरह अंधेरी अनदेखी जगहों पर लोककथाओं का नायक खौफनाक जीव-जन्तुओं से भिड़ कर अपने वश में कर लेता है।
यह तिलिस्मी लोककथाएं आज भी पाठकों को भीतरी मन से प्रभावित करती हैं और सच ही वह उन तिलिस्मी कन्दराओं में विचरने लगता है।
हमारे बुजुर्ग ना तो किसी राजघराने से होते थे और ना ही बहुत धनाढ्य होते थे। उनमें अधिकतर मेहनतकश किसान या श्रमजीवी ही होते थे। उनके लिए लोकविरासत एक जुनून, एक चुम्बकीय आकर्शण… तथा जीने का बहाना ही हुआ करता था।
कोई ज़माना था हम अपने दादा-नाना से कहानी सुनते थे, जिन्हें पंजाब में बात सुनाना भी कहते हैं। इन्हीं लोककथाओं को हमने ‘बातों’ के रूप में जाने कितनी बार सुना होगा। हमारी लोकविरासत बहुत ही समृद्ध और गंभीर है, जिनमें आलौकिक आकर्शण तथा चुम्बकीय शक्ति के अनेक द्वार खुलते प्रतीत होते हैं।
पंजाब की यह लोककथाएं पंजाब के जनमानस और लोकधारा का बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथा अभिन्न अंग हैं। लोककथाओं में एक तिलिस्मी दुनिया के अनेक द्वार स्वतः ही खुलते प्रतीत होते हैं। हमारी लोककथाओं के कथानक भी अद्भुत और तिलिस्म से भरे होते हैं। इनमें क्या-क्या नहीं होता। हमारी लोककथाओं में परियाँ, प्रेत, पिशाच, दैत्य, गिठमुठिए, बोलने वाले साँप, तोते, बिल्लियाँ, लोमड़ियाँ, इच्छाधारी नाग, उड़ने वाले घोड़े, शलेडे, रहम दिल मछलियाँ, रहस्यमयी पेड़, रहस्यमयी कुँए, रहस्यमयी नदी-नाले, रूप बदलने वाले जंगली जानवर, दरख्तों की डालियों पर लटके साँप, चन्दन से महकते जंगल, ढोंगी साधु, रहम दिल राजा वजीर, चोरों के काफिले और भी ना जाने क्या-क्या नहीं होता। यह सब हमें एक तिलिस्मी दुनिया में विचरने को विवश कर देते हैं। यह कपोल कलपित पात्र लोककथाओं की रूह होते हैं। यह कलपित पात्र चाहे विज्ञान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते लेकिन हमारी लोक विरासत ने इन्हें कभी विस्मृत नहीं होने दिया। ‘एक बार की बात है’ या ‘बात बहुत पुरानी है’ या ‘बात बहुत पुरानी नहीं है’ आदि शब्द सुनते ही एक तिलिस्मी और रहस्यमयी परिलोक, एक आलौकिक दुनिया के मायवी किस्सों वाला संसार मन की भीतरी तहों में जीवित होने लगता है।
समय के साथ-साथ इन लोककथाओं का अलग ढंग से अध्ययन और विवेचन होने लगा है। लोककथाएं कहाँ से पनपती हैं…? यह कैसे और कहाँ विचरती हैं…? क्या-क्या… क्यों-क्यों तथा कैसे-कैसे घटता है, निस्संदेह यह अध्ययन का विशय हो सकता है। ‘पंजाब की लोककथाएँ’ के सृजन कार्य के अन्तराल में मुझे इस तिलिस्मी दुनिया के अनेक मायावी पड़ावों से गुज़रते हुए सुखद लगा है। मैं इस अन्तराल में लगभग इस मायावी दुनिया का एक अभिन्न अंग बनी रही हूँ। इन लोककथाओं के सृजन में मैंने प्रसव पीड़ा का भी अनुभव किया है। सच ही इस तिलिस्मी संसार में विचरना सुखद भी लगा और यंत्रणामय भी। मैंने पंजाब की विरासत को लोककथाओं के माध्यम से सहेजने का प्रयास मात्र किया है जो मेरे लिए निस्संदेह संतोशप्रद है।
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