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Pardesiya Novel Book In Hindi


“जैसे मोहमाया में फँसी आत्मा बार-बार नए शरीर के माध्यम से जन्म लेती रहती है, वही हाल स्वयंसेवी संस्थान के इन संस्थापक सदस्यों का था। वे बार-बार कमेटी में वापस आते रहते थे। कभी संरक्षक बनकर तो कभी एक सदस्य का चोला धारण करके, किसी-न-किसी रूप में आते जरूर थे। अगर किसी कारणवश न आ पाते, तो किसी भटकती आत्मा की तरह यत्र-तत्र-सर्वत्र संस्था के कार्यक्रमों के माध्यम से अपने होने का अहसास कराते रहते।

वे कहीं भी यह जताने से नहीं चूकते थे कि उनके कमेटी में न होने से संस्था का कितना नुकसान हो रहा है, उनके बिना सभी कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा है। अतः अगली बार कमेटी में उनकी पुनः वापसी बहुत ही आवश्यक है; उनके इन वचनों को सुनकर गीता के चौथे अध्याय का ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ‘ याद आ जाता था। जैसे आत्मा को कोई नहीं मार सकता, वैसे ही इन संस्थानों से चिपके लोगों को कोई नहीं हटा सकता था।

– इसी पुस्तक से

मर्मस्पर्शी पठनीय उपन्यास। ये आपको उद्वेलित करेगा और आपकी संवेदना को स्पर्श भी।”

Rs.260.00 Rs.300.00

Author Rita Kaushal
ISBN 9789355622372
Language Hindi
Publisher Prabhat Prakashan
Edition 1st
Publication Year 2025
Number of pages 160
Binding Style Soft Cover

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