Author: Dinesh Awasthi
Publication : Vani Prakashan
Sannad
संनाद’ संस्कृत मूल का साहित्यिक शब्द है, जो चेतना, मन, बुद्धि और आत्म जैसे शब्दों के उपयोग के बिना अनुभवों की गहराई और सूक्ष्मता को समेटता है। संनाद की अधिकतर कहानियाँ एक प्रकार से ‘आत्म-संनादन’ हैं। ज्यादातर कहानियों में अन्तर्मन की गहराइयों से जुड़ाव है।
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चोटें अपने साथ आत्मदया भी लेकर आती हैं। सहानुभूति चोटों पर मलहम होती हैं। आत्मदया चोटों और सहानुभूति के बीच दीवार बन जाती है। आत्मदया चोटों की स्मृति का स्थायीकरण है।
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जिन्दगी जब जाती है, अधूरी ही जाती है। अपना आधा छोड़े बगैर जाना उसने सीखा ही नहीं। उसके द्वारा छोड़े गये आधे को धीरे-धीरे घोलकर समय विलीन करता है।
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नकारा सिस्टम मनुष्य के भीतर इच्छा शक्ति को दो तरीके से समाप्त करता है-विलम्ब और अनिश्चितता। गन्दी और षड्यन्त्रकारी व्यवस्था की सफलता यह होती है कि वह सकारात्मक कर्म और सकारात्मक विचार के प्रति भविष्य में ठगे और छले जाने का जनविश्वास पैदा कर देती है।
Rs.269.00 Rs.299.00
| Weight | 0.650 kg |
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| Dimensions | 8.7 × 5.7 × 1.5 in |
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