Publisher: Vidyanidhi Prakashan, Delhi
Author Jiyalal Kamboj
Language: Sanskrit Text with Hindi Translation
Cover: HARDCOVER
ISBN: 9788186700439
The Rigveda (Set of 8 Volumes)
प्राक्कथन
बहुत लम्बे समय तक वेद का अध्ययन-अध्यापन श्रुतिपरम्परा से ही होता रहा। गुरु मन्त्र का उच्चारण करता था और शिष्य उसी रूप में उसे ग्रहण करने का प्रयास करता था। यह श्रुतिपरम्परा वेद का अविभाज्य अङ्ग थी, इस सीमा तक कि वेद को श्रुति ही कहा जाने लगा। इस परम्परा का सारा बल शुद्ध उच्चारण पर था, एक स्वर या वर्ण की अशुद्धि भी सह्य नहीं थी दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तम् अर्थम् आह। स वाग्वज्जो यजमानं हिनस्ति। यदि अशुद्ध उच्चारण हो गया तो यजमान को हानि पहुँच सकती थी। अतः शुद्ध उच्चारण एक अनिवार्यता थी।
मन्त्रों का किसी न किसी यज्ञ-याग में विनियोग होना होता था। याज्ञिक प्रक्रिया मूलतः उन्हीं पर निर्भर थी। मन्त्रशक्ति पर सभी की अपूर्व आस्था थी। यदि मन्त्र ही अशुद्ध उच्चरित हुए तो वे अपना फल न दे सकेंगे और अनिष्ट फल की प्राप्ति भी सम्भव हो जाएगी। नैसर्गिक और काम्य कर्मों के सन्दर्भ में उनका अभीष्टफलप्रदायी होना यजमान और याजक दोनों को अभीष्ट था।
यज्ञप्रक्रिया से अन्यत्र कभी अशुद्ध उच्चारण हो भी जाए पर यज्ञप्रक्रिया में वह क्षम्य नहीं था। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने इस तथ्य को एक पुरानी घटना के उल्लेख के द्वारा रेखाङ्कित किया है। दो ऋषि थे। वे यद्वानः और तद्वानः शब्दों का उच्चारण यर्वाण और तर्वाण करते थे। इस उच्चारण के कारण उनका नाम ही यर्वाण तर्वाण पड़ गया। वे विद्वान् भी थे, दूर और निकट की सब चीजों के जानकार थे, विदितवेदितव्य थे और तत्त्वज्ञानी थे, फिर भी उच्चारण में त्रुटि उनसे हो गई। यह त्रुटि बोलचाल में भले ही उनसे हुई हो, पर यज्ञकर्म में कभी नहीं होती थी। ते तत्रभवन्तो यद्वानस् तद्वान इति प्रयोक्तव्ये यर्वाणस् तर्वाण इति प्रयुञ्जते, याज्ञे पुनः कर्मणि नापभाषन्ते। (पस्पशाहिक)।
उच्चारणशुद्धि के इस बल का यह प्रभाव हुआ कि सारा ध्यान शुद्ध उच्चारण पर ही केन्द्रित हो गया। बस उच्चारण भर करते जाना यही मन्त्रों का लक्ष्य बन गया। उच्चारणशुद्धि के लिये अनेक उपायों का आविर्भाव हुआ। अष्ट विकृतियां उसी की परिणति हैं। इसका यह प्रभाव तो अवश्य हुआ कि वेद अपने मूल उच्चारण में सहस्राब्दियों तक बने रह गए और आज भी उसी रूप में चले आ रहे हैं। सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान् मैक्समूलर का कथन सर्वथा सत्य है कि यदि किसी कारणवश वेदों की प्रकाशित सभी प्रतियां नष्ट हो जाएं तो भी ब्राह्मणों के मुख से आज भी अपने मूल अविकल रूप में उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।
उच्चारणशुद्धि पर बल का एक प्रभाव यह भी पड़ा कि अर्थ की ओर ध्यान कम हुआ। जब तक यह भाषा व्यवहार में आती थी लोगों को इसके अर्थ समझ आते रहे होंगे, पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, लौकिक संस्कृत का उदय होता गया और वैदिक और लौकिक संस्कृत का अन्तर बढ़ता गया, मन्त्र लोगों के लिये दुरूह से दुरूहतर होते गए। एक समय ऐसा भी आया जब कहा जाने लगा कि मन्त्रों के अर्थ ही नहीं हैं। महर्षि यास्क ने महर्षि कौत्स के सन्दर्भ से मन्त्रों की अनर्थकता और सार्थकता पर एक पूरा शास्त्रार्थ ही प्रस्तुत कर दिया है। उन्हों ने सशक्त तकों के आधार पर कौत्स के इस मत का कि मन्त्र अर्थविहीन हैं (अनर्थका हि मन्त्राः) का खण्डन किया है और जिस निरुक्तशास्त्र का वे प्रणयन करने जा रहे हैं, उसकी उपयोगिता को सिद्ध किया है। निरुक्त की उपयोगिता मन्त्रों का अर्थ समझने के लिये है। यदि मन्त्रों का कोई अर्थ ही नहीं है,
तो उनका शास्त्र किस का बोध कराएगा।
Rs.10,799.00 Rs.12,000.00
| Weight | 15.500 kg |
|---|---|
| Dimensions | 8.7 × 5.7 × 6 in |
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