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Samrajya Ka Sahaj Suryasta


भारत के स्वतंत्रता संग्राम की कहानी कई रंगों और रूपों वाली है। शायद एक सोची-समझी योजना के तहत केवल एक ही रूप-गांधीवादी ‘अहिंसक’ और सत्याग्रही धारा-राष्ट्र की स्मृति में गहराई से बस गया। जैसे-जैसे यह संघर्ष आगे बढ़ा, अंग्रेजों को यह विश्वास होने लगा कि उनके साम्राज्य के लिए अधिक गंभीर खतरा उस दूसरे आंदोलन से है, जो देशभक्ति, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गौरव के एक जोशीले मेल से उत्पन्न हुआ था। इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व क्रांतिकारियों, गुप्त समितियों और उनके जैसे अन्य लोगों द्वारा किया जा रहा था।

यह मोनोग्राफ (लघु-शोध ग्रंथ) इस बात पर चर्चा करता है कि किस प्रकार अंग्रेजों ने अपने ‘खतरे की आशंकाओं’ (threat perceptions) के आधार पर स्वतंत्रता सेनानियों को ‘खतरनाक’ और ‘कम खतरनाक’ श्रेणियों में वर्गीकृत किया था। खतरे की इन्हीं आशंकाओं ने जेल की स्थितियों और दी जाने वाली सजाओं को निर्धारित किया। लॉर्ड माउंटबेटन ने सन् 1947-48 में भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल के तौर पर अपने लगभग 15 महीने के कार्यकाल के दौरान 200 से भी ज्यादा विदाई समारोहों में भाग लिया था। अहम ब्रिटिश अधिकारियों और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच कायम सौहार्दपूर्ण, अनौपचारिक और निजी संबंधों ने एक तरह से स्वतंत्रता आंदोलन के उस भावनात्मक और ब्रिटिश विरोधी मूल कथानक को कमजोर कर दिया था। यह पुस्तक ऐसे अनजाने तथ्यों को अनावृत करती है।

Rs.270.00 Rs.300.00

  •  Raghuvendra Tanwar
  •  9789375733485
  •  Hindi
  •  Prabhat Prakashan
  •  1st
  •  2026
  •  144
  • Soft Cove
Weight 0.750 kg
Dimensions 10 × 6.7 × 1.57 in

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